वक़्त

वक़्त

वक्त तू रहता कहाँ है
कहाँ बनाया है तूने बसेरा
हो अगर कोई पता ठिकाना
मुझे भी इक दिन बतलाना

होगी वह कौन-सी डगर
जिधर से अक्सर गुजरता है
फुर्सत मिले जब कभी तुझे
यार मुझे भी साथ ले चलना

जब भी बाँधना चाहा तुझे
पलों की रेशम की डोर से
जाने कहाँ गुम हो जाता
फिसली हो जैसे रेत मुट्ठी से

थकान भी थक गयी है
राह तेरी देखते देखते
दिनकर भी हुआ ओझल
तेरे ही मिलन की आस में

कब होती है तेरी सुबह
होती है कब तेरी रात
क्या कोई रंग-रूप है
है क्या कोई आकार तेरा

बैठ कभी पहलु में मेरे
गुफ्तगू करेंगे दो यार
छेड़ेंगे कोई नयी तान
सुरमई चांदनी रात में

क्या होती तुझे भी पीड़ा
बचपन सोता जब भूखा
क्या तू भी है तड़पा कभी
जब होती गोद कोई सूनी

क्या तेरा भी खून खौलता
जलती झोपडी जब गरीब की
क्या सांसें तेरी भी थम जाती
बेआबरू होती जब कोई नारी

हे वक्त, मौत आने से पहले
मेरी साँसों को ज़रा छू लेना
हर सांस से आएगी आवाज
आज भी है दोस्त इंतज़ार तेरा

(किशन नेगी ‘एकान्त’)

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