शादी के बाद

शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

याद काॅलेज के उन दिनों की आ गई,
जिसमें मिलने की चाह इन्तजार में बदल गई,
एक सीधी सी बात वो भी कह ना सके,
बात दिल की थी दिल में दबाते रह गए,
चोरी-चोरी हमें देखा करते थे वो,
अरमां इस मिलन के संजोया करते थे वो,
इस तरह से ये अक्स उनपे यू्ँ छा गया,
शादी के स्वप्न भी सजाया करते थे वो,
मिलते थे जब कभी इस राह में कहीं,
इक दबी सी हँसी ओर सर झुकाया करते थे वो,
अामने-सामने थे हम जब भी मिले,
ना ये लब हिल सके ना वो कुछ समझ सके,
शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

एक ही कक्षा के हम सहपाठी हुए,
एक से विषयों के हम विद्यार्थी हुए,
इक सादगी भरा ये आकर्षण था मेरा,
इक शांति भरा ये प्रेम था मेरा,
प्यार दोनों को था इस तरह इस कद्र,
इज़हार करेगा कौन इसका लगता था डर,
वक्त बीतने लगा प्यार भी बढ़ने लगा,
आँखो में प्रेम-अश्रु मचलने लगा,
मेरे मन के मीत वो बन ही गए,
इस बात को भी वो समझ ना सके,
प्रथम वर्ष इसी उलझन में निकल गया,
ना मैं कह सकी ना ही वो कह सके,
शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

कोई ओर लड़का दिल को भा ना सका,
उसकी तस्वीर को दिल से हटा ना सका,
हर मुलाकात में प्यार बढ़ता गया,
वो भी इस इज़हार को जता ना सका,
इक डर था मुझे उसकी ना सुनने का,
इस वजह से पहल मैं भी कर ना सकी,
प्यार दामन में लेकर सिमटती रही,
उसके इन्तजार में बस मचलती रही,
आज दोनों में एक फासला हो गया,
मिलते-मिलते अलग रास्ता हो गया,
कक्षा में हम अंतिम डगर पर हुये,
ना ही मिल सके ना ही कुछ कर सके,
शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

इक बात उसकी मुझको सताती रही,
प्यार था या नहीं बस उलझाती रही,
पता नहीं कहाँ होगा उसका कारवाँ,
याद करता भी है या कर दिया लापता,
दूर रहकर भी उसको भुला ना सकी,
प्यार-ही-प्यार यादों में करती रही,
वक्त ने इस पर भी किनारा कर लिया,
शादी का रिश्ता मैंने स्वीकार कर लिया,
ढुढंने की कोशिश मैंने की थी बहुत,
ना ही सामना हुआ ना ही वो मिल सके,
अनछुए प्यार का ये असर था मुझ पर,
ना ही मैं जान सकी ना वो बता सके,
शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

बिना देखें ही हामी भर दी मैंने,
जो भी मिलेगा खुशी से अपनाया मैंने,
दुख बहुत था मुझे उसकी जुदाई का,
पर वक्त संग समझौता किया था मैंने,
हार कर आज मैं लड़खड़ा सी गईं,
शादी को ही भविष्य समझने लगी,
उस खुदा से की मैंने कई मिन्नते,
जिसे चाहा मैंने काश मिलता वहीं,
सात फेरे वचन आज पूरे हुए,
इक लड़की से एक गृहणी हो गईं,
ये पहला था मौका देखने का उसे,
जिसे खुदा ने मेरा पति चुन लिया,
देखकर फिर अचम्भा हुआ था मुझे,
जिसको चाहा वहीं पति-रुप मिल गया,
देखकर वो मुझे भी चकित रह गए,
मिलकर दोनों खुदा का शुक्रिया करने लगे,
पूरा कर ही दिया मेरी हर आरजू को,
जिसकी आस ना थी वहीं हमसफर मिल गए ,
शादी के बाद वो हमसे जब भी मिले,
दिल के सोए सभी अरमां खिल गए ॥

विरेन्दर सिंह ‘विराज’

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"Poet"

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