शायरी-३

दुआ बंधी ही रह गई,
उन विकराल वृक्षों पर,
ये तो इन्सानी फितरत हे कि :-
जब दुआ पूरी होती है,
वो मुझको भूल जाते है ॥

‘विराज’

About "विराज़"

“Poet”

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