शुद्ध – दान

शुद्ध – दान

 

अलौकिक उसका तराजू है, आखिर सबको जिसमे तुलना है ,

यह सच की ऐसी टेड़ी कुंडी है, जिसमे फँसता हर पाखंडी है ,

करवा कर्मो का अपने वजन, इनसान जन्मो का फेरा पाता है ,

जो हमनें शुद्ध-दान किए, उनका साँचा मोल वहां लग जाता है I

 

नजर उसकी में कोई अमीर-गरीब नहीँ, सब उसकी ही संतान है ,

इस जहाँ की रीत ना चलती वहां, वहां तौल का पूरा ईमान है ,

विजय दान देकर यहां व्योपार किया , कौड़ी के ना भाव वहां ,

पैसा-हीरा-रुत्बा सब बेमौल वहां, सब खेल है वहां विचार का I

 

वहां दान की कीमत दुनियावी नहीँ, बस भाव का ही मोल है ,

देना भी इतना ज़रुरी नहीँ, देने का भाव ही फक्त अनमोल है ,

सब दिया, पर बिन-भाव दिया , उसके यहां कुछ ना फल्ता ,

कुछ ना दिया, बस भर-भाव किया, तो भी हरि-मन रम्ता I

 

                                             …… यूई विजय शर्मा

About UE Vijay Sharma

Poet, Film Screenplay Writer, Storyteller, Song Lyricist, Fiction Writer, Painter - Oil On Canvas, Management Writer, Engineer

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