शृंगार

कोई कली अनछुई
पहले मिलन को आई
मन में जली रोशनाई
इन्द्रधनुषी रंगीनाई
चंदन सा तन महकाई
मन में फागुनी पुरवाई
गौरे गालों पर लालीमाई
दुपहरी के तपन सी नहाई
चेहरे पे गुलाबी आभा आई
बांहों में लता सी समाई
सांसों में बजी शहनाई
रास रंग की तरूणाई
तिनके सी थर थराई
शृंगार की आंधी छाई
शर्म पर भारी आतुराई
रस की मस्त रंगीनाई
कोई कली अनछुई
समर्पण से पुष्पित हो पाई
लचकते कदमों से लहराई
बंसती मन से हर्षाई
मन्द मन्द मुस्काई
शृंगार की चांदनी से नहाई
तन में चम्पा चमेली महकाई
सजन

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