संघर्ष से स्वाभिमान तक

शब्द, गान विलुप्त हुए, मौन था अबाधित
अव्यक्त, अछूता व्यक्तित्व, दिवस -रात्र संवाद रहित
मुखर, चपल वर्चस्व हो गया पूर्णतया पराजित
अंतःकरण में अंतर्द्वन्द, विकलता समाहित ।।
रंगमंच पर अभिनीत ज्यों हर पल
अनुभव दुःख सुख के आए वेष बदल
अवलंबन से कुंठा हुई प्रबल
अवहेलित, तृषित दृग सदा सजल।।
निश्छल मन की पुलक थी कहीं खोई
व्यथाओं से शिथिल मन हुआ निर्मोही
उल्लास, उमंग की जो सृष्टि संजोई
उस पथ से भटक गया बटोही।।
प्रतिभा ने आशा का खोल दिया द्वार
प्रज्वलित ज्ञान दीप से कल्पना हो उठी साकार
सार्थक हो रहे स्वप्न विचार ले रहे आकार
साधना में लक्ष्य की रखें प्रभु कृपा अपार ।।

निधि

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