संवेदना

संवेदना

सखी ओ सखी देख मुझ से नहीं देखी जाती तेरी आँखों में ये नमी

दर्द अपना कभी मुझसे अगर तू  साँझा करे तो समझूं इसको मैं भी

मैं नहीं  कहता की तू मेरा भरोसा रख ले,  अगर समझे फिर भी

मुझे इस काबिल तो हर कोण से तू मेरा एक परीक्षण कर ले

न जाने क्या वजेह है और किस बात का खौफ है तेरे दिल में

चलो जाने दे, कुछ देर बैठ, मेरे पास आ कुछ तो मशविरा कर ले

मैं जानता  हूँ कि तू  जानती है इस बेमुरब्बत जिंदगी का फल्सफा

लेकिन यकींन कर खुदा का और कुछ ओर दिनों का हौंसला रख ले
[ एक अबोध बालक // अरुण अतृप्त ]

 

About Arun Kumar Shashtri

a human by birth, insaan by sanskar, doctor by service, llb, mca, jyotishachary, yog and naturopath by education consultant by profession and lastly a constant learner by nature. poetry and prose writing is oxygen to my soul

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