सच्चे प्यार का असर

सच्चे प्यार का असर

ये कविता मैनें अपने College के दिनों में लिखी थी, ये कविता दो प्रेमियों के बीच हुई बातों का समावेश है,
प्रेमी-प्रेमिका प्यार को जब पूर्ण रूप से समझने व जानने लगे है तो वो अपने प्यार को कुछ इस तरह जाहिर कर रहे है..
इस कविता में प्रेमी-प्रेमिका एक मंच पर एक-दूसरे के आमने-सामने हो कर अपने-अपने प्यार को ब्यान कर रहे है कुछ इस तरह से…

प्रेमिका :- तेरी चाहत में जाने असर ये हुआ है,
ये विराना जहान् अच्छा लगने लगा है ।
क्या इसी को प्यार कहते है यहाँ,
पराया है जो अच्छा लगने लगा है ॥

प्रेमी :- अपना हूं मैं जिसे समझे तु पराया,
कौन यहां आज किसी का हो पाया ।
आज कर दिया अलग छोटी बातों से तुने,
अपना ही तुझे पराया लगने लगा है ॥

प्रमिका :- इसे प्यार कहते है तो दर्द क्यों होता है,
सच्चे मन का साथी दिल से दूर क्यों होता है ।
फूलों की राहों में कांटों का बसेरा है,
वहीं तुझे पाने को दिल मचलने लगा है ॥

प्रेमी :- प्यार में दर्द भी मीठा लगता है,
हर घूंट है कङवा पर पीना पङता है ।
प्यार में जुदाई जब होती है जहान् में,
वही मिलने को दिल अब तङपने लगा है ॥

प्रमिका :- जब तक रहती हूं साथ सब अच्छा लगता है,
वक्त बीतने का ना पता चलता है ।
बैरन शाम के आते ही डर लगने लगा है,
जुदाई के डर से मन सहमने लगा है ॥

प्रमी :- प्यार की परिभाषा कोई समझ ना पाया,
जुदाई में इसकी हर प्रमी ने दुख पाया ।
पर मत भूलो इसी कारण प्रेम बेचने लगा है,
इसी विश्वास पर हर प्रेमी प्यार को समझने लगा है ॥

‘विराज’

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"Poet"

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