सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है

हर पीड़ा की आवाज कहीं।

इसको सुनने जो कतराते

उनको होती है लाज नहीं।

 

इस कारण जब ठोकर खायी

इस पीड़ा ने तब उफ् न किया

पथ के पत्थर चूम चूमकर

घायल पथ का श्रंगार किया।

 

कहने को थी आगे मंजिल

पर रुकने का साहस न मिला।

नम पलकों से आँखों ने भी

हर आँसू का संहार किया।

 

अधरों था अंकुश पीड़ा का

खोल सका ना मन राज कहीं।

सन्नाटे में छिप जाती है

हर पीड़ा की आवाज कहीं।

 

काँटे हर पीड़ा के चुनके

स्वप्न नीड़ का तैयार किया

आहों ने तब चुपके चुपके

स्वप्न सलोना बर्बाद किया।

 

गम भी था बस एक पखेरू

जिसने सब स्वीकार किया।

दर्द भरी व्याकुल साँसों ने

बस पतझर से संवाद किया।

 

क्या नयनों से नीर बहायें

गम का होता अंदाज नहीं।

सन्नाटे में छिप जाती है

हर पीड़ा की आवाज कहीं।

 

जब आस गई तो साँस थकी

था अजब दर्द इस क्रीड़ा में

उमर अकेली बुढ़ी होती

जब साँसें थकती पीड़ा में।

 

यही देखकर प्राण सेज पर

ठठरी भी उखडूँ बैठी थी

चला-चली की बेला में भी

पीड़ा भी ज्यादा रूठी थी।

 

कहती थी मत छेड़ तार तू

बजने न लगे हर साज कहीं।

सन्नाटे में छिप जाती है

हर पीड़ा की आवाज कहीं।

 

मूक वेदना सहते सहते

चीख पड़ी तब पीड़ा मन में

थरथर कँपता था आँसू भी

पलकों में कुछ अंतर्मन में

 

ढूँढ़ रहा था तार साज के

मन भी अपने सूनेपन में

शब्द दर्द के मूक बने थे

कंपित लब के सूनेपन में।

 

पीड़ा थी वो शब्द दबाये

जिसे मिला अर्थ-ताज नहीं

सन्नाटे में छिप जाती है

हर पीड़ा की आवाज कहीं।

           … भूपेन्द्र कुमार दवे

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