सभ्यता रोती रहे पर आदमी रोता नहीं है

सभ्यता रोती रहे पर आदमी रोता नहीं है
करवट बदलती रात हैं आदमी सोता नहीं है।

प्यार की धरती हमारी द्वेष घृणा को सोंप दी है
सत्य की सीने पर असत्य की खंजर घोंप दी है
नफरत की आग में भी अच्छाइयाँ सभी झोंक दी हैं
श्रद्धा की हर निशानी हरेक माथे की पोंछ दी हैं।

उम्रकैद पाये बिना आदमी मरता नहीं है
खौफ इस बात का है कोई भी डरता नहीं है।
घायल तो हरेक है आह कोई भरता नहीं है
घाव सभी रिसते तो हैं कोई चीखता नहीं है।

कटघरों में खड़ा करो हर पाप मिट जावेगा
जो भी खरीदा नहीं गया वो गवाह मर जावेगा
बंदूकों से छलनी किया पुण्य क्या कर पावेगा
तेजाब छिड़कता शैतान हर कहीं मिल जावेगा।

कानूनों की चिन्छियों भी कोई पढ़ता नहीं है
अकड़ इतनी है कि कोई भी हुक्म चलता नहीं है।
द्वार न्याय का तो है पर वो कभी खुलता नहीं है
सन्नाटों का राज है मौन कुछ कहता नहीं है।

पुण्य करना दोष है हर पाप करना आसान है
इंसानियत की ओट में हर वासना की खान है
अरमान सब जलते रहें औ राख हर इंसाान है
मैकदे में भीड़ है किन्तु मंदिर न जाना शान है।

आक्रोश तो बहुत है मगर खून खौलता नहीं है
असभ्यता की आँच में स्वर्ण शुद्ध होता नहीं है
कायरों की भीड़ में इक शेर भी मिलता नहीं है
आँख चिन्गारियों में खौफ कुछ दिखता नहीं है।

कहने को तो सभ्य हैं सब पढ़लिखकर बढ़े हैं
पर लगता है सभी सोचविहीन-ठूँठ बन खड़े हैं
क्रूर कपट की क्रान्ति में सब पलते बढ़े हैं
राख में तबदील हरेक गुमनाम होके पड़े हैं

सभ्यता रोती रहे पर आदमी रोता नहीं है
करवट बदलती रात हैं आदमी सोता नहीं है।
…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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