सावन के जख्म

 


सावन के जख्म

घनन घनन-घनन घनन
देखो कैसे गरजे हैं मेघा फिर से
झूम-झूम कर रिझाती काली बदरिया
अपने रूठे साजन को
नन्ही-नन्ही जल की बूंदें
फिर से लेकर आया है बादल
बादलों में छिपकर जैसे
विरह राग छेड़ा है किसीने
सोलह शृंगार के रथ पर सवार
फिर से थिरका है पागल सावन
सावन के भीगे आँचल तले
है पुकारती संतप्त सजना
अब तो लौट आओ बेदर्दी प्रियतम
इधर सहा ना जाये दर्द विरह का
और उधर काली घटा देती जख्म हज़ार
क्यों तड़पाते अपनी विरहन को
चौमास की रिमझिम बौछारों में
मर्म की छटपटाहट तुम क्या जानो
बाट जोहते थक गयी हैं पलकें भी
जम कर आंसू भी हुए हिमशिखर
सावन के जख्मों को
सहती सदा विरहन ही क्यों
घायल जोगन की पीड़ा
कोई ना जाने सावन में
(किशन नेगी ‘एकान्त’)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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