सुई

सुई

लम्बी, पतली, चमकीली

किन्तु मजबूत इस्पाती

चुभन लिये, देखती हूँ

तुम्हारे निस्तेज थकी आँखों में

घात-प्रतिघात के निशान

घायल, हतोत्साहित और शंकालु तुम

जैसे कोई षड्यंत्र के चक्रव्यूह में घिरे हो

हर किसी पर शक की सुई घुमाते

अपनों परायों के बीच पेंडुलम सा

हिलता डूलता तुम्हारा आत्मविश्वास

खंडित होता व्यक्तित्व

डरे सहमें निढाल से तुम

तनिक ठहरों

तन-मन को दुरुस्त करती

सुई हूँ मैं

विभाजित होते अस्तित्व को

सिल सकती हूँ मैं

मेरे इस प्रयास में

हर कदम पर मिलेगी

अनोखी सी चुभन

सहन कर सको तो करो

धैर्य की परीक्षा है तुम्हारी

काल की सहचरी मैं

क्षण-क्षण जीती

डोलना होगा मेरे संग

विष मिले या अमृत

जीना होगा हर हाल में

कुछ पाने के लिए खोना होगा

जुड़ने और जोड़ने की कला

सीख लेना मुझसें

तुच्छ सी हूँ

किन्तु बड़े काम की हूँ

कितनी बार प्रयास के हाथों

छिटकी गई हूँ

कभी बिछड़ती कभी मिलती रही हूँ

मिलन जुदाई की अनुभूतियों से गुजर

जीवन के पथरीलें राह तय करती

लक्ष्य को ओर बढती रही हूँ

सुई हूँ मैं

मेरे ही नोक पर बैठा है

स्वार्थ कुंडली मारे

करना होगा फिर धर्मंयुद्ध

तुम्हारे अन्दर का कृष्ण

आज फिर दे रहा है गीतोपदेश

उठो ! तेजस्वी तुम

अंतर्द्वंद से निकल

युद्ध के लिए हो जाओ तैयार —–

About पूनम सिन्हा

M.Sc. Zoology

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