सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का,
हमने भी कभी न देखे पैरों में पड़े हुए थे जो फूटे छाले |

मुख़्तलिफ सी हो जाती है उनकी ज़िन्दगी दूसरों से,
जब ज़ेहन में कोई खुद के ही ज़ुनून की लौ जला ले |

यूँ अफ़सुर्दा चेहरा लेकर उससे मुख़ातिब नहीं होते हैं,
जब कोई तुम्हारी सूरत को ही अपना आईना बना ले|

सुना है आज़माईशों से तो मुक़द्दर भी बदल जाता है,
ज़ाहिल हैं वो जिनके ख़्वाबों को आब-ए-चश्म बहा ले |

इब्तिला है मेरा कि अक्सर खुद से ज़फा किया है हमने,
मुक़द्दर ने तो दस्तक दी थी पर हर बार लटके मिले ताले|

रवायत है बार-बार मुक़द्दर को भी अपने नहीं आज़माते,
मनाना मुश्किल है लकीरें हाथों की कोई क्यों न जला ले|

वक्त से पहले किसी को कुछ नसीब नहीं होता है यहाँ,
ज़रूरत है कि आरज़ू को ही मंज़िल का रास्ता बना लें |

मेरी शायरी से –

About ओम हरी त्रिवेदी

आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य , मानव होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य . . . नाम- ओम हरी त्रिवेदी शिक्षा - स्नातक +तकनीकी डिप्लोमा जन्म स्थान - बैसवारा लालगंज , रायबरेली (उत्तर प्रदेश) व्यवसाय - शिक्षक

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