सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

जब-जब सावन में गुजरता था
तेरी आम की बगिया से होकर
शरमाकर ढक लेती थी तू तब
धानी चूनर से चेहरा सकुचाकर
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

पीली सरसों की पगडण्डी पर
तेरा मटक-मटक कर चलना
पानी का गागर उठाये इतराना
फिर पीछे मुड़-मुड़ कर देखना
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

सखियों संग बैठ सावन के झूले में
टुकुर-टुकुर कर मुझे निहारना
फिर झटककर घने बालों को
तेरा छुप-छुप कर वह इठलाना
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

जब-जब धानी चुनरिया तेरी
भावमय बयार संग लहराती थी
देख तेरे यौवन की अंगड़ाई
कमसिन जवानी भी शरमाती थी
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

अलसाई पवन से सुर मिलाकर
राग भैरवी जब तू गुनगुनाती थी
हिमगिरि के शिखर पर बैठ मौन
उषा भी मंद-मंद मुस्कुराती थी
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

आँखों ने संजोकर रखे हैं आज भी
सारी अमिट यादें तेरे अल्हड़पन की
मैं भूलना भी चाहूँ तो न भूल पाऊँ
सुबह और शाम तेरे लड़कपन की
तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे
सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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