सोचो, समझो और परखो

सोचो, समझो और परखो

दिल में कुछ, जबान पर कुछ नज़र आता है l
कौन अपना, कौन पराया समझ नहीं पाता हैl
कब कौन पीठ में, छूरा घोप दे कुछ नहीं पता l
कभी-कभी विश्वास-पात्र भी धोखा दे जाता है ll

चंद पलो की मुलाकात से, पहचान नहीं सकते l
किसी के दिल में क्या छिपा है जान नहीं सकते ll
मन की भवरों को आसानी से यूँ अगर पढ़ पाते l
शायद दोस्त कम यहाँ दुश्मन ज्यादा नज़र आते ll

रूप -रंग से सुंदरता आक सकते हो  व्यक्तित्व नहीं l
बंद जबान से चुप्पी आक सकते हो कडवडाहट नहीं ll
बिन व्यक्तित्व ,साथ पल बिता सकते हो जिंदगी नहीं l
जबान से निकली कोई बात कभी वापिस आती नहीं ll

इसलिए रूप की सुंदरता से ही मन की  सुंदरता  आको l
किसी के मन में क्या छिपा है पहले अच्छी तरह भाँपो ll
जल्दबाजी में लिए निर्णेय से सिर्फ पछतावा ही होता है l
जल्दबाजी का काम  इंसान का नहीं, शैतान का होता है ll

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