स्वर्ण – चित्

स्वर्ण – चित्‌

एक तरंग , एक सुर , एक ल्य

है अब , सोच वचन और कर्म में मेरे I

 

एक ल्य , एक सुर , एक तरंग

है अब , कर्म वचन और सोच में मेरे I

 

इस तरंग सी ही है , वोह तरंग I

इन सुरों से है मिलते , वोह सुर I

इस ल्य से है जुड़ी , वोह ल्य I

 

है जो बाहर का गीत, वोही अन्दर का संगीत ,

है जो बाहर का संगीत, वोही अन्दर का गीत I

 

रोशन हुआ अंतर्मन जो तुझमें, मंज़िलें अपनी ख़ुद की छूटी ,

ल्य-म्य हो विजय रमा यूँ तुझमें, भव्सागर की चाह भी छूटी I

 

                                              …… यूई विजय शर्मा

About UE Vijay Sharma

Poet, Film Screenplay Writer, Storyteller, Song Lyricist, Fiction Writer, Painter - Oil On Canvas, Management Writer, Engineer

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