हमें तुमसे चाहत कितनी

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते
भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते
जब-जब मेरी सांसें, तुम्हारी साँसों से जा टकराई
दिल चाहता है छूलूं, इन ठंडी साँसों की गहराई
खिले उषा की लालिमा, देख तुम्हारे हाथों की हीना
क्यों बहके कदम हमारे, तुम्हारी मधुशाला के बिना

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते
भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते

बिन बदरिया के सजना, बूंदें क्यों बरसती हैं
तुमसे मिलने को सखी, आंखें क्यों तरसती हैं
तुम्हारी धड़कनों से, दुनिया क्यों बहकती हैं
तुम्हारी मादक सुगंध से, हवा क्यों महकती है
कैसे काटे हैं पल-पल, ये तुम नहीं जानते
दिल मैं न हो हलचल, ये हम नहीं मानते

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते
भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते

देख मंजुल यौवन को, वायुमण्डल भी शरमाया
किस देश में निकलेगा चाँद, चाँद भी भरमाया
तुम्हारे नशीले नयनों में, आस्मां ने देखा इक सपना
सितारों की भीड़ में जैसे, मिल गया हो कोई अपना
कुदरत ने तराशा है तुमको, ये तुम नहीं जानते
तुमसा अलौकिक कोई और, ये हम नहीं मानते

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते
भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते

सूरज भी हुआ मध्यम, देख चित्ताकर्षक मुखड़े को
मगर समझा न सका वो, अपने दिल के टुकड़े को
देख तेरे हुस्न को, मदहोश बादल भी हुआ घायल
जाग जाती है ज़न्नत भी, जब झनकती तेरी पायल
तुम बिन ज़िन्दगी कहाँ, ये तुम नहीं जानते
जिंदगी है तुम्हारे बिन, ये हम नहीं मानते

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते
भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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