हाँ जनाब

हाँ जनाब, मै अब अपनों की
बातें नही करता
डर लगता है
कंही मेरी अनकही से
नाराज न हो जाये
मेरे अपने
पर सच यही है
अपने तो अब लगते
कभी कभार आने वाली बयार
भूल से कभी आ जाते
पल दो पल के बाद
दे दुहाई काम की चले जाते
समझ क्यों वो नही पाते
अपनत्व को वापस जागने में
कुछ तो वक्त चाहिए
समय की कमी से
अब रिश्ते हो रहे
इसी तरह तैयार
अर्थ का है यह युग
अनर्थ है स्वभाविक
आदमी कहाँ रहा
अपने स्वभाव का मालिक
मानसिकता करती स्वार्थ की पूजा
काम होना चाहिए
चाहे भगवान हो
या फिर कोई दूजा
जब आस्था का है
ऐसा हाल
तो फिर रिश्तो के पीछे
हम क्यों रहे बेहाल
कुछ पुराने संस्कारो का है कमाल
भाग्य से मिल लेते जब कभी
पूछ लेते एक दुसरे का हालचाल
मुस्कराहट की एक छोटी सी झलक
रख लेते दिल में संभाल
जब बात कभी गम की हो
नयनो में नमी की हो जाती कमी
सहानुभूति के चंद शब्दों के लिए
जबान भी लड़ खड़ा जाती
कमबख्त सूरत भी उनकी
समय पर याद नही आती
अपनत्व का हक है मेंरा
कुछ भी कह दू उनके बारे में
आखिर अपने तो अपने ही होते
सब सपने सुनहरे कब होते
***
यहीं है अब जीवन
इसका अब यही है रूप
छांव कम ज्यादा धूप
+++कमल+++

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