हाथ तेरा थाम लेंगे (ग़ज़ल )

तू हाथ बढ़ाकर तो देख, हाथ तेरा थाम लेंगे,
अजनबी हो कर भी हम, हाथ तेरा थाम लेंगे।

भूल जाये अगर फ़र्ज़ तू, हाथ अपना छुड़ा कर,
मगर हम यारों के यार हैं, हाथ तेरा थाम लेंगे।

ख़ुदा को आजमाया, आजमाया तक़दीर को भी,
आजमा कभी इस यार को, हाथ तेरा थाम लेंगे।

गिर्दाब में फंस जाये जब, कस्ती मेरे यार की,
इशारा बस एक कर देना, हाथ तेरा थाम लेंगे।

इज़्तिराब हो दिल में कभी, ज़िन्दगी के सफर में,
तेरे साँसों की डोर थामकर, हाथ तेरा थाम लेंगे।

ये लम्हे ये तन्हाईयाँ भी, छोड़ देंगे साथ तेरा,
हम बनकर तन्हाईं तेरी, हाथ तेरा थाम लेंगे।

थकान की मधुशाला में, पसीना छलकेगा तेरा,
डगमगायेंगे जब कदम तेरे, हाथ तेरा थाम लेंगे।

ख़ारिज हो फर्याद तेरी, जब खुदा के दरबार में,
ज़िक्र यार का भी कर लेना, हाथ तेरा थाम लेंगे।

अज़ल तक रहे ये याराना, दुआ करता है ‘एकांत’ ,
आब-ए-चश्म बहाये जब तू, हाथ तेरा थाम लेंगे।

(किशन नेगी ‘एकांत’)

अज़ल= अनन्तकाल, सनातनत्व, नित्यता
इज़्तिराब= अशान्ति, चिन्ता, घबराहट, बेचैनी
गिर्दाब= भंवर, अतल समुद्र, बवंडर
चश्म-ओ-चिराग़= आंख का प्रकाश, प्रिय

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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