हालात जनता के

हालात जनता के

उग्र इस भीङ का, रूख तो मोङना ही था,
शहीदों के कफन का मोल, भले कुछ भी न था,
जश्न की जिस रात में, डूबी हुई थी मानवता,
आजादी की खुशी में, बैखोफ थी जहां जनता,
लङ रहा था सरहद पर, सैनिक भारतीय ही था,

उग्र इस भीङ का, रूख तो मोङना ही था,
शहीदों के कफन का मोल, भले कुछ भी न था…

समाज की बंदिशों में, लुट रहा इन्सान था,
अपनी ही मजबूरियों में, घुट रहा इन्सान था,
तक्लीफ से अन्जान वो, हुआ तो कभी ना था,
लूट की इन नीतियों से, नादान वो कभी ना था,
बढ़ना वो चाहता था, पर साथ ना कोई ही था,
चलते हुए इस सागर के, पार उतरना ही था,

उग्र इस भीङ का, रूख तो मोङना ही था,
शहीदों के कफन का मोल, भले कुछ भी न था…

विश्वास के इस फूल को, कुचल दिया समाज ने,
खिलने से पहले फूल को, मसल दिया समाज ने,
जीवित आशाएं मौत का, बिगुल बजाने लगी,
अधमरी थी फिर भी वो, ये गीत गाने लगी,
मौत के इस दॄश्य में, रो रहा इन्सान था,
भीङ के बाजार में, वो अब भी अकेला ही था,

उग्र इस भीङ का, रूख तो मोङना ही था,
शहीदों के कफन का मोल, भले कुछ भी न था…

प्यार की इस दौङ में, रुतबा पैसों का था,
नीतियों की बातों में, घोटाला पैसों का था,
देश चलाने वालों के, हाथों में कानून था,
पीस रही थी मानवता, बुत बना कानून था,
कस रही थी बेङिया, टूट रहा इन्सान था,
दब चुकी आवाज थी, शोर वहाँ कोई न था,

उग्र इस भीङ का, रूख तो मोङना ही था,
शहीदों के कफन का मोल, भले कुछ भी न था…

‘विराज’

About "विराज़"

"Poet"

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.