हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !
जिस राह पर तू बढ़ चला है
उस राह पर आंधी और तूफ़ान
विचरते हैं अक्सर निर्भीक होकर
चट्टान बन ललकारेंगे तेरे साहस को
डटे रहना-मत डिगाना बढ़ते क़दमों को
मगर तू संभल कर चलना

हे पथिक !
कांटे हैं असंख्य इस पथ पर
जिस पथ पर तू चल पड़ा है
हर काँटा है इंतज़ार में कि
कदम तेरे रक्तरंजित हों
निरंतर चलना होगा तुझे हर हाल मैं
मगर तू संभल कर चलना

हे राही !
जिस मार्ग पर तू निकल पड़ा है
असीम बाधाएं होंगी उस मार्ग पर
ठोकर लगेगी, फिर गिरेगा
गिरकर फिर से आगे बढ़ना होगा
घबराना कर्मवीरों का काम नही
मगर तू संभल कर चलना

हे मुसाफिर !
पकड़ी है जो डगर तूने
कठिन ज़रूर है मगर अजेय नहीं
सूरज की तपती गर्मी में
पसीना तुझे बहाना होगा
अपने असीम उत्साह और अदम्य साहस से
शिकस्त इसको देनी होगी
मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !
जिस राह पर तू बढ़ चला है
उस राह पर आंधी और तूफ़ान
विचरते हैं अक्सर निर्भीक होकर
चट्टान बन ललकारेंगे तेरे साहस को
डटे रहना-मत डिगाना बढ़ते क़दमों को
मगर तू संभल कर चलना

(किशन नेगी)

About Kishan Negi

मुझे बचपन से ही कविता लिखने का शौक रहा है, लेकिन ये उस समय पूरा नहीं हो सका. चौदह वर्ष की आयु में प्रेमचंद, शिवानी पंत व शेक्सपिअर को पढ़ने का एक अनोखा अवसर मिला, जिनसे मैं बहुत ही परसाभावित हुआ | मेरा येर शौक अचानक ही नहीं बना, अपितु परमात्मा की असीम कृपा से मन में अनेकोनेक विचार कविता गढ़ने के लिए आते रहते हैं |

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