हे माझी ! मेरे कर्णधार !

हे  माझी !  मेरे कर्णधार !

मुझे ना छोड़ बीच मझधार।

 

जिसको कहते जीवन नैय्या

वह मैंने  तुमसे  पायी  है

तेरे  ही  कहने  पर  मैंने

लहरों  से  होड़ लगायी है

 

माना किश्ती पर है मेरी

पूर्वजन्म  का  भार अपार

हे  माझी !  मेरे कर्णधार !

मुझे ना छोड़ बीच मझधार।

 

चहुँ ओर फेनिल सागर है

जीवन जिसमें बूँद जरा-सा

इसके  अंदर  घूम रहा है

कुंठित होकर जीव मरा-सा

 

फूट पड़ा  तो मिट जावेगा

इसका  यह सुन्दर आकार

हे  माझी !  मेरे कर्णधार !

मुझे ना छोड़ बीच मझधार।

 

सोच  रहा था  तेरे रहते

थम जावेगी आँधी थककर

और सफीना मेरा अनुपम

पहुँच सकेगा तेरे तट पर

 

पर  तूने  तो पहले से ही

तोड़ फेंक दी चपल पतवार

हे माझी  ! मेरे  कर्णधार !

मुझे ना छोड़ बीच मझधार।

 

आँसू  के   खारे  पानी  से

मन  का  मैलापन  धोने को

मैंने   पीड़ा  को  माँगा  था

कुछ दुख का अनुभव होने को

 

पाल रहित नौका  करने का

पर तुने किया विचित्र विचार

हे  माझी !   मेरे कर्णधार !

मुझे ना छोड़  बीच मझधार।

 

अब तूफानों से कह भी दो

किश्ती तुमने तज डाली है

और  निराशा  मेरे मन में

गहरी  तुमने  कर डाली है

 

गर  तू मेरे कारण हताश

तो  मैं तेरी वजह लाचार

हे  माझी,  मेरे  कर्णधार

मुझे ना छोड़ बीच मझधार।

…..   भूपेन्द्र कुमार दवे

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