छाया अल्प सी वो

छाया अल्प सी वो बुझते दीप की अल्प सी छाया वो, साथी! उस छाया से मिलना बस सपने की बात….. प्रतीत होता जिस क्षण है बिल्कुल वो पास, पंचम स्वर में गाता पुलकित ये मन, नृत्य भंगिमा करते अस्थिर से दोनों ये नयन, सुख से भर उठता विह्वल सा ये मन, लेकिन है इक मृगतृष्णा वो रहता कब है पास…. उड़ते बादल की लघु सी प्रच्छाया वो, साथी! उस छाया से मिलना बस सपने की बात….. क्षणिक ही सही जब मिलते हैं उनसे जज्बात, विपुल कल्पनाओं के तब खुलते द्वार, पागल से हो जाते तब चितवन के एहसास, स्मृति में Continue reading छाया अल्प सी वो

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प्रतीक्षामय नि:स्तब्ध निशा

प्रतीक्षामय नि:स्तब्ध निशा निशा स्तब्ध सी है आज फिर कैसी, क्या फिर कोई मन प्रतीक्षा में बिखरा है यहाँ? रजनी रो पड़ी है ज्यूँ ओस की बूँदों मे, निमंत्रण यह कैसा अब इस सुनसान निशा में, क्या फिर कोई मन पुकार रहा प्रतीक्षा में यहाँ? तम सी सुरम्य काया खोई विरान निशा में, रजनीगंधा भी भूली है खुश्बु इस स्तब्ध निशा में, ये पल प्रतीक्षा के क्या हो चले हैं दुष्कर वहाँ? मन कहता है जाकर देखूँ कैसी है यह निशा, प्रतीक्षा के बोझिल पल वो खुद कैसे है गुजारता? क्युँ कोई पढ़ नहीं पाता प्रतिक्षित मन की दुर्दशा? प्रतीक्षा Continue reading प्रतीक्षामय नि:स्तब्ध निशा

हाँ, जिन्दगी लम्हा-लम्हा

हाँ, जिन्दगी लम्हा-लम्हा हाँ, बस यूँ गुजरती गई ये जिन्दगी, कभी लम्हा-लम्हा हर कतरा तृष्णगी, कभी साँसों के हर तार में है रवानगी, बस बूँद-बूँद यूँ पीता रहा मैं ये जिन्दगी। हाँ, कभी ये डूबी छलकती जाम में, विहँसते चेहरो के संग हसीन शाम में, रेशमी जुल्फों के तले नर्म घने छाँव में, अपने प्रियजन के संग प्रीत की गाँव में। हाँ, रुलाती रही उस-पल कभी वो, याद आए बिछड़े थे हमसे कभी जो, सिखाया था जिसने जीना जिन्दगी को, कैसे भुला दें हम दिल से किसी को? हाँ, पिघलते रहे बर्फ की सिल्लियों से, उड़ते रहे धूल जैसे हवाओं Continue reading हाँ, जिन्दगी लम्हा-लम्हा

नयी आशा

नयी आशा नयी आशा ज्योति के संग मन प्रकाशित करना होगा जग में प्रणय सुरभि फैलाने नवल कुसुम को खिलना होगा धूमिल सपने होते रहे नव स्वप्न पथ चुनना होगा सत्यता की धरा पर ऐसे नवल कुसुम को खिलना होगा पराजिता का संकल्प अब विजय-पथ को मिलना होगा वैजयन्ती माला पहनने नवल कुसुम को खिलना होगा हर ज्वाला से लड़ने हेतु अग्निपथ पर चलना होगा मन-मंदिर की खुशबू से अब नवल कुसुम को खिलना होगा  

मेरी मधुशाला

मेरी मधुशाला सम्मुख प्रेम का मधुमय प्याला, अंजान विमुख दिग्भ्रमित आज पीने वाला, मधुमय मधुमित हृदय प्रेम की हाला, सुनसान पड़ी क्युँ जीवन की तेरी मधुशाला। हाला तो वो आँखो से पी है जो, खाक पिएंगे वो जो पीने जाते मधुशाला, घट घट रमती हाला की मधु प्याला, चतुर वही जो पी लेते हृदय प्रेम की हाला। मेरी मधुशाला तो बस सपनों की, प्याले अनगिनत जहाँ मिलते खुशियों की, धड़कते खुशियों से जहाँ टूटे हृदय भी, कुछ ऐसी हाला घूँट-घूृँट पी लेता मैं मतवाला। भीड़ लगी भारी मेरी मधुशाला मे, बिक रही प्रीत की हाला गम के बदले में, प्रेम Continue reading मेरी मधुशाला

पत्थर

पत्थर मैं पत्थर हूँ घाट का पत्थर । पानी लोटता है मुझ पर कितना स्नेहिल हूँ मैं उसके प्रति लहरें थपेड़े मारती हैं मैं कुछ नहीं बोलता । पैर भी गन्दगी रगड़ रगड़ कर मुझ पर नहीं साफ़ करते क्ा लोग? मैं भला कुछ कहता हूँ क्या ! पत्थर…. मैं पत्थर हूँ धोबी घाट का पत्थर ! धोबी की आजीविका का माध्यम हूँ मैं मेरे सीने से पूछो कि…त…..नी चोटें कपड़े पटक पटक कर मारी हैं उसने। पत्थर…. मैं पत्थर हूँ एकान्त में पड़ा पत्थर ! कितना सौभाग्य है उनका जो मुझ पर दूब उगा लेते हैं। सहानुभूति का इतना Continue reading पत्थर

हम बंद कमरों में बैठे हैं

हम बंद कमरों में बैठे हैं… हम बंद कमरों में बैठे हैं, पंछी तो गीत गाते हैं, मां के पास वक्त नहीं है, बच्चे लोरी सुनना चाहते हैं। न कल कल झरनों नदियों की, न किलकारियां मासूम बच्चों की, संगीत नहीं है जीवन में, निरसता में पल बिताते हैं। वर्षों बाद गया चमन में, लगा जैसे स्वर्ग यहीं है, क्रितरिम हवा पानी से, हम अपनी उमर घटाते हैं। होता है जब घरों में बंटवारा, सूई तक भी बांटी जाती है, मां-बाप नहीं बंटते, न कोई उनको पाना चाहते हैं। पैसा है उपयोग के लिये, हम उपयोग मानव का करते हैं, Continue reading हम बंद कमरों में बैठे हैं

ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

  माँ मेरा मन बात ये समझ ना पाये है, ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।   पहले पापा मुन्ना मुन्ना कहते आते थे, टॉफियाँ खिलोने साथ में भी लाते थे। गोदी में उठा के खूब खिलखिलाते थे, हाथ फेर सर पे प्यार भी जताते थे। पर ना जाने आज क्यूँ वो चुप हो गए, लगता है की खूब गहरी नींद सो गए। नींद से पापा उठो मुन्ना बुलाये है, ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।   फौजी अंकलों की भीड़ घर क्यूँ आई है, पापा का सामान साथ में क्यूँ लाई है। साथ में क्यूँ Continue reading ओढ़ के तिरंगे को क्यूँ पापा आये है।

उफ, यह रात

उफ, यह डरी सहमी सी रात, तेज ढ़ले भी तो कैसे..,…..? उफ, ये रात ढलती है कितनी धीरे-धीरे, कितने ही मर्म अपने गर्त अंधेरे साए में समेटे, दर्द की चिंगारी में खुद ही जल-जलके, तड़पी है यह रात अपनों से ठोकर खा-खा के, उफ, यह बेचारी रात, तेज ढ़ले भी तो कैसे..,…..? पड़े हैं कितने ही छाले इनके पैरों में, दिन की चकाचौंध उजियारों मे चल-चल के, लूटे हैं चैन अपनों नें ही इन रातों के, सपन सलोने भी अब आते हैं बहके-बहके, उफ, यह तन्हा सी रात, तेज ढ़ले भी तो कैसे..,…..? सुर्ख रातों की गहरी तम सी तन्हाई, Continue reading उफ, यह रात

जीवनसाथी

तेरा हाथ हो मेरे हाथ में l ना डर लगे फिर साथ में ll ना कोई चिन्ता मुझे सताए l जब तू मेरा साथ निभाएं ll कैसी भी सोच हो किसी की l नहीं  परवाह मुझे किसी की ll तेरे लिए सब से लड़ जाऊंगा l सातो जन्म साथ निभाऊंगा ll तुमनें ही मुझे समझा l तुमनें ही मुझे जाना ll अपनों ने न की परवाह l मुझे बना दिया बेगाना ll हर मुश्किल में मेरा साथ निभाया l जब से तुम्हे जीवनसाथी बनाया ll खुश हू मैं,मुझे जो तुम मिल गयी l तुम्हें पाकर मेरी जिंदगी सवर गयी ll सोचता Continue reading जीवनसाथी

मेरे गीत नीलाम हो गये

मेरे गीत नीलाम हो गये अमोल बोल बदनाम हो गये दुल्हन-सी कुँवारी लय थी सुमधुर वह श्रंगार किये थी सजी सजायी शब्द पालकी भावी सुख का संसार लिये थी अर्थ भाव थे, समधी सुर थे पल में सब बदनाम हो गये मेरे गीत नीलाम हो गये अमोल बोल बदनाम हो गये सजी गीत की इक डोली थी बोल खड़े थे बाबुल द्वारे मंगलाचरण गाते गाते भाव विभोर हुए थे सारे मन पायल के भाव नुपुर थे पल में सभी नीलाम हो गये मेरे गीत नीलाम हो गये अमोल बोल बदनाम हो गये तभी उठी आवाज कहीं से देखो तुम भी Continue reading मेरे गीत नीलाम हो गये

आने वाली यादों मे हो तुम

आने वाली यादों मे हो तुम मेरी उम्मीद ,,, टूटे अरमानो मे हो तुम जो हो न पाये पूरे उन वादो मे हो तुम … हवाओ की रवानी मे हो रात की तनहाई मे हो सावन की बौछार मे हो तुम बसंत की बहार मे हो तुम कहा कहा बताऊ ? इंतजार मे हो मेरे  इकरार मे हो मेरे अधूरे प्यार मे हो मेरे मेरे बहाने मे हो तुम…. मेरी उदासी मे हो तुम मेरी खामोशी मे हो तुम टूटती बिखरती इस कहानी मे हो तुम.. आने वाली यादों मे हो तुम……..

फिर सावन आया है

सावन फिर सावन आया है फिर तुमसे मिलने को मन करता है तुम्हारी बातो की बौछारों मे फिर से भीग जाने का मन करता है॥   फिर सावन आया है फिर तुम्हें को निहारने का मन करता है मेरी भीगी आंखो मे देखो तुम्हें फिर से पुकारने को मन करता है॥   बिगड़ता -उजड़ता रहता हूँ तेरी यादों मे फिर सावन आया है तो तुमसे मिलने को मन करता है॥   फिर सावन आया है फिर प्यार तलाशने का मन करता है उलझी हुयी तुम्हारी भीगी जुल्फों को सुलझाने का मन करता है॥   फिर सावन आया है फिर तुमसे Continue reading फिर सावन आया है

सागर तट

सागर तट पर बैठ किनारे तू बाट जोहता मेरी है लौट रही क्या किश्ती मेरी तू राह जोहता मेरी है। तूने ही मेरी किश्ती को जरजर काया दे रक्खी थी टूटी-सी पतवार बिचारी मेरे हाथों दे रक्खी थी फिर प्रचंड तूफां को तूने फुसलाया था, बिचकाया था ऊँची उठती लहरों को भी चुपके से जा उकसाया था अब क्यूँ पछताता है तू ही कुछ कुछ गल्ती तो मेरी है अब क्यूँ उदास बैठ किनारे तू बाट जोहता मेरी है। सागर तट पर बैठ किनारे तू बाट जोहता मेरी है लौट रही क्या किश्ती मेरी तू राह जोहता मेरी है। हर्षित Continue reading सागर तट

मै प्रकृति होना चाहती हु

मै प्रकृति होना चाहती हु नीले आसमान तले ढ़ेर सारी बदलियों के धुंधलके मे छिपी हुई पहाड़ियों को दूर तलक देखना चाह्ती हुं पर्वत की चोटी से घाटी की तली तक श्वेत भुरभुरी बर्फ को पिघलते बूंद-२ बहते देखना चाहती हुं पर्वत के शिखर पर गिरती सुनहली किरण को अपनी आंखो की चमक मे बदलते देखना चाहती हुं जहां तक नजर जाये उस हर एक ऊंचाई को अपने कदमो तले झुका कर फतेह पाना चाहती हुं पहाड़ के उदार सीने मे छिप कर, उसके आलिंगन मे उसकी विशालता को महसूस करना चाहती हु पवन की पुछल्ली बन ,दूर-2 तक अपने Continue reading मै प्रकृति होना चाहती हु