हाईकु

भोले भन्डारी त्रिनेत्र जटाधारी नन्दी सवारी त्रिशूल धारी भांग सेवन कारी है त्रिपुरारी कंठस्थ हाला पहन मुन्ड माला है भोलाभाला चन्द्र कपाल लपेट बाघ छाल करे कमाल शिव की स्तुति हृदय भाव भक्ति आशीष प्राप्ति त्रिलोक नाथ रहे नाग के साथ डमरू हाथ तुष्ट सरल कंठस्थ है गरल दाता सबल सजन Advertisements

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वेदना

मेरी तनहा सी रातों में हज़ारों गम के साये में कुछ लगते हैं अपने से तो कुछ लगते पराये से मुझे भी दिल के इस फन पे बहुत ही नाज़ होता है जहाँ भर के थपेड़ों को ये जैसे छुपाये है हमारी डूबी आँखों में ना अश्कों का सुराग होगा कहाँ गैरों में ये दम था हम अपनों के सताये हैं किसी दिन खाक के मानिन्द फ़ना होंगे हवाओं में अभी तो लाश हम अपनी यूँ मुश्किल से उठाये हैं संकेत मुरारका

पिया मिलन

पिया मिलन की बात सुनीसुनी सी रात, मन भीगा याद आई तेरी, मन बहका याद आये दिन वह मिलन के सावन के भीगी भीगी रातों मे, दूर गगन में जब बिजली चमकी, बाँहे फैलाये तू लता सी चिपकी ! आँहे तेरी, जैसे बजा राग मल्लाहर सखी, जैसे बैठी हो कर सोलह शृंगार सुर्ख नैनों में आतुरता की धार ! लगा मधुर स्पर्श जैसे शीतल फुवार, काली घटा में चमकी मन की आग सांसे तेरी छेढ़ गई समर्पण के राग नभ में समाये बादल,भीगी भीगी रात सखी तुम में समाये हम,मिलन की सौगात ! सो न पाये, करवटें बदलते बीती सारी Continue reading पिया मिलन

विरह

सावन की रात ,तूफानी बरसात नयनों से झरते नीर, बहे एक साथ, आँखों की पीढ़ा छिपाये दोनों हाथ, सिसक-सिसक नीर झरे, जैसे बरसात, घनघोर घटाओं में जब बिजली चमके , मन की दीपशिखा ढूँढें तुम्हे रोशनी लेके, ह्रदय का करुण आर्तनाद बिजली में कढ़के बाहर में सावन,अन्दर पीढ़ा आंसुओं से छलके, विरह में बीती रात,कोकील जैसे भोर सवरे गहन मन की शाखाओं परे,यादों के सहारे, विरही केका कुहु-कुहु नहीं, तेरा नाम उच्चारे भीगे-भीगे आँचल में सर्द-शीतल दिल तुम्हे पुकारे -सजन

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी बे-परवाह जब ये ज़िन्दगी हुई, क़ीमत अश्क़ की तब मालूम हुई, * हँसी के तराने गुम हुए खुद-ब-खुद, दोस्तों की जब से कमी हो गई, * रास नहीं आयी उसे मेरी ये हँसी, शायद…. मेरा ये ग़म जब किसी की ख़ुशी हो गई…. * * # विराज़

नवगीत

ओह, कितना शोर है अन्दर, बाहर निश्चुप कितने बिचारों का समागम फिर भी जुवां है मौन आवाज़ की इस दुनिया में बेरहम हो गये शब्द और मन सुन रहा अपनी ही आवाज़ हरदम । मेरे बैचेन मन की आवाज़ धड़कन में बज रही इन उठती गिरती स्वांसों से मन के अन्दर दिल में पल पल प्रतिपल हर पल जिस की लय भी और ताल भी, नृत्य करते यादों में अदृश्य होकर दृश्य भी । अपनी चीखें ,अपने रूदन सोच के सागर में डुबा हुआ खुद मन भंवर सा और डुबता उभरता प्रतिक्षण जग हंसाई का कारण तमाश बन गया है Continue reading नवगीत

देह गंध

यह देह गंध खोज रहा मिलन- जैसे महक रहा चंदन या फूलों का उपवन या शृंगार में कस्तूरी मन फूलों से सजकर आई जैसे की चमेली की डालियाँ या उड़ती बलखाती तितलियाँ या नभ में चमकती बिजलियाँ मेरे आंगन चांदनी छाई जैसे आलोकित हो रही निशा या बिन पीये छाया कोई नशा या रंग बिरंगे फूलों का गुलदस्ता है मिलन की आतुराई जैसे आकाश में लहराती पतंग या तट तोड़ती जलधारा की उमंग या उफनती लहरों की तरंग शीतल चांदनी मन्द मन्द मुस्कुराई जैसे घर के आगे तुलसी हर्षाई या भीगे आंचल में लज्जा छिपाई ओठ में गुलाबी लाली लज्जाई Continue reading देह गंध

मेघदूत

दूत, अति प्रिय दूत, नभ में विचरते अद्भुत कालिदास की कल्पना के मेघदूत कर दो ना मेरा एक काम छोटा सा पंहुचा देना प्राणप्रिया को संदेशा तुम बिन है उदास, जल बिन मछली सा विचारों के धूप छांव तले नभ में जब बादल डोले अन्तर मन कवि की कल्पना में बोले रंगीन कोई सपना लाचारी में विरह अगन जलना कारण तुम बनो, मेरा संदेश पंहुचाना समय की धारा बहे अविराम प्रिया बिन न दिल को चैन न आराम हे मेघ, असहाय हूं, करो ना दूत का काम काले कजरारे बादल में बिजली चमके धड़कन हिया में प्रेयसी के लिये धड़के Continue reading मेघदूत

भारत यश गाथा

“भारत यश गाथा” ज्ञान राशि के महा सिन्धु को, तमपूर्ण जगत के इंदु को, पुरा सभ्यता के केंद्र बिंदु को, नमस्कार इसको मेरे बारम्बार । रूप रहा इसका अति सुंदर, है वैभव इसका जैसा पुरंदर, स्थिति भी ना कम विस्मयकर, है विधि का ये पावन पुरस्कार ।।1।। प्रकाशमान किया विश्वाम्बर, अनेकाब्दियों तक आकर, इसका सभ्य रूप दिवाकर, छाई इसकी पूरे भूमण्डल में छवि । इसका इतिहास अमर है, इसका अति तेज प्रखर है, इसकी प्रगति एक लहर है, ज्ञान काव्य का है प्रकांड कवि ।।2।। रहस्यों से है ना वंचित, कथाओं से भी ना वंचित, अद्भुत है न अति किंचित्, Continue reading भारत यश गाथा

बीते पल

बीते पल यादो के झुरमुट से कोई पत्ता, आया उड़ते हुवे ; उस पर कुछ धुल जमी थी, मन है कि मचल पड़ा, पुरानी स्मृतिया, आतुर आँख देखे बरसे न जाने कैसी कैसी यादें घुमे नज़र मे दिन पुराने, एक दुसरे का साथ निभाना, जीने-मरने की कसम, घर बसाने का सपना, जानना चाहता हूं कि- बिछड़ने के बाद, क्या था जो जोड़े रखा हमे, मन आज भी तड़पता, अकेले होकर कभी कभी, सब के बीच तलाश करता, पुराने दिन कि – अटखेलियाँ करती नादानीयां रिमझिम बारिस मे भीगना, कानो मे गुनगुनाये पैजनीया, खिलखिलाना,हँसना-हंसाना, और कितनी कितनी बातें, लिपट पड़ती बांहों Continue reading बीते पल

गम के साये में

गम के साये में मेरी तनहा सी रातों में हज़ारों गम के साये में कुछ लगते हैं अपने से तो कुछ लगते पराये से मुझे भी दिल के इस फन पे बहुत ही नाज़ होता है जहाँ भर के थपेड़ों को ये जैसे छुपाये है हमारी डूबी आँखों में ना अश्कों का सुराग होगा कहाँ गैरों में ये दम था हम अपनों के सताये हैं किसी दिन खाक के मानिन्द फ़ना होंगे हवाओं में अभी तो लाश हम अपनी यूँ मुश्किल से उठाये हैं संकेत मुरारका

कविता पर विरोधाभास

कविता पर विरोधाभास दोपदिया की कविता पर आये विचार से बहुत हद तक सहमत हूं। परन्तु तुलनात्मक स्थिति में विरोधाभास यह है:- कविता महज आँसू नहीं है मन की अभिव्यक्ति, पीड़ा, दर्शन, खुशीयां, जिसे चाहिए सहानूभूति परन्तु शिष्टता की सीमा लाघंकर नंगापन दिखायें और इसे शालीनता या अशालीनता की जंग समझाये जो कभी नहीं रोये…. उतारे जाते जान्घियों पर फाड़े जाते पेटीकोटों पर और मूंछों के नाम गाढ़े जाते जातीय झंडों पर जांघों के बीच वह क्या फिर जानवर हो जाये जानवरों के वंशज इसलिये की भूल गए हैं शायद ये कि कपड़ों के नीचे हर कोई नंगा होता है Continue reading कविता पर विरोधाभास

देश प्रेम

देश प्रेम हर कोई सोचे देश का भला हो जाएगा नेता अगर करते काम सब कुछ हो जाएगा ज़िम्मेवारी हमारी कोन किसे बताएगा जनता नेता का भरोसा कर ग़र सो जाएगा देश मिरा दुजा कोई क्यों काम कराएगा ध्यान लगा जरा सोचें कैसे हो जाएगा अपना घर अपने संवारे तब हो पाएगा सोच बदले सब तो सही में कुछ हो जाएगा कहने हम कहे पर देश कैसे बदल पाएगा सजन देख बिमारी कहे कैसे हो जाएगा सजन

इशारा

इशारा निशा मिलन भोर का उजियारा चिल मिलाती धुप में अँधियारा सुबह खोजे दिल चाँद- तारा मन में गहरा प्यार का उजारा नदी से मिलने आतुर किनारा कोमल शीतल हाथों ने दुलारा सासों की महक ने संवारा निर्मल पवन सा स्पर्श सारा मीठी मीठी तकरार का सहारा सपनों में भी हरदम वही नजारा उलझे उलझे लटों का इशारा दिल की चुभन, दर्द प्यारा प्यारा मूक अधरों का सहारा नयनों से बहे अश्रुं धारा धड़कनों में दिल बेसहारा यह ही तो है प्यार का इशारा सजन

प्रतिवेदन

प्रतिवेदन इतिहास से वर्तमान तक आंखों की किरकिरी जमते जमते पत्थर बन चुके अवहेलित अवस्था इन पत्थरों पर सिसकती और बहती पीड़ा की धारा झर झर बहे आंखों से मृत मानवता के पहाड़ों पर, बिन गति रोध हर पल उलझते पर नहीं भीगाता किसी का मन किसी के लिये दुःख में आओ, अब थोड़ा रो ले यों ही आंखों में अंधी धूल लिये सिर्फ किरकिरी में असहाय,परबस, जैसे सदीयों से रोेते आये लोग हर पल, पल पल यह ही तो है चलन….. वर्तमान का प्रतिवेदन । सजन