उस लम्हा

उस लम्हा काश हम थोड़ा ठहर गए होते, जब तेरे दिल में उतर जाना चाहते थे। ** हमने इतने इत्मीनान से उन्हें खो दिया, जितने होश से वो हमे पाना चाहते थे। ** हमें याद नही आई तुम्हारी, तुम भी हमे भुलाना चाहते थे। ** ठुकराए जाने के बावजूद, तेरे ही दर पर आना चाहते थे। ** अँधेरा था बहुत मेरी जिंदगी में, तेरे दिल में कोई जोत जालना चाहते थे। Advertisements

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स्वदेशी अपनाये ,दिवाली मनाये

स्वदेशी अपनाये ,दिवाली मनाये भारतीय संस्कृति का पर्व है भारतीय त्यौहारl जगमग दीप जलाकर रोशन करे घर-बाहरll भीनी-भीनी मिट्टी लेकर आओ दीप बनाये l दीपो की इन मालाओ से घर-आँगन सजाएँ ll चावल,हल्दी और रोली से रंगोली हम सजाएँ l लक्ष्मी जी को आने का निमंत्रण हम दे आये ll दिवाली है  ख़ुशी का पर्व  खुशियां हम फैलाये l भारत में ही निर्मित स्वदेशी वस्तुऍ अपनाये ll चीन का ये पर्व नहीं ,   भारतीय पर्व है भाई l फिर कैसे चाइना ने , बाज़ारो  में सेंध लगाईll मिलकर करो बहिष्कार न ले चाइना सामान l अपना पैसा यही रहे Continue reading स्वदेशी अपनाये ,दिवाली मनाये

शून्य शिखर

शून्य शिखर पाँव टिका शून्य शिखर पर मौन   चला   घर  के अन्दर सहस्त्र  सूर्य  है  जगर-मगर अंतर्दर्शन   हो   रहा   साकार दिव्य    ज्योतिपूंज    प्रकाशित सुन्दरतम अभिव्यक्ति प्रदर्शित अंतर्जगत   का  मनोहर संसार लघुता     से     प्रभुता    विस्तार इच्छाएं  बैठी  मार  के  पालथी मन    को    मिल   गया  सारथि खुले अनंत संभावनाओं के द्वार मनुज कर पाता आत्मसाक्षात्कार ऊर्जा का असीम भंडार यहाँ सृजन  का  हर सामान यहाँ हर    क्षण   शक्तिपात   यहाँ अमरता   का  वरदान यहाँ  —-

पहले तोलो, फिर बोलों

पहले तोलो, फिर बोलों कैसे वो बिन सोचे कुछ भी कह जाते है l बिन हड्डी की वो , ज़बान चला जाते है ll हर किसी का वो यूँ ही मज़ाक बनाते है l अपनी बारी पर,वो यूँ गुस्सा हो जाते है ll अच्छा है बोलना, हमें बोलना चाहिए l बोलने से पहले , हमें तोलना चाहिए ll तीखे शब्दों के बाण दिल चिर जाते है l जिंदगी भर का , गमे दुःख दे जाते है ll आसान है किसी को पराया बनाना l मुश्किल है अपनों को जोड़ पाना ll ऐसा बोलों जो दिल को छू जाये l रोते Continue reading पहले तोलो, फिर बोलों

हे प्रभू ! अब मृत्यु द्वार खोल

हे प्रभू ! अब मृत्यु द्वार खोल देखूँ तेरा प्रकाश किधर है ? हे अंध काल ! रोष फन खोल बता तेरा आक्रोश किधर है ? अपने ही आँसू के छींटे अपने दर्पण पर हैं बिखरे अहंकार ने पहन रखे हैं व्यथा-वेदना के से चिथड़े अब जीवन में मिथ्या मत घोल हे प्रभू ! अब मृत्यु द्वार खोल आने वाले कल की बाँहें कल से मुझसे लिपट रहीं हैं काम, क्रोध, मद, माया मुझको आलिंगन में सिमट रहीं हैं बोल, राम नाम सत्य का बोल हे प्रभू ! अब मृत्यु द्वार खोल चंचल मन ले काया मेरी अहंकार में भटक Continue reading हे प्रभू ! अब मृत्यु द्वार खोल

अक्षरदीप जलाना है

अक्षरदीप जलाना है जो सिसकी सी होती है जो दुबकी सी होती है जो अटकी सी होती है जो भटकी सी होती है उनको साक्षर बनाना है अक्षरदीप जलाना है जो सिमटी सी होती है जो चिमटी सी होती है जो लिपटी सी होती है जो पलटी सी होती है उनको साक्षर बनाना है अक्षरदीप जलाना है जो लुढ़की सी होती है जो ऊढ़की सी होती है जो फटकी सी होती है जो लटकी सी होती है उनको साक्षर बनाना है अक्षरदीप जलाना है जो धँसती सी होती है जो फँसती सी होती है जो थमती सी होती है जो Continue reading अक्षरदीप जलाना है

तीन तलाक

तीन तलाक ………………………………………………….. मेरे इस्कूल जाते वक्त तीन तीन घंटे, तेरा मेरे दिदार का तकल्लुफ दिखते ही मेरे, तेरे चेहरे पर रंगत आ जाना मेरे बुर्कानशीं होकर आने पर वो तेरी मुस्कान का बेवा हो जाना मेरे इस्कूल ना जाने कि सूरते हाल में तेरा गली में साइकिल की घंटियां बजाना सुनकर खो गई थी मैं, और तेरी जुस्तजू में दे दिया था मैंने मेरे अपनों की यादों को तलाक कबूल है, कबूल है, कबूल है…… वो जादुई तीन शब्द और तेरा करके मूझे घूंघट से बेपर्दा, करना मुझसे पलकें उठाने की गुजारिश वो मुखङा दिखाने की आरजू-ओ-मिन्नत लेटकर मेरी Continue reading तीन तलाक

आत्म-परीक्षण

आत्म-परीक्षण तुमने मुझे हँसाया मैं हँस पड़ी तुमने मुझे रुलाया मैं रो पड़ी एक कठपुतली की तरह अपने हाँथ में धागे थाम जैसा चाहा मुझसे करवाया लेकिन एक दिन ऐसा करते-करते गहरी थकान में डूब गई भला रोज-रोज कब तक किसी के इशारों पर डोलती फिरू चली आई सब-कुछ छोड़ कर बिना बताये तुम्हारे सभी प्रश्नों को अनुतरित छोड़ कर हक्के-बक्के से तुम तुम्हारे अहम् को गहरी ठेस लगी और तुम नफरत से भर गए आ गए ना, अपने असलियत में तुमने अपने हिसाब से मेरा व्यक्तित्व गढ़ा था मैंने भी तो यही किया था मेरे लिए तुम्हारा प्रेम तुम्हारे Continue reading आत्म-परीक्षण

शतरंज

शतरंज हाथी घोङा ऊंट रानी, इक वजीर और आठ पैदल चौसठ घरों में झरझर बहती, शतरंज की कलकल हर एक की अलग चाल, हर एक की अलग पहचान बङे बङे नाम सबके, पर पैदल के पीछे छिपे मकान सबसे आगे छाती जिसकी, चार गुना है संख्याबल एक घर की पहुंच दी उसको , किमत सबसे निर्बल जैसे चाहा चलवाया इनको, अतिलघु आकार दिया जब भी आयी विपदा कोई,इन बेचारों को मार दिया ऐसी ही शतरंज बिसातें, हर और बसी हैं इस जग में नजर घुमा कर देख जरा, कुचल रहे हैं ये पग पग में बीज बोवता है इक पैदल, Continue reading शतरंज

आवागमन

आवागमन कंधे पर बोझ भारी उठाना मुश्किल फेकना होगा थोड़ा-थोड़ा हर बार जाना ही होगा फिर लौट आने के लिए आवागमन तब तक रहेगा जब तक भारमुक्त ना हो जाऊ मेरे अपने मेरे प्रिय उदास ना हो अभी वक्त है ये सिल-सिला ऐसे ही ख़त्म नहीं होगा अभी तो आना-जाना लगा रहेगा ——–

कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने

कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने उतार मुझे सूली से खुद को चढ़ा लिया है खुदा ने। कितनी अनोखी सौगात वो देता रहा है मुझको अपने अश्क मेरी आँखों अब केे दिया है खुदा ने। अब के साल गिरह में देखना वो तोहफा न लाये हर बार इक बरस देने का वादा किया है खुदा ने। आखरी साँस तलक तो सबको जीना ही होता है मेरी हर साँस को आखरी बना दिया है खुदा ने। मेरी बंद मुठ्ठी में रख कहा इसे मत खोलना कैसे अब बताऊँ कि मुझे क्या क्या दिया है खुदा ने। पकड़कर हाथ Continue reading कितनी आसानी से मशहूर कर दिया है खुदा ने

सजग प्रहरी

सजग प्रहरी आज कुछ देर फेक कर मेरा मैं चुप्पी साध लूँ बंद कर लूँ सभी दरवाजे और खिड़कियाँ चारों ओर अंधकार घनघोर खुली आँखों में भर लूँ तिमिर साँसों की लय पर लो, थिरक रही ध्वनियाँ ढोल और नगाड़े चिड़ियों की चह-चहाटे बादलों की गड़-गड़ाहटें समुंद्र की गर्जन झींगुर की तान समुंद्र के गहरे तल से भी गहरे तल पर खिल रहे कमल दल मैं सजग प्रहरी शांत चित यहाँ ठहरू कि होने ही वाला है सूर्योदय —–

शहीद

शहीद अभी-अभी पत्नी नहायी होगी माथे पर बिंदियाँ माँग में सपने सजाई होगी अभी-अभी बिटियाँ सहेलियों संग खिल-खिलाई होगी अभी-अभी बेटा, पिता जैसा बनने का ख्वाब बुना होगा अभी-अभी माँ को हिचकी आई होगी बेटे की याद सताई होगी अभी-अभी बीमार पिता को उसका मनी-आँडर मिला होगा चिंता की लकीरें मिटी होगी अभी-अभी बहन को हल्दी चढ़ी होगी हाथों में मेहंदी लगी होगी हसरतें उड़ान भरी होगी अभी-अभी पैगाम आया है तिरंगा में लिपटा शहीद आया है अभी-अभी सबकी आँखों में समंदर उतर आया है अभी-अभी दर्द के सैलाब में एक परिवार अचानक बह गया है —-

शायरी

शायरी ये मौसम बदलता जा रहा है रंग अपना, और वो अपनी बात पर कायम है। सुबह आफ़ताब के आगोश में है, जिद्दी है अँधेरा, रात पर कायम है। *** *** हर लम्हा उसके ख़्वाबों में कायनात बसर होती है, रात ढलती तो है, पर कहाँ सहर होती है। *** *** उसकी आँखों में जो नफ़रत नज़र आती है, उसके पीछे एक प्यार की प्यारी कहानी है। ये दर्द की सलवटें जो चेहरे पर सजी है, उसके नादान गुनाहों की निशानी है। *** *** उसने कहा था भूल जाने को, अक्सर हमें वो ही बात याद आ जाती है। *** Continue reading शायरी

दीप जलाऊँ तेरे संग

दीप जलाऊँ तेरे संग खुशियों और उमंग से भरा दीप लड़ियों का दीपावली है त्यौहार , मन हो रहा है उदास उन मासूमों की खतिर , नहीं है पास जिनके कोई साधन जो मनाएं वो भी एक बार ख़ुशी से त्यौहार , क्या लाऊँ ,क्या बनाऊँ सूची बनाने  को मन फिर भी है बेक़रार , मिटटी के दिए अपने द्वार जलाने को लायी हूँ मैं इस बार , मन में थे यह विचार हो जायेंगे रोशन शायद उनके भी  आँगन और द्वार , जिनके मिटटी से सने हाथों ने दिया इन दीयों को रूप और आकार , चमकती ,सजी दुकानों Continue reading दीप जलाऊँ तेरे संग