छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   कँप कँप लहरें उठती जाती हर छंद बद्ध के मंथन की गीतों में उठती जाती है हर छवि तेरे दर्शन की।   ज्यों कंपित कंठों में राग छिपा है सुन्दर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   नभ में उड़ते खगगण सारे करते हैं नवगीत तरंगित इससे मौन-हृदय में होती गीतों की हर रचना मुखरित।   जैसे सुख-दुख छिप जाते हैं मेरे अंदर मेरे गीतों में छिप जाता है परमेश्वर।   छिप जाती सीपी सागर में मोती भी सीपी के अन्दर वैसे छिपते Continue reading छिपा है जैसे तेरी मृदु वीणा में स्वर

पुकारता मन का आकाश

पुकारता मन का आकाश पुकारता है आकाश, ऐ बादल! तू फिर गगन पे छा जा! बार बार चंचल बादल सा कोई, आकर लहराता है मन के विस्तृत आकाश पर, एक-एक क्षण में जाने कितनी ही बार, क्युँ बरस आता है मन की शान्त तड़ाग पर। घन जैसी चपल नटखट वनिता वो, झकझोरती मन को जैसे हो सौदामिनी वो, क्षणप्रभा वो मन को छल जाती जो, रुचिर रमणी वो मन को मनसिज कर जाती जो। झांकती वो जब अनन्त की ओट से, सिहर उठता भूमिधर सा मेरा अवधूत मन, अभिलाषा के अंकुर फूटते तब मन में, जल जाता है यह तन Continue reading पुकारता मन का आकाश

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था जिसपे नाज था मुझको वो गुलिस्तां यहीं था   ना हो यकीं तो उठती लहरों से पूछ लो मेरी किश्ती यहीं थी और तूफां यहीं था   खुशबू मेरे अश्क की आती है यहीं से मैं पीता था जहां बैठ वो मैकदां यहीं था   ये अंधेरा नहीं  नूर-ए-मजार-ए-उजाला है बुझे थे चिराग यहीं पे उठा धुआं यहीं था   गुल खिले अदा के यहीं वफा की खुशबू लिये इश्क बागवां यहीं था हुस्न शादवां यहीं था   फुटपाथ पर पड़ी लावारिश लाश मेरी थी ये Continue reading तिनके बताते हैं मेरा आशियां यहीं था

कहानियाँ

कहानियाँ जीवन के विविध जज्बातों से जन्म लेती हैं कहानियाँ। कहानियाँ लिखी नहीं जाती है यहाँ, बन जाती है खुद ही ये कहानियाँ, हम ढ़ूंढ़ते हैं बस अपने आप को इनमे यहाँ, यही तो है तमाम जिंदगी की कहानियाँ। किरदार ही तो हैं बस हम इन कहानियों के, रंग अलग-अलग से हैं सब किरदारों के, कोई तोड़ता तो कोई बनाता है घर किसी के, नायक या खलनायक बनते हम ही जिन्दगी के। भावनाओं के विविध रूप रंग में ये सजे, संबंधों के कच्चे रेशमी डोर में उलझे, पल मे हसाते तो पल मे आँसुओं मे डुबोते, मिलन और जुदाई तो Continue reading कहानियाँ

मेरे गीतों की बगिया में

मेरे गीतों की बगिया में मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सत रंगी फूलों से सुर ले तू रचता जीवन मेला था। राग-रागिनी पूर्ण हुई जब अंतिम गीतों की बारी थी तू पतझर बनकर आ बैठा जब महकी यह फुलवारी थी। तोड़ गया तू उस डाली को जिस पर मेरा डेरा था मेरे गीतों की बगिया में तू बसंत-रुत बन खेला था। सोचा था तू खगवृन्दों का गीत सुरीला बन आवेगा गूँज उठेगा गीत बाग में सुर जब मेरा सध जावेगा। सुप्त हुआ पर भक्ति भाव जो तेरी वीणा से जागा था। मेरे गीतों की बगिया Continue reading मेरे गीतों की बगिया में

जीवन की पोथी

जीवन की पोथी लिखते है हर दिन हम एक-एक पन्ना जिंदगी का, कुछ न कुछ हर रोज,  एक नई कलम हाथों में ले, अपने कर्मों की गाथा से, भरते हैं जीवन की पोथी, ये पन्ने इबारत जीवन की, कुछ खट्टी कुछ मीठी। ये पन्ने सामान्य नही हैं,जीवन की परछाई है ये तेरी, थोड़ा बहुत ही सही, झलक इसमे व्यक्तित्व की तेरी, कर्मों का लेखा जोखा इसमे, भावुकता इसमें है तेरी, ये पन्ने कल जब पढ़े जाएंगे, पहचान बनेगी ये तेरी। हश्र क्या होगा इन पन्नों का, रह रह सोचता प्राणी! क्या इन पन्नों में छपेगी, मेरे सार्थकता की कहानी? पोथी Continue reading जीवन की पोथी

याद है

याद है आपका वो मिलना तो याद है दिलका वो खिलना तो याद है। जिस तरहा बिछड़े थे मोड़ पर और तुम्हें ही गवाँना तो याद है। देखते है सब नज़ारे  राह  पर आपका ही गुज़रना तो याद है। हँसकर हम टाल देते है  सदा, दिलमें गम पालना तो याद है। आँख से बहती तन्हाई जो कभी बेवजह ही चाहना तो याद है। -मनीषा “जोबन “

वक्त हीं कितना लगता है

वक्त हीं कितना लगता है ख़ुद ही जलकर नूर होने में सबके बीच मशहूर होने में . वक्त ही कितना लगता है सपने चकनाचूर होने में . शब्दभर का फासला है मिल जाने व दूर होने में . पहलू में खतरा ही खतरा एक बहादुर शूर होने में . दुनिया अब दुनिया लगती है तेरा एक सुरूर होने में . ©सत्येन्द्र गोविन्द 8051804177

चुप्पी

चुप्पी चुप वह है जो सबकुछ जानता – चुप वह भी जो कुछ नहीं जानता कुछ ऐसे भी -सबकुछ जानने का वहम पालते है- वे कभी चुप नहीं रहते कुछ वे है जो चुप्पी को लबादा की तरह ओढ़ते अजीब सी दुविधा में रहते न बोल सकते न चुप रह सकते कसमसाहट में जीते बेबसी में मर जाते किन्तु उनकी चुप्पी व्यर्थ नहीं जाती चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती आँखों से हाथ के इशारों से पाँव की गतियों से सम्पूर्ण शरीर से गुजरती एक से दूजे में संवहित हो कलम/तुलिका/मुद्राओ से प्रदर्शित होती रहती सृजित कलाएँ बहुआयामी Continue reading चुप्पी

उभरते जख्म

उभरते जख्म शब्दों के सैलाब उमरते हैं अब कलम की नींव से….. जख्मों को कुरेदते है ये शब्दों के सैलाब कलम की नोक से….. अंजान राहों पे शब्दों ने बिखेरे थे ख्वाबों को, हसरतों को पिरोया था इस मन ने शब्दों की सिलवटों से, एहसास सिल चुके थे शब्दों की बुनावट से, शब्दों को तब सहलाया था हमने कलम की नोक से। ठोकर कहीं तभी लगी इक पत्थर की नोक से, करवटें बदल ली उस एहसास ने शब्दो की चिलमनों से, जज्बात बिखर चुके थे शब्दों की बुनावट से, कुचले गए तब मायने शब्दों के इस कलम की नोक से। अंजान Continue reading उभरते जख्म

फिर मिलेंगे हम

फिर मिलेंगे हम फिर मिलेंगे हम समुंद्र की लहरों पर समर्पण की नाव पर सवार अपने अपने आसुओं को विसर्जित करेंगे सदा के लिए विरहा की अग्नि से पिघला सूरज यादों के घनीभूत जलवाष्प बन कर बादल सा बरसेंगे होगी धरा सिंचित बीज होगा अंकुरित प्रेम पुष्प खिलेंगे सुगन्धित पवन उड़ा ले जायेंगे प्रेम का सन्देश फूलों और तितलियों के रंगों में घुल मिल मनोरम छटाएँ बिखेरेंगे गायेंगे झूम-झूम कर मिलन के गीत एक दूजे से जो पाया था पूनम की रातों में चांदनी बन बाटेंगे और एक दिन चमकते सितारे बन अपनी ही धुरी पर घूमते प्रेम धुन में Continue reading फिर मिलेंगे हम

मैं एक अनछुआ शब्द

मैं एक अनछुआ शब्द मैं अनछुआ शब्द हूँ एक! किताबों में बन्द पड़ा सदियों से, पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के, कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में, एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे। एक शब्द की विशात ही क्या? कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की, शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी, शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी, भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी। एक शब्द ही तो हूँ मैं! पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही, कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की, कौन पूछता है Continue reading मैं एक अनछुआ शब्द

मिथ्या अहंकार

मिथ्या अहंकार बिखरे पड़े हैं कण शिलाओं के उधर एकान्त में, कभी रहते थे शीष पर जो इन शिलाओं के वक्त की छेनी चली कुछ ऐसी उन पर, टूट टूटकर बिखरे हैं ये, एकान्त में अब भूमि पर । टूट जाती हैं ये कठोर शिलाएँ भी घिस-घिसकर, हवाओं के मंद झौकों में पिस-पिसकर, पिघल जाती हैं ये चट्टान भी रच-रचकर, बहती पानी के संग, नर्म आगोश मे रिस-रिसकर। शिलाओं के ये कण, इनकी अहंकार के हैं टुकड़े, वक्त की कदमों में अब आकर ये हैं बिखरे, वक्त सदा ही किसी का, एक सा कब तक रहता, सहृदय विनम्र भाव ने Continue reading मिथ्या अहंकार

भक्ति का तमाशा

भक्ति का तमाशा दाम लगाकर इंसान को ईमान खरीदते देखा है, जगराते में अक्सर मैंने खुदा को भी बिकते देखा है।। रंजिशों में इंसान इंसानियत भूल जाते है, बेबात-बेवजह अपने अपनों को मार देते है। तुमसे ज्यादा सगा तो वो जल्लाद निकला, मारने से पहले उसे मैंने आखरी ख्वाइश पूछते देखा है।।1।। वो सुनहरा बचपन अब केवल सपना बन कर रह गया, बचपन से ही मैं हुकूमत की लालच में मर गया। सिर्फ शरारते फितरत में होती तो आज जिंदगी कुछ और होती, मैंने बच्चो को भी अब साजिशें करते देखा है।।2।। चंद ग़ज़लें लिख दी हमने तो हम शायर Continue reading भक्ति का तमाशा

धुँधला साया

धुँधला साया आँखों मे इक धुंधला सा साया, स्मृतिपटल पर अंकित यादों की रेखा, सागर में उफनती असंख्य लहरों सी, आती जाती मन में हूक उठाती। वक्त की गहरी खाई मे दबकर, साए जो पड़ चुके थे मद्धिम, यादें जो लगती थी तिलिस्म सी, इनको फिर किसने छेड़ा है? यादों के उद्वेग भाव होते प्रबल, असह्य पीड़ा देते ये हंदय को, पर यादों पर है किसके पहरे, वश किसका इस पर चलता है। स्मृतिपटल को किसने झकझोरा, बुझते अंगारों को किसने सुलगाया, थमी पानी में किसने पतवार चलाया, क्युँकर फिर इन यादों को तूने छेड़ा ?