दर्द

दर्द दूसरो का दर्द सिर्फ वो ही समझ पाता है l जो उस दर्द से कभी होकर गुजर जाता है ll जो उस दर्द को महसूस ना कर पाया हो l वो क्या खाक दूसरो का दर्द समझ पाता हैll दर्द यूँ हर किसी को बताया नहीं जाता है l बताया जाता है उसे जो दर्द समझ पाता हैll वर्ना आपका दर्द एक मज़ाक बन जायेगा l हल नहीं निकलेगा सिर्फ बवाल बन जायेगा ll अगर ना मिले दर्द सुनने वाला कोई अपना l ईश्वर से कहो मन हो जायेगा हल्का अपना l कम से कम ये बातें आगे नहीं Continue reading दर्द

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आदमी

आदमी आदमी सोचता है, कुछ लिखे…… जिंदगी के अव्यावहारिक होते जा रहे समस्त शब्द से सार्थक वाक्य बना दे मुक्त हो जाए उन आरोप से जिसे स्वयं पर आरोपित कर थक चुका है, उब चुका है आदमी सोचता है,कुछ करे….. सतत मरते हुए कुछ पल जी ले जीवन के मसानी भूमि पर चंद उम्मीदों की लक ड़ियाँ ले कर जला डाले उदासीनता के कफ़न अचंभित कर दे आदमी ही आदमी को आदमी सोचता है, कुछ कहे ……. जो कह न पाया कभी किसी से और न जाने क्या क्या कहता रहा तमाम उम्र कि बस एक बार अपनी बात कह Continue reading आदमी

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? अभ्र पर जब भी कहीं, बजती है कोई शहनाई, सैकड़ों यादों के सैकत, ले आती है मेरी ये तन्हाई, खनक उठते हैं टूटे से ये, जर्जर तार हृदय के, चंद बूंदे मोतियों के,आ छलक पड़ते हैं इन नैनों में… क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? ऐ अभ्र की वादियाँ, न शहनाईयों से तू यूँ रिझा, तन्हाईयों में ही कैद रख, यूँ न सोए से अरमाँ जगा, गा न पाएंगे गीत कोई, टूटी सी वीणा हृदय के, अश्रु की अविरल धार कोई, Continue reading गूंजे है क्युँ शहनाई

हे प्रभू

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को दिया है उससे श्रंगार कर अवतरित हो ताकि हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम और भी प्रगाढ़ हो सके।) हे प्रभू! तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो।   देखो, कलियाँ ओसकण में शरमा रही हैं पंखुड़ियाँ भोले भ्रमर को तरसा रही हैं झूल डालियाँ उन्माद में लहरा रही हैं पराग चूम सुरभि पवन को बहका रही हैं।   सृष्टि का यह प्रकट प्रेम भी स्वीकार कर लो। हे प्रभू! तुम भी Continue reading हे प्रभू

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे हैं हम।   खुली जिल्द की सी किताब रही जिन्दगी खुले पन्नों तरह बिखरते रहे हैं हम।   पूछा सच्चे दिल से तो दिल ने कहा सुलझते सुलझते उलझते रहे हैं हम।   ख्याल में होती रही हर साँस की हार शुष्क पत्तों तरह बिखरते रहे हैं हम।   कभी तो आयेंगे वो मेरी कब्र पर यही सोच के बस मचलतेे रहे हैं हम। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

लाख मशक्कत के बाद

लाख मशक्कत के बाद वो रूप रंग उसका, वो हँसना मुस्कुराना उसका, वो चेहरे की रंगत, वो आँखों को मिचकाना उसका। गजलों में कैसे ये सब लिख पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो वक़्त बेवक्त साथ उसके सहेलियों का जमावड़ा रहता था, मैं कहना बहुत कुछ चाहता, लेकिन बस मुस्कुराकर रह जाता था। महोब्बत की बातें कैसे उससे बयाँ कर पाता मैं, लाख मशक्कत के बाद तो अकेले पारो से मिल पाता मैं।। वो आती थी जब भी मिलने बस उसे देखता रहता था, लबों तक आयी हुई बात भी बोल नही Continue reading लाख मशक्कत के बाद

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं।   रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर देखो कोमल सबका तन मन है।   चुन चुनकर सुन्दर फूलों को जब कर्म हमारे गुँथते हैं कर्म हमारे अंतर्मन का सृजन हमेशा करते हैं।   धर्म कर्म के इन फूलों से माला मोहक बनती है इसे समर्पित तुझको करके श्रद्धा प्यारी जगती है। तुझे नमन करने हम सब जन हृदय सजाया करते हैं और स्मरण जब तेरा करते अवगुण सत्गुण बनते हैं।   तेरी मूरत Continue reading हृदय हमारा फुलवारी है

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो लहरों का कंपन स्पंदन भी सागर में जा मिलने दो।   हो प्रभात भी सुखकर ऐसा कलरव करते खगगण जैसा और किरण की मादकता भी ओस कणों में छा जाने दो।   निर्जन वन में कूक रहे जो उनकी गुंजन मिल जाने दो मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो   ओम् शब्द की प्रतिध्वनि प्रखर करे शब्द का उद्घोष अमर और गीत जब जब गूँजे तो जग जीवन मुखरित होने दो।   माटी के नश्वर पुतलों को मानवता से Continue reading मेरे गीतों के आँचल में

सन्नाटे में छिप जाती है

सन्नाटे में छिप जाती है सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं। इसको सुनने जो कतराते उनको होती है लाज नहीं।   इस कारण जब ठोकर खायी इस पीड़ा ने तब उफ् न किया पथ के पत्थर चूम चूमकर घायल पथ का श्रंगार किया।   कहने को थी आगे मंजिल पर रुकने का साहस न मिला। नम पलकों से आँखों ने भी हर आँसू का संहार किया।   अधरों था अंकुश पीड़ा का खोल सका ना मन राज कहीं। सन्नाटे में छिप जाती है हर पीड़ा की आवाज कहीं।   काँटे हर पीड़ा के चुनके स्वप्न नीड़ Continue reading सन्नाटे में छिप जाती है

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता गर तू पतवार न बनता मैं क्यू नैया लेकर आता इस आँधी में तू ही आया मेरी नैया पार लगाया लहरें आती हँसती जाती औ उदास मैं होता रहता   निर्जीव नाव लिया हुआ ही मैं बस बीच भँवर में तड़पा होता। सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता।   गर तू जग से रूठा होता निष्ठुर बनकर बैठा होता कौन पूछता तुझे जगत में कौन तुम्हारी पूजा करता यही जानकर मैं तुझको यह पतवार हठीली दे आया   तब तेरे बिन लाचार बना मैं बस बैठ किनारे लहरें गिनता। सच, तेरे बिन Continue reading सच, तेरे बिन मैं कुछ ना होता

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी सुबह अलसायी अधखुली पंखुरियों सी चूमकर उड़ती हुई कुछ तितलियों सी   सभी हैं याद मधुमास को सहलाती हुई अंगड़ाईयाँ लेती कुछ अलसायी हुई आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई।   सिराहने बैठ मृदु स्पर्श करती हुई चेतना का श्रंगार बस करती हुई हर बात प्रणय का मुखरित करती हुई कुलबुलाती याद उर में भरती हुई   आ रही प्रेम बंधन में कसमसाती हुई बात Continue reading आ रही हैं याद सारी

संसार

संसार अंधकार की स्वीकृति तेजोमय प्रकाश है भयावहता की विकृति सुन्दरता की अनुकृति है एक दूजे में गुथा हुआ सुख –दुःख का भान है जन्म की किलकारियों में मृत्यु की थपकियाँ है शून्यता में पूर्णता है पूर्णता में शून्यता है असुरत्व का उत्पात भी देवत्व का साम्राज्य भी विराटता की अवधारणा भी लघुता में प्रचंडता भी कर्म की प्रधानता भी दंड का विधान भी शुभता वरदान भी संभावनाए अपार है अद्भुत तेरा संसार है

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद क्या रहस्य है यह आखिर क्यों हो जाता है बेमानी और नागफनी-सा दिन तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हो जाती है उदास मेरी तरह घर की दीवारें-सोफा मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर… क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से  तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता रह जाता हँ मैं तुमसे तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी… क्यों महसूसने लगता हूँ मैं Continue reading तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।   तूने तो सारा विष पीकर बूँदें इसमें छलका दी हैं धीरे धीरे मेरी काया कलुषित भावों से भर दी हैं     मैं भक्ति-भाव कैसे उर के कूट कूटकर भर सकता हूँ तूने तो कुछ बूँदों से ही यह विषमय पूरा कर डाला।   सासें हैं फुफकार बनी-सी जहर उगलती हैं बस प्रतिक्षण और जहर से जहर सरीखे भाव  उमड़ते हैं बस हर क्षण   सोता हूँ ज्यों चिरनिद्रा में ऐसा है मुझको कर डाला हृदय हमारा Continue reading हृदय हमारा रचकर तूने

आँसू

आँसू पलती नयनों में तरल तरल करती अठखेली चपल चपल दुःख संचित गगरी गरल गरल ले साथ चली वह मचल मचल छलकाती, सागर की बेटी नयनों में …… है तृप्त ह्रदय जो दहर दहर हो थिरक रही ज्यों लहर लहर अवसाद मिटाती प्रहर प्रहर दुःख के भँवर में ठहर ठहर लहराती ,सागर की बेटी नयनों में …….. बहती है निर्झर सी कल कल दुःख की तान छेडती पल पल बंद पलकों के निज भार से छल छल पीड़ा के अंबार से विकल उफनाती,, सागर की बेटी नयनो में……… रुदन होठों का सिसक सिसक   व्यथित मन की पीड़ा ले लपक Continue reading आँसू