तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

तुम्हारे मिलकर जाने के बाद क्या रहस्य है यह आखिर क्यों हो जाता है बेमानी और नागफनी-सा दिन तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हो जाती है उदास मेरी तरह घर की दीवारें-सोफा मेज पर धरी गिलास-तश्तरियाँ और हंसता-बतियाता पूरा का पूरा घर… क्यों डरने लगते हैं हम मन ही मन मौत से  तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों हमारी पूरी दुनिया और खुशियाँ सिमटकर समा जाती है तुम्हारे होठों की मुस्कुराहटों में तुम्हारे मिलकर जाने के बाद… क्यों घंटो हँसता और बोलता बतियाता रह जाता हँ मैं तुमसे तुम्हारे जाने के घंटों बाद भी… क्यों महसूसने लगता हूँ मैं Continue reading तुम्हारे मिलकर जाने के बाद

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।   तूने तो सारा विष पीकर बूँदें इसमें छलका दी हैं धीरे धीरे मेरी काया कलुषित भावों से भर दी हैं     मैं भक्ति-भाव कैसे उर के कूट कूटकर भर सकता हूँ तूने तो कुछ बूँदों से ही यह विषमय पूरा कर डाला।   सासें हैं फुफकार बनी-सी जहर उगलती हैं बस प्रतिक्षण और जहर से जहर सरीखे भाव  उमड़ते हैं बस हर क्षण   सोता हूँ ज्यों चिरनिद्रा में ऐसा है मुझको कर डाला हृदय हमारा Continue reading हृदय हमारा रचकर तूने

आँसू

आँसू पलती नयनों में तरल तरल करती अठखेली चपल चपल दुःख संचित गगरी गरल गरल ले साथ चली वह मचल मचल छलकाती, सागर की बेटी नयनों में …… है तृप्त ह्रदय जो दहर दहर हो थिरक रही ज्यों लहर लहर अवसाद मिटाती प्रहर प्रहर दुःख के भँवर में ठहर ठहर लहराती ,सागर की बेटी नयनों में …….. बहती है निर्झर सी कल कल दुःख की तान छेडती पल पल बंद पलकों के निज भार से छल छल पीड़ा के अंबार से विकल उफनाती,, सागर की बेटी नयनो में……… रुदन होठों का सिसक सिसक   व्यथित मन की पीड़ा ले लपक Continue reading आँसू

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो अपने करीब उजाला मन रखो।   जलने बुझने का खेल अजब है जिन्दगी को इसी में मगन रखो।   दुआ होती है बूँद नूर की जिगर में उम्मीद की किरन रखो।   सीखना तो परिंदों से सीखो उड़ान जितना, ऊँचा गगन रखो।   आखरी साँस तक ही जीना है जीवन में जीने की तपन रखो।   चलो तो बस खुदा की राह चलो चिराग उसी के दम रोशन रखो।   ——- भूपेन्द्र कुमार दवे           00000

जिन्दगी

जिन्दगी  कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी। जानी पहचानी दुनिया में नित नव रूप लिये मिलती है जिन्दगी।   बचपन में अनाथ-सी बेबस जवानी में ठगी मिलती है जिन्दगी। बूड़ी साँसों की खाई में लहूलुहान हुई दिखती है जिन्दगी।   चुभती हैं बेरहम साँस तो बड़ी छटपटाती मिलती है जिन्दगी। लड़खड़ाती, डगमगाती-सी बैसाखी थामे चलती है जिन्दगी।   समय सहम जाता है जब भी अंतिम साँस को तरसती है जिन्दगी कभी अपनी, कभी बेगानी कभी अनजान-सी लगती है जिन्दगी।   मीठी] तीखी कभी कसैली जहर उगलती लगती है जिन्दगी। कभी गरीबी में शर्माती कभी गरीबों पर अकड़ती Continue reading जिन्दगी