रक्तधार

रक्तधार अविरल बहती ये धारा, हैं इनकी पीड़ा के आँसू, अभिलाषा मन में है बोझिल, रक्तधार से बहते ये आँसू….. चीरकर पर्वत का सीना, लांघकर बाधाओं को, मन में कितने ही अनुराग लिए ये धरती पर आई, सतत प्रयत्न कर भी पाप धरा के न धो पाई, व्यथित हृदय ले यह रोती अब, जा सागर में समाई। व्यर्थ हुए हैं प्रयत्न सारे, पीड़ित है इसके हृदय, अन्तस्थ तक मन है क्षुब्ध, सागर हुआ लवणमय, भीग चुकी वसुन्धरा, भीगा न मानव हृदय, हत भागी सी सरिता, अब रोती भाग्य को कोसती। व्यथा के आँसू, कभी बहते व्यग्र लहर बनकर, तट पर Continue reading रक्तधार

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ख्वाब जरा सा

ख्वाब जरा सा तब!……….ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! कभी चुपके से बिन बोले तुम आना, इक मूक कहानी सहज डगों से तुम लिख जाना, वो राह जो आती है मेरे घर तक, उन राहों पर तुम छाप पगों की नित छोड़ जाना, उस पथ के रज कण, मैं आँखों से चुन लूंगा, तेरी पग से की होंगी जों उसने बातें, उनकी जज्बातों को मैं चुपके से सुन लूंगा, तब ख्वाब जरा सा मैं भी बुन लूंगा! मृदुल बसन्त सी चुपके से तुम आना, किल्लोलों पर गूँजती रागिणी सी कोई गीत गाना, वो गगन जो सूना-सूना है अब तक, Continue reading ख्वाब जरा सा

अतृप्ति

अतृप्ति अतृप्त से हैं कुछ, व्याकुल पल, और है अतृप्त सा स्वप्न! अतृप्त है अमिट यादों सी वो इक झलक, समय के ढ़ेर पर…… सजीव से हो उठे अतृप्त ठहरे वो क्षण, अतृप्त सी इक जिजीविषा, विघटित सा होता ये मन! अनगिनत मथु के प्याले, पी पीकर तृप्त हुआ था ये मन, शायद कहीं शेष रह गई थी कोई तृष्णा! या है जन्मी फिर……. इक नई सी मृगतृष्णा इस अन्तःमन! क्युँ इन इच्छाओं के हाथों विवश होता फिर ये मन? अगाध प्रेम पाकर भी, इतना अतृप्त क्युँ है यह जीवन? जग पड़ती है बार-बार फिर क्युँ ये तृष्णा? क्युँ जग Continue reading अतृप्ति

परखा हुआ सत्य

परखा हुआ सत्य फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? सूर्य की मानिंद सतत जला है वो सत्य, किसी हिमशिला की मानिंद सतत गला है वो सत्य, आकाश की मानिंद सतत चुप रहा है वो सत्य! अबोले बोलों में सतत कुछ कह रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? गंगोत्री की धार सा सतत बहा है वो सत्य, गुलमोहर की फूल सा सतत खिला है वो सत्य, झूठ को इक शूल सा सतत चुभा है वो सत्य! बन के बिजली बादलों में चमक रहा है वो सत्य! फिर क्युँ परखते Continue reading परखा हुआ सत्य

खिलौना

खिलौना तूने खेल लिया बहुत इस तन से, अब इस तन से तुझको क्या लेना और क्या देना? माटी सा ये तन ढलता जाए क्षण-क्षण, माटी से निर्मित है यह इक क्षणभंगूर खिलौना। बहलाया मन को तूने इस तन से, जीर्ण खिलौने से अब, क्या लेना और क्या देना? बदलेंगे ये मौसम रंग बदलेगा ये तन, बदलते मौसम में तू चुन लेना इक नया खिलौना। है प्रेम तुझे क्यूँ इतना इस तन से, बीते उस क्षण से अब, क्या लेना और क्या देना? क्युँ रोए है तू पगले जब छूटा ये तन, खिलौना है बस ये इक, तू कहीं खुद Continue reading खिलौना

त्यजित

त्यजित त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन में।  क्षितिज की रक्तिम लावण्य में, निश्छल स्नेह लिए मन में, दिग्भ्रमित हो प्रेमवन में, हर क्षण जला हूँ मैं अगन में… ज्युँ छाँव की चाह में, भटकता हो चातक सघन वन में। छलता रहा हूँ मैं सदा, प्रणय के इस चंचल मधुमास में, जलता रहा मैं सदा, जेठ की धूप के उच्छवास में, भ्रमित होकर विश्वास में, भटकता रहा मैं सघन घन में। स्मृतियों से तेरी हो त्यजित, अपनी अमिट स्मृतियों से हो व्यथित, तुम्हे भूलने का अधिकार दे, प्रज्वलित हर पल मैं इस अगन में, त्यजित हूँ Continue reading त्यजित