कठपुतली

कठपुतली जिंदगी में अनेको उतार-चढ़ाव आते है l जीतता है वही जो ये सब सह जाते है ll हर किसी का अच्छा समय आता है l धैर्य रखो बुरा समय भी काट जाता हैll मत करो घमंड, कभी अपने पैसो का l ये पैसा तो चलती फिरती धूप-छाँव है l आज अगर किसी ओर के पास है ये l तो कल ये किसी ओर का गुलाम है ll अहम् की आग में, ना जला करो l ना जाने कब ये, तुम्हे ही जला देगी l जिंदगी छोटी है,प्रेम प्यार से रहा करो l ना जाने कब मौत , गोद में Continue reading कठपुतली

रक्षा -बंधन

रक्षा -बंधन आया-आया, राखी त्यौहार आया l बहन ने भाई को, तिलक लगाया ll बांधी-बांधी फिर राखी कलाई पे l फिर बहन ने ,मुह मीठा करवाया l भाई ने बहन को, गले लगाया ll आया-आया ये, शुभ दिन आया l बहन ने भाई को ,तिलक लगाया ll दिया वचन भाई ने फिर बहना कोl हर सुख-दुख मे , साथ निभाऊंगाl तेरी आँखो मे ना ,आसू लाऊगा ll तुझे दिया अपना वचन निभाऊंगाl तेरी आवाज पे, दौडा मैं आऊगा ll आया-आया राखी त्यौहार आया l भाई ने बहन को , गले लगाया ll आया-आया राखी त्यौहार आया l भाई – बहन Continue reading रक्षा -बंधन

गिरगिट और इंसान

गिरगिट और इंसान पल में अक्सर बदल जाता है मौसम l पल में अक्सर बदल जाता है इंसान ll यू ही बदनाम है गिरगिट रंग बदलने मे l रंग तो अक्सर बदलता है , ये इंसान ll जो दिखता है,  वो वैसा होता नही l जो होता है ,  वो हमे दिखता नही ll मन में क्या छुपा हैं,ये हमे पता नही l जो सोचे वैसा हो,ये ज़रूरी तो नही ll पल में माशा और पल में तोला l पल में सब कुछ बदल जाता हैं ll मानते हो जिसको दिल से अपना l कभी-कभी वो भी बदल जाता हैं Continue reading गिरगिट और इंसान

ग़ज़ल- बयां करता हूँ

ग़ज़ल- बयां करता हूँ मैं मेरी ग़जल अपने सल्तनत के नाम बयां करता हूँ मैं इस चमन,देश से बेइंतिहा मोहब्बत करता हूँ मिला मुझको आंगन खुद को ख़ुशनसीब समझता हूं मेरा हर पल,हर कतरा इस देश के नाम बयां करता हूँ देखी नही मैने आजादी,खुदको मैने आजाद पाया गांधी,नेहरू,भगत,सुभाष, की भूमि को सलाम करता हूँ पूछते हैं मुझे मेरे यार कोनसा जहां है तेरे दिल में सीने को तान अपने नाम हिंदुस्तान बतलाता हूँ कभी न थामा इन हाथों ने कोई और पताका अरे हिंदुस्तान वासी हूं हर वक्त तिरंगा लहराता हूं टेके फिरंगियों ने घुटने इन पर्वत रूपी शीशो Continue reading ग़ज़ल- बयां करता हूँ

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

उन गीतों को तुम सुर तो दे दो जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। जो उलझे वीणा तारों में गुमसुम गुमसुम सिसक रहे हों जो आँसू के अंदर छिपकर अपनी कुछ पहचान रखे हों इन आँसू के दुखमय गीतों को कुछ अपनी पलकों में रचने दो। जो रुँधे कंठ में मूक पड़े हों उन गीतों को तुम सुर तो दे दो। ममता की प्यारी गोदी में जो जो मेरे अश्क बहे हों चूम चूम गीले गालों को माँ के आँसू उमड़ पड़े हों उस आँचल के कुछ आँसू मोती मेरे इन Continue reading उन गीतों को तुम सुर तो दे दो

उस पत्थर को मैंने तराशा

उस पत्थर को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया और  तराशकर उसे बनाया जिसने पथ से मुझे उठाया।   जिसके कारण नाव बिचारी टूट  किनारे  जा  टकराई उसे  देकर  पतवार हमारी हमने  मंजिल  पार लगाई।   औ किनारा जब उसने पाया बोल उठा वह अति शरमाया उस पत्थर को  मैंने  तराशा जिसने पथ पर  मुझे गिराया।   जिनने चिंतन के पंख हमारे नोंच-नाचकर सब बिखराये मैंने  ले उनके  मन बौराये पतझर में भी फूल खिलाये।   यूँ  तराशकर  उन्हें  बनाया प्रभु की  वाणी का रखवाला उस पत्थर  को  मैंने तराशा जिसने पथ पर मुझे गिराया।   जिसने  द्वेष, घृणा, Continue reading उस पत्थर को मैंने तराशा

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया । पहले तो मैने समझा था इस जग में बस मैं ही मैं हूँ जब से देखा दीन जनों को तुझे खोजने लगा हुआ हूँ इसी खोज में लगा हुआ अब मैंनेे जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। डाल डाल पर, फुदक फुदक कर चिड़ियाँ गाती हैं तेरे गीत रंगबिरंगी फूलों पर जा झूमे भ्रमर-सा जब संगीत तेरी महिमा उनसे सुनकर मैंने जीना सीख लिया है हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया तुम संग मैंने जीना सीख लिया। Continue reading हे प्रभु, मैंने जीना सीख लिया है

शोर मचाती आँखें

शोर मचाती आँखें शोर बहुत करती है तेरी चुप सी ये दो आँखें! जाने ये क्या बक-बक करती है तेरी ये दो आँखें! भींचकर शब्दों को भिगोती है ये पहले, दर्द की सुई फिर डूबकर पिरोती है इनमें, फिर छिड़ककर नमक हँसती है तेरी ये दो आँखें….. खामोशियों में कहकहे लगाती है तेरी ये दो आँखें! कभी चुपचाप युँ ही मचाती है शोर ये, जलजला सा लेकर ये आती कभी हृदय में, कभी मुक्त धार लिए बहती है चुपचाप ये दो आँखें…. दरिया नहीं, इक बाँध में बंधी झील है ये दो आँखें! करुण नाद लिए कभी करती है शोर Continue reading शोर मचाती आँखें

अनुरोध

अनुरोध मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. कूउउ-कूउउ करती तेरी मिश्री सी बोली, हवाओं में कंपण भरती जैसे स्वर की टोली, प्रकृति में प्रेमर॔ग घोलती जैसे ये रंगोली, मन में हूक उठाती कूउउ-कूउउ की ये आरोहित बोली! मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. सीखा है पंछी ने कलरव करना तुमसे ही, पनघट पे गाती रमणी के बोलों में स्वर तेरी ही, कू कू की ये बोली प्रथम रश्मि है गाती, स्वर लहरी में डुबोती कूउउ-कूउउ की ये विस्मित बोली! मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल…. निष्प्राणों मे जीवन भरती है तेरी Continue reading अनुरोध

मुक्तक – साँसें

मुक्तक — साँसें कहाँ माँगें, कौन उधारी देता है साँसें कातिल आता है पर लूटा करता है साँसें साँसों की गिनती भी करते नहीं बनती है कर्महीन भी तो कुछ ही गिन पाता है साँसें। …  भूपेन्द्र कुमार दवे            00000

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। जीवन पाकर सब अपना अपना पथ अपनाते चलने का उत्साह लिये वे बस चलते जाते नजर उठी रहती सबकी अपनी मंजिल पाने पर पथ के पत्थर वे सब देख नहीं हैं पाते कौन पाँव किधर रखेगा हर पथ हैं जाने किसको ठोकर देना हर पत्थर है जाने। खूँ से लथपथ पदचिन्हों की हँसी उड़ाते पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने। ठोकर खा गिरनेवाले पलपल गिरते जाते गिरकर उठते आहें भर साँसें गिनती जाते गिरते गिरते Continue reading पग की पीड़ा पथ के पत्थर क्यूँकर जाने

कृष्णावतार

कृष्णावतार (रास छंद। 8,8,6 मात्रा पर यति। अंत 112 से आवश्यक और 2-2 पंक्ति तुकांत आवश्यक।) हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ। घोर घटा में, कड़क रही थी, बीजलियाँ हाथ हाथ को, भी ना सूझे, तम गहरा। दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।। यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी। विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी। मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया। कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।। घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया। जग को करते, एक बार तो, बावरिया। सन्देश छिपा, हर विपदा में, धीर रहो। दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।। अर्जुन Continue reading कृष्णावतार

मेरी जन्मभूमि

मेरी जन्मभूमि है ये स्वाभिमान की, जगमगाती सी मेरी जन्मभूमि… स्वतंत्र है अब ये आत्मा, आजाद है मेरा वतन, ना ही कोई जोर है, न बेवशी का कहीं पे चलन, मन में इक आश है,आँखों में बस पलते सपन, भले टाट के हों पैबंद, झूमता है आज मेरा मन। सींचता हूँ मैं जतन से, स्वाभिमान की ये जन्मभूमि… हमने जो बोए फसल, खिल आएंगे वो एक दिन, कर्म की तप्त साध से, लहलहाएंगे वो एक दिन, न भूख की हमें फिक्र होगी, न ज्ञान की ही कमी, विश्व के हम शीष होंगे, अग्रणी होगी ये सरजमीं। प्रखर लौ की प्रकाश Continue reading मेरी जन्मभूमि

15 अगस्त

15 अगस्त ये है 15 अगस्त, स्वतंत्र जब हुआ ये राष्ट्र समस्त! ये है उत्सव, शांति की क्रांति का, है ये विजयोत्सव, विजय की जय-जयकार का, है ये राष्ट्रोत्सव, राष्ट्र की उद्धार का, यह 15 अगस्त है राष्ट्रपर्व का। याद आते है हमें गांधी के विचार, दुश्मनों को भगत, आजाद, सुभाष की ललकार, तुच्छ लघुप्रदेश को पटेल की फटकार, यह 15 अगस्त है राष्ट्रकर्म का। विरुद्ध उग्रवाद के है यह इक विगुल, विरुद्ध उपनिवेशवाद के है इक प्रचंड शंखनाद ये, देश के दुश्मनों के विरुद्ध है हुंकार ये, यह 15 अगस्त है राष्ट्रगर्व का। ये उद्घोष है, बंधनो को तोड़ने Continue reading 15 अगस्त

सुबह का अखबार

सुबह का अखबार वो सुबह का अखबार पढ़ के रो रहा था कातिल था, अपने गुनाह पढ़ के रो रहा था।   वो कह न सका पाँव के काँटे निकाल दो उस गूँगे के हाथ कटे थे, रो रहा था।   फुटपाथ पड़ी लाश में माँ ऊँघ रही थी उसका बच्चा पास लेटे, रो रहा था।   जमाना चाह रहा था कि मैं भी रो पडूँ इसलिये मेरी हर खुशी पे, रो रहा था।   दर्द अब उस अश्क का देखा नहीं जाता जो मुस्कराहट में लुक-छिप के, रो रहा था।   पढ़ के गजल वो इतना तो समझा होगा Continue reading सुबह का अखबार