रे मनुआ! अब तो धीरज धार

रे मनुआ! अब तो धीरज धार क्यों होता व्याकुल इतना, व्यथा होता क्यों बेचैन चैतन्य को बना सारथी, सूर्यरथ होकर पर सवार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार भोर भई अब आंखें खोल, बावरे क्यों तू सोवत है पतवार संभाल अपनी, कश्ती है तेरी मंझधार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार प्राण पखेरू हो जायेंगे जब, कब तू जागत है सह ले पीड़ा अपनी, कोई ना सुने तेरी पुकार रे मनुआ! अब तो धीरज धार रे मनुआ! अब तो धीरज धार अपनी पीड़ा तू ही जाने और न Continue reading रे मनुआ! अब तो धीरज धार

मेरी इकलौती परछाई

मेरी इकलौती परछाई गुजरा जब तेरे हुस्न का काफ़िला हवाओं के संग मेरे गाँव से होकर बादल भी चले संग तेरे-तेरे और बदला मौसम का भी मिज़ाज़ लेकिन हम न कर सके दीदार तेरे हुस्न के चाँद का क्योंकि उन रुपहले पलों में मैं रात के घने अँधेरे में, बलखाती सन्नाटे की उबड़-खाबड़ पगडंडियों किनारे खोज रहा था अपनी ही परछाई को जो शायद तुम्हारे हुस्न की तरुणाई देख सिमट गई थी कहीं रात के सन्नाटे के अंचल की ओट में कुछ शर्माकर-कुछ सकुचाकर खोकर तुम्हें अब नहीं खोना चाहता अपनी इकलौती परछाई को जो चलती है हरदम संग मेरे Continue reading मेरी इकलौती परछाई

हमें तुमसे चाहत कितनी

हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते जब-जब मेरी सांसें, तुम्हारी साँसों से जा टकराई दिल चाहता है छूलूं, इन ठंडी साँसों की गहराई खिले उषा की लालिमा, देख तुम्हारे हाथों की हीना क्यों बहके कदम हमारे, तुम्हारी मधुशाला के बिना हमें तुमसे चाहत कितनी, ये तुम नहीं जानते भूल जाओगी तुम हमें, ये हम नहीं मानते बिन बदरिया के सजना, बूंदें क्यों बरसती हैं तुमसे मिलने को सखी, आंखें क्यों तरसती हैं तुम्हारी धड़कनों से, दुनिया क्यों बहकती हैं तुम्हारी मादक सुगंध से, हवा क्यों महकती है कैसे काटे हैं Continue reading हमें तुमसे चाहत कितनी

दुर्गे

दुर्गे अग्निज्वाला अनन्त अनन्ता अनेकवर्णा, पाटला, अनेकशस्त्रहस्ता अनेकास्त्रधारिणी अपर्णा,अप्रौढा, अभव्या अमेय अहंकारा एककन्या आद्य आर्या, इंद्री करली पाटलावती मन ज्ञाना कलामंजीरारंजिनी । कात्यायनी कालरात्रि यति कैशोरी कौमारी क्रिया, कुमारी घोररूपा चण्डघण्टा चण्डमुण्ड विनाशिनि , क्रुरा  चामुण्डा  चिता  चिति चित्तरूपा चित्रा चिन्ता, बहुलप्रेमा प्रत्यक्षा जया जलोदरी ज्ञाना तपस्विनी। त्रिनेत्र दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी दुर्गा देवमाता, बुद्धि नारायणी निशुम्भशुम्भहननी पट्टाम्बरपरीधाना पुरुषाकृति प्रत्यक्षा प्रौढा बलप्रदा बहुलप्रेमा बहुला नित्या परमेश्वरी पाटला पाटलावती पिनाकधारिणी । बुद्धि बुद्धिदा ब्रह्मवादिनी ब्राह्मी भद्रकाली लक्ष्मी, भाव्या मधुकैटभहंत्री महाबला महिषासुरमर्दिनि, महातपा महोदरी मातंगमुनिपूजिता मातंगी माहेश्वरी, मुक्तकेशी यति रत्नप्रिया रौद्रमुखी बहुला वाराही, युवती विष्णुमाया वनदुर्गा विक्रमा विमिलौत्त्कार्शिनी। वृद्धमाता वैष्णवी शाम्भवी शिवप्रिया शिबहुला, शूलधारिणी Continue reading दुर्गे

दुर्गे निशुम्भशुम्भहननी

अग्निज्वाला अनन्त अनन्ता अनेकवर्णा, पाटला, अनेकशस्त्रहस्ता अनेकास्त्रधारिणी अपर्णा,अप्रौढा, अभव्या अमेय अहंकारा एककन्या आद्य आर्या, इंद्री करली पाटलावती मन ज्ञाना कलामंजीरारंजिनी । कात्यायनी कालरात्रि यति कैशोरी कौमारी क्रिया, कुमारी घोररूपा चण्डघण्टा चण्डमुण्ड विनाशिनि , क्रुरा  चामुण्डा  चिता  चिति चित्तरूपा चित्रा चिन्ता, बहुलप्रेमा प्रत्यक्षा जया जलोदरी ज्ञाना तपस्विनी। त्रिनेत्र दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी दुर्गा देवमाता, बुद्धि नारायणी निशुम्भशुम्भहननी पट्टाम्बरपरीधाना पुरुषाकृति प्रत्यक्षा प्रौढा बलप्रदा बहुलप्रेमा बहुला नित्या परमेश्वरी पाटला पाटलावती पिनाकधारिणी । बुद्धि बुद्धिदा ब्रह्मवादिनी ब्राह्मी भद्रकाली लक्ष्मी, भाव्या मधुकैटभहंत्री महाबला महिषासुरमर्दिनि, महातपा महोदरी मातंगमुनिपूजिता मातंगी माहेश्वरी, मुक्तकेशी यति रत्नप्रिया रौद्रमुखी बहुला वाराही, युवती विष्णुमाया वनदुर्गा विक्रमा विमिलौत्त्कार्शिनी। वृद्धमाता वैष्णवी शाम्भवी शिवप्रिया शिबहुला, शूलधारिणी सती Continue reading दुर्गे निशुम्भशुम्भहननी

क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य) रिमझिम-रिमझिम बारिश की फुहार खूब बरसी इस सावन में हरियाली खिलखिलाती है मेरे गांव के खेत-खलिहानों में प्रकृति ने किया अद्भुत शृंगार इठलाती-इतराती पुरवाई संग पिली सरसों भी लेती अंगड़ाई गुलाबी अहसासों के संग पर न जाने क्यों उदास है मेरे गांव का “बैल समुदाय” उनके विवश आँखों से बहते आंसू और झुर्री पड़े गालों पर गहरी व्याकुलता की रेखाएं बयां करती हैं उनकी लाचारी, बेबसी और ना उम्मीदी की दास्ताँ क्योंकि “बैल समुदाय” है भूखा कई रातों और कई दिनों से शायद खा गया है कोई चारा उनके हिस्से का चारा Continue reading क्यों गमगीन है “बैल समुदाय” (व्यंग व हास्य)

भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य)

भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य) “स्वच्छ गाँव अभियान” का शुभारम्भ हुआ ढोल-नगाड़े से मेरे गांव में नेताओं की उतारी गई आरती और मंगल गीत गाये गए उनकी शान में मगर गांव की एक भैंस नाम था जिसका “शीला की जवानी” न जाने क्यों खोई-खोई-सी रहती अनायास ही एक दिन वह गाँव के तालाब में चली गई जब साथी भैंसों ने पूछा कारण तो वह बोली कि पेट में उठ रहे थे मरोड़े इसलिए दीर्घ-शंका हेतु शरण लेनी पड़ी तालाब की क्योँकि “स्वच्छ गाँव अभियान” में बनने थे जो शौचालय, नहीं बन पाए सम्पूर्ण राशि जो प्रशासन ने Continue reading भैंस क्यों गई पानी में (व्यंग व हास्य)

चाँद की तरुणाई

चाँद की तरुणाई चांदनी रात में चाँद की तरुणाई ले रही थी अंगड़ाई देख उसकी तारुण्यागम छवि को निशा भी थी स्तब्ध और सितारे भी होकर बेसुध इस अलौकिक क्षण को करते थे आनंदित मंद-मंद पवन भी थी विस्मित देखकर भव्यता शशि के कौमार्य की रात्रि की नीरवता भी हो गई अचेत देखकर विहंगम पल को चिर-निद्रा में पड़ा वायु-मंडल भी शनैः शनिः तिमिरता में खो गया ऐसा प्रकृतिबाह्य दृश्य का अवलोकन कर रात्रि में विचरते सभी प्राणियों को जैसे एक नूतन अनुभव हुआ हो किसी अलौकिक तत्वज्ञान का था ब्योम भी आतुर अपनी पिपासा को तृप्त करने के लिए Continue reading चाँद की तरुणाई

बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम

देखूं जब कोई निराश्रित शिशु का चेहरा बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम जान न पाया मेरा ये निष्ठुर ह्रदय कभी क्यों हैं इस उदास चेहरे पर इतने गम क्या यही गुनाह था उस मासूम का कि निर्धन घर में हुआ इस बालक का जन्म उसकी जिज्ञासा भरी आँखों से झरते आंसुओं को क्या कभी पोंछ पायेंगे हम क्या सपने उसके-क्या उसकी अभिलाषा जा कर कोई पूछे मगर नहीं किसी में दम निर्दयी ज़माने ने दिए जख्म उसको इतने नहीं कोई वनस्पति जो कर दे उनको कम काँटों भरी राह में पाँव उसके रक्तरंजित चलते-चलते थक जायेंगे और Continue reading बिन बारिश के आखें क्यों हो जाती नम

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१) हे मानव व्यर्थ में क्यों करता, तू गर्व अपनी ही रचना पर तूफान में डगमगाती कश्ती तेरी, क्यों करता है अभिमान तोड़ सारे नियम स्वयं के, क्यों कर तू इतना इतराता है निशाचर विचरते निर्भीक, क्यों चिर-निद्रा में तेरा विधान किन्तु व्यग्रता तेरी तक़दीर नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान जकड़ लिया तेरे साम्राज्य को, तेरे ही मक्कड़ जालों ने अपने ही प्रगति-पथ पर, तेरा अहंकार बना है व्यवधान हिमीगिरि के उतुंग शिखर बैठ, गढ़ कोई इतिहास नया त्याग अहंमन्यता के भाव सारे, रच कोई नया कीर्तिमान किन्तु पथभ्रष्ट होना तेरा कर्म Continue reading क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी जिसे चूम तू इतराता था ,सो गयी वो कलियों की रानी जिस ताल किनारे तू उड़ता था, सूख गया उसका पानी वीरान हुआ तेरा आशियाना, लिखनी है इक नई कहानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी सूरज ढल जाए इससे पहले, तुझको अब है जाना बना ले कोई नया बसेरा, और ढूंढ ले नया ठिकाना यहां न कोई अब तेरा अपना, हर कोई हुआ बेगाना याद आएंगी वो गलियां, जहाँ बीती तेरी जवानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ Continue reading चल उड़ जा रे भँवरे

तो ख़ुदा ख़ैर करे

तो ख़ुदा ख़ैर करे तेरे सपनों को सजाया मैंने, अपने अहसासों के रंगो से, मगर ख्वाबों में तू किसी गैर के आये, तो खुदा खैर करे कफ़न ओढ़े लेटा हूँ मज़ार में, तुझे पाने की हसरत में कब्र पर मेरी आंसू कोई गैर बहाये, तो खुदा खैर करे तराशा है जिस पत्थर को मैंने, रात-रात भर जाग कर बन जाये वह किसी गैर की मूरत, तो खुदा खैर करे जिस दामन को बचाया मैंने, हर बार जमाने की नज़रों से, वो लहराए किसी गैर की चाहत को, तो खुदा खैर करे जब-जब ठोकरें खोई तूने, मेरी बाहों ने संभाला हर Continue reading तो ख़ुदा ख़ैर करे

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना हे बटोही ! जिस राह पर तू बढ़ चला है उस राह पर आंधी और तूफ़ान विचरते हैं अक्सर निर्भीक होकर चट्टान बन ललकारेंगे तेरे साहस को डटे रहना-मत डिगाना बढ़ते क़दमों को मगर तू संभल कर चलना हे पथिक ! कांटे हैं असंख्य इस पथ पर जिस पथ पर तू चल पड़ा है हर काँटा है इंतज़ार में कि कदम तेरे रक्तरंजित हों निरंतर चलना होगा तुझे हर हाल मैं मगर तू संभल कर चलना हे राही ! जिस मार्ग पर तू निकल पड़ा है असीम बाधाएं होंगी उस मार्ग पर ठोकर Continue reading हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार! मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार, झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर, किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार! हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार! जटिल बड़ी है यह पहेली,नहीं किसी की ये सहेली! झुंझलाहट होती दिशाहीन मन की गति पर, ठिठककर दबे पाँवों फिर देखता, समय का विस्तार! हूँ मैं इक लघुकण, क्या पाऊँगा अभिसार? निर्झर है यह समय, कर पाऊँगा मैं केसे अधिकार? अकुलाहट होती संहारी समय की नियति पर, निःशब्द स्थिरभाव  फिर देखता, समय का विस्तार! रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा Continue reading किंकर्तव्यविमूढ

सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई, नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई! कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल, ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल, झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल, डाली पे झूलते हुए ये नव दल, मगर, अब ये सारे न जाने क्यूँ इतने गए हैं बदल? उड़ते है हर तरफ ये बन के यादों के सैकत! ज्यूँ वो पल, यहीं कहीं रहा हो ढल! मुरझाते हों जैसे झील में कमल, सूखते हो डाल पे वो कोमल से दल, हृदय कह रहा धड़क, चल आ तू Continue reading सैकत