ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे दे सके तो अपनी मुस्कान की कतरन दे।   इक बहाना चाहिये था मंदिर आने का शुक्र है तूने दर्द दिया दवा अब न दे।   मौत तो सबको दी है ये मैं जानता हूँ पर मुझ गरीब को लाकर कहीं से कफन दे।   अंधे सभी हैं जिन्हें दिखाई नहीं देता पर मुझे ले चल जहाँ तू दिखाई न दे।   ये जख्मो-दाग मुझे तोहफे में मिले हैं अब मुझे खुश रखने ये सजाऐं और न दे।                            Continue reading ऐ खुदा मुझे दवा और दुआ कुछ न दे

हार जीत

बयाँ कर गई मेरी बेबसी, उनसे मेरे आँखो की ये नमी! नीर उनकी नैनों में, शब्द उनके होठों पे, क्युँ लग रहे हैं बरबस रुके हुए? शायद पढ़ लिया हैं उसने कहीं मेरा मन! या मेरी आँखे बयाँ कर गई है बेबसी मेरे मन की! घनीभूत होकर थी जमी, युँ ही कुछ दिनों से मेरी आँखों में नमी, सह सकी ना वेदना की वो तपिश, गरज-बरस बयाँ कर गई, वो दबिश मेरे मन की! ओह! मनोभाव का ये व्यापार! संजीदगी में शायद, उनसे मैं ही रहा था हार! संभलते रहे हँसकर वो वियोग में भी, द्रवीभूत से ये नैन मेरे, Continue reading हार जीत

कुछ कहो ना

प्रिय, कुछ कहो ना! यूँ चुप सी खामोश तुम रहो ना! संतप्त हूँ, तुम बिन संसृति से विरक्त हूँ, पतझड़ में पात बिन, मैं डाल सा रिक्त हूँ… हूँ चकोर, छटा चाँदनी सी तुम बिखेरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! सो रही हो रात कोई, गम से सिक्त हो जब आँख कोई, सपनों के सबल प्रवाह बिन, नैन नींद से रिक्त हो… आवेग धड़कनों के मेरी सुनो ना, मन टटोल कर तुम, संतप्त मन में ख्वाब मीठे भरो ना, प्रिय, कुछ कहो! यूँ चुप तो तुम रहो ना! चुप हो तुम यूँ! जैसे चुप हो Continue reading कुछ कहो ना

दिनकर की गरिमा

शैल शिखर पर तेजस्वी दिनकर लगा उंडेलने अपनी सहस्र रश्मियों से स्वर्णराशि भानु की स्वर्णिम आभा से ओत-प्रोत होने लगा सारा परिसर अनायास ही शांतचित्त झील का शीतल, निर्मल जल भी लगा समेटने उस स्वर्णिण आभा को अपने मार्मिक आगोश में जल में तैरते कमलपुष्पों के दल झूम उठे आनंदमय होकर पाकर सूर्य-रश्मियों के स्पर्श उनका सिकुड़न एवं संकुचन हो गए विलीन आनंद के सागर में और खुलने लगे उसके बंद मुँह उनकी कलियाँ थी आतुर भास्कर की अरुणिमा के अवलोकन को शीतल समीर के मंद-मंद झोंके भी टकराकर इन कमलपुष्पों से सुगंध-सुरभि फैला रहा था वातावरण में हिमगिरि जो Continue reading दिनकर की गरिमा

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

मुझे देखकर तुम (युगल गीत)   गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो मोहब्बत के गजरे सजाती मिली हो।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो शरारत के जल्वे दिखाते मिले हो।“ गायक “मुझे देखकर तुम मुस्कराती दिखी हो सभी सपने सुहाने सजाती मिली हो। अब सृजन प्यार का कुछ होने लगेगा बिन पिये नशा सा भी छाने लगेगा।“ गायिका “मुझे देखकर तुम मुस्कराते दिखे हो तुम भ्रमरों के गुंजन सुनाते मिले हो। अब बगिया में बहार आती मिलेगी महक फूलों की गुदगुदाती मिलेगी।“ गायक “इजाजत मिली है अब तुमसे हमी को महकते मिलन की मुस्काती हमी को।“ गायिका “अब Continue reading मुझे देखकर तुम (युगल गीत)

मैं और मेरा साया

मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि अगर तू न होता तो कौन होता मेरा हमसफ़र इस टेडी-मेढ़ी राहों में कौन लगाता लेप अनुराग का मेरे रक्तमय जख्मों पर और अगर मैं न होता तो क्या होता तेरे अस्तित्व का कौन सुनता तेरी मन की वेदना और कौन पोंछता पसीना तेरा चिलचिलाती दोपहर में मैं और मेरा साया अक्सर ये बातें करते हैं कि निभाए वचन हम दोनों ने अपने-अपने रहे प्रतिबद्ध अविरत एक दूजे के लिए मगर ज़िन्दगी की सांझ में आएगा पल एक ऐसा भी बिछुड़ना होगा जब सदा के लिए और कहना होगा अलविदा Continue reading मैं और मेरा साया

साहस अभाव

साहस अभाव साहस अभाव में सुजनों के दुष्टों का साहस पलता है हों असुर अधर्मी धरनी पर उनका दुःशासन छलता है आदर्श धर्म में बिंधकर हम क्यों दानवता को झेल रहे ? आतंक व्याप्त कर रक्त पात वे मानवता से खेल रहे धर छद्म रूप भर अहंकार निर्मम निर्दयी किलकता है । साहस अभाव ……………..।। क्यों चीख रहे कर त्राहि माम ? तुम स्वयं नहीं कुछ कर पाये . बन मूक बधिर क्यों सोच रहे ? वह कृष्ण ! पुनः भू पर आये अपमानित होकर बैठे हो क्यों भुज बल नहीं मचलता है ? साहस अभाव ………………..।। जीवित रखनी यदि Continue reading साहस अभाव

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल

लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल खता मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर, सजा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना, वफ़ा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। नशा ये देश-भक्ति का, रखे चौड़ी सदा छाती, अना मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। रहे चोटी खुली मेरी, वतन में भूख है जब तक, शिखा मेरी अगर जो हो, तो हो इस देश की खातिर। गरीबों के सदा हक़ में, उठा आवाज़ जीता हूँ, सदा मेरी अगर जो हो, तो Continue reading लम्बे रदीफ़ की ग़ज़ल

घट पीयूष

घट पीयूष मिल जाता, गर तेरे पनघट पर मै जाता! अंजुरी भर-भर छक कर मै पी लेता, दो चार घड़ी क्या,मैं सदियों पल भर में जी लेता, क्यूँ कर मैं उस सागर तट जाता? गर पीयूष घट मेरी ही हाथों में होता! लहरों के पीछे क्यूँ जीवन मैं अपना खोता? लेकिन था सच से मैं अंजान, मैं कितना था नादान! हृदय सागर के उकेर आया मैं, उत्कीर्ण कर गया लकीर पत्थर के सीने पर, बस दो घूँट पीयूष पाने को, मन की अतृप्त क्षुधा मिटाने को, भटका रहा मैं इस अवनी से उस अंबर तक! अब आया मैं तेरे पनघट, Continue reading घट पीयूष

उम्मीद की आभा लहराई…..

निशा उजाले में समाई भोर की पहली किरण आई किरण संग खुशहाली आई पंछियों ने अपने पर पसारे उम्मीद की आभा लहराई……… तूफाँ ने अपनी चादर समेटी समंदर में शांति पसराई नदियों ने अपनी शान पाई कोयल मधुर संगीत वो लाई उम्मीद की आभा लहराई…… तिनका-तिनका टोंट में लाई सुंदर नीड़ निर्माण कर पाई वीरान चमन को फिर बसाया पाखी में नई रवानी आई उम्मीद की आभा लहराई……..

दोहे

दोहे 1.सप्ताह का दिन रविवार,काम होते है हज़ार। घर परिवार में गुज़ार, खुशियां मिले अपार।। 2.मौज सभी मिलकर करो,आया फिर रविवार। अपनो से बातें करो,खुशी गम की हज़ार।। 3.नारे झूठे लगा रहे,राजनीति में आज। वादे जनता से किये,नेता जी ने आज।। 4.धर्म जात में बंट गया,देखो अब इंसान। आरक्षण की आग में, जल रहा हिंदुस्थान।। 5.राजनीति की नाव में ,बैठे सारे चोर। लगी डूबने नाव जब,चोर मचाये शोर।। 6.ज्ञान किवानी खोल दे, मिटे मन का अज्ञान। हो गुरुवर ऐसी कृपा,पाये हम सत ज्ञान।। 7.पढ़ते लाखो लोग है,ये गीता का ज्ञान। गीता ज्ञान महान है,कोई बिरला जान।। **राजेश पुरोहित** श्री राम Continue reading दोहे

आदमी का आदमी से संवाद

आदमी का आदमी से संवाद जब से आदमी का आदमी से संवाद कम हो गया। रिश्तों में प्रेम और अपनापन अब धीरे धीरे खो गया।। नहीं दिखती अब अपनत्व की भावना कहीं भी । लगता है आज का व्यस्त आदमी एकाकी हो गया।। मतलबपरस्ती का मिजाज इस कदर छाया समाज में। दूसरों के लिए सोचना लगता नामुमकिन हो गया।। सभी पैसों के पीछे पागल से होने लगे हैं दोस्तों। इंसानियत के नाम पर आदमी आज कलंक हो गया।। जानते हुए भी इंसान अनजान बनता है आजकल। मर्यादा को रख ताक में आज इंसान शातिर हो गया।। कवि राजेश पुरोहित Mob.7073318074 Continue reading आदमी का आदमी से संवाद

दीप तुम जलते रहो

दीप तुम जलते रहो दीप तुम जलते रहो,अंधकार हरते रहो। नव उल्लास के साथ नई राह चलते रहो।। मंजिले करीब है दुश्मनों से लड़ते चलो। काम क्रोध लोभ मोह से नित भिड़ते रहो।। सत्य का राम साथ है आगे बढ़ते रहो। रुको नहीं रण में शत्रु संहार करते रहो।। निष्काम कर्म करो पूर्ण एकाग्र रहो । चुनोतियों का नित सामना करते रहो।। मर्यादा से जीत जीवन संग्राम हँसते रहो। परहित में सर्वस्व लगा पुरोहित बढ़ते रहो।। कवि राजेश पुरोहित

ग़ज़ल

ग़ज़ल इधर मुझको अपना बताते रहे हैं उधर उम्र भर आज़माते रहे हैं किसे ख़्वाब ये मखमली से लगे हैं हमें ख़्वाब अब तक डराते रहे हैं जिन्हें दोस्तों का दिया नाम हमने वो ताज़िन्दगी काम आते रहे हैं सुकूँ पा रही हैं जिन्हें देख नज़रें वही मेरे दिल को सताते रहे हैं अदावत निभाते रहे चुपके चुपके मगर दावतों में बुलाते रहे हैं

कुछ कर!

कुछ कर ! । उम्मीदों के घरोंदे, गिरा मुँह औंधे। घर आँख लगाए छतपर, कहता है कुछ कर ! छत पर बैठा है कागा , बांधे  सिर पर कोई पागा। घर में न रोटी है न धागा, कुछ उम्मीदे है बाकि , जीने को आधा आधा। गिरती दीवारे टूटकर, कहता है कुछ कर ! त्योहारो से भरा वो आँगन , दीवारों पे वो रंग रोंगन , घर में बैठी वो जोगन , ढूंढती है निशान , कहाँ गया वो साजन , वो गया  रूठकर , कहता है कुछ कर! रिश्ते थे रिश्तो  में प्यार था , प्यार से भरा परिवार था Continue reading कुछ कर!