सत्य का ज्ञान

सत्य का ज्ञान सिर्फ दो ही जग़ह हो पाता है l जब इंसान अस्पताल या श्मशान जाता है ll किसी इंसान का दर्द वो तभी समझ पाता है l जब उसे या उसके अपने को दर्द सताता है ll अपनी बीमारी देख, हम परेशान से हो जाते है l अपने आगे दूजे का दुःख, समझ नहीं पाते है ll किन्तु एक बार जब हम अस्पताल पहुंच जाते है l सभी को दुखी देख, अपना दुःख ही भूल जाते है ll श्मशान घाट जाते ही हमारी सोच बदल जाती है l सुलगती हुए चिता के आगे सच्चाई नज़र आती हैll सोचते Continue reading सत्य का ज्ञान

सिर्फ हादसा?

सिर्फ हादसा…? हँसती खेलती एक ज़िन्दगी, शाम ढलते ऑफिस से निकलकर, है दिल्ली की सड़क पर …,, ओवरटाइम से… सुनहरे सपने को जोड़ती, घरपर मोबाइल से कहेती, बस, मम्मी अभी आयी… आज टेक्षीयाँ भी भरी हुई, और…खाली है उसे रुकना नहीं, अपनी फिक्र में दौड़ता शहर, चकाचौंध रौशनी…!! तेजी से एक शैतानी कार थोड़ी रुकी, …और खींचकर उड़ा ले गयी कँवारी हसरतें..मासूमियत… वो जीने की तमन्ना, पीछे सड़क पर पड़ा मोबाइल,पर्स कराहता रहा… चीखे हॉर्न से टकराकर बिखरती रही… सड़क के मोड़ पर ज़िन्दगी को ध्वस्त करके फेंक दिया… थोड़ी ज़ुकी आँखों की भिड़ ने एक ज़िंदा लाश को घर Continue reading सिर्फ हादसा?

उपांतसाक्षी

न जाने क्यूँ….. जाने…. कितने ही पलों का… उपांतसाक्षी हूँ मैं, बस सिर्फ…. तुम ही तुम रहे हो हर पल में, परिदिग्ध हूँ मैं हर उस पल से, चाहूँ भी तो मैं …. खुद को… परित्यक्त नहीं कर सकता, बीते उस पल से। उपांतसाक्षी हूँ मैं…. जाने…. कितने ही दस्तावेजों का… उकेरे हैं जिनपर… अनमने से एकाकी पलों के, कितने ही अभिलेख…. बिखेरे हैं मन के अनगढ़े से आलेख, परिहृत नही मैं पल भर भी… बीते उस पल से। आच्छादित है… ये पल घन बनकर मुझ पर, आवृत है…. ये मेरे मन पर, परिहित हूँ हर पल, जीवन के उपांत Continue reading उपांतसाक्षी

बेसुध सन्नाटा

रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी बचपन का खोया सपना सहमे-सहमे थे सभी पत्ता-पत्ता और बूटा-बूटा धड़कनें भी थक गई थी और दिल भी था टुटा-टूटा सितारे भी डूबे उदासी में चाँद भी था खोया-खोया चांदनी धुंधली पड़ी थी देवदार भी था सोया-सोया मगर पग मेरे रुके नहीं डिगा नहीं कर्म-पथ पर विचलित न हुआ अंगारों से चलता रहा अग्नि-पथ पर क्योंकि छूनी थी मंज़िल चंचल भोर होने से पहले ज्वालामुखी को ललकारा तूफान के रोने से पहले रात के बेसुध सन्नाटे में मिला न कोई अपना बेचैन आँखें ढूंढ रही थी Continue reading बेसुध सन्नाटा

परिवेश

ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ उड़ते हों, फिजाओं में भ्रमर, उर में उपज आते हों, भाव उमड़कर, बह जाते हों, आँखो से पिघलकर, रोता हो मन, औरों के दु:ख में टूटकर….. सुखद हो हवाएँ, सहज संवेदनशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ खुलते हों, प्रगति के अवसर, मन में उपजते हो जहाँ, एक ही स्वर, कूक जाते हों, कोयल के आस्वर, गाता हो मन, औरों के सुख में रहकर…… प्रखर हो दिशाएँ, प्रबुद्ध प्रगतिशील परिवेश…. ख्वाहिशों में है विशेष, मेरा मनचाहा परिवेश…. जहाँ बहती हों, विचार गंगा बनकर, विविध विचारधाराएं, चलती हों मिलकर, रह Continue reading परिवेश

स्मरण

स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारे संग किसी सिक्त क्षण में, न ही, तुम्हारे रिक्त मन में, न ही, तुम्हारे उजाड़ से सूनेपन में, न ही, तुम्हारे व्यस्त जीवन में, कहीं भी तो न था मैं तुम्हारे तन-बदन में …. स्मरण फिर भी मुझे, सिर्फ तुम ही रहे हर क्षण में …… मैं कहीं भी तो न था ….! न ही, तुम्हारी बदन से आती हवाओं में, न ही, तुम्हारी सदाओं में, न ही, तुम्हारी जुल्फ सी घटाओं में, न ही, तुम्हारी मोहक अदाओं Continue reading स्मरण

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी

मिले जब कोई अजनबी

जिंदगी के अन्तहीन सफ़र में, जब कोई अजनबी मिल जाता है। विरान चमन में न जाने क्यों, एक ताज़ा पुष्प खिल जाता है। तनहाई में सोये अरमानों संग, चुलबुला दिल भी बहल जाता है। अब तो बिना उसकी कल्पना के, जिंदगी का हर पल दहल जाता है। जब वह अपने उष्ण अधरों से, कोमल कपोलों को चूम लेता है। चंचल आषाढ़ की अंगड़ाई में, अधीर चातक भी झूम लेता है। चलते-चलते टेढ़ी-मेढ़ी राह पर, जब कोई चेहरा मिल जाता है। अनायास ही खोया हुआ बचपन, मचल कर फिर से खिल जाता है। जब देखूं चेहरा उस अजनबी का, कोई पराया Continue reading मिले जब कोई अजनबी