मन की सुंदरता

हर चेहरे के पीछे ,एक चेहरा छुपा होता है l जैसा जो दिखता है वो वैसा नहीं होता है ll ये आँखे भी कई बार धोखा खा जाती है l जब चेहरे का दूसरा रुख पढ़ नहीं पाती है ll हम जैसा सोचे वैसा हो ये तो जरुरी नहीं l हर चमकती चीज़ सोना हो ये भी तो नहीं ll किसी रूप को देखकर धोखा मत खा जाना l पहले चेहरे के पीछे,छिपे चेहरे को पहचानना ll किसी को उसके रूप से नहीं गुण से जानो l रूप से ज्यादा मन की सुंदरता को पहचानो ll रूप तो छलावा है Continue reading मन की सुंदरता

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

सच कह दूँ पर कौन सुनेगा? सच में सच का साथ न दोगे कमजोरो को हाथ न दोगे । दोष सिद्ध निर्बल पर होता। सबल पाप करता और सोता। नीर क्षीर सा कौन चुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । सदय भाव अब हृदय न आते। बदले की भावनाए पाले। काम करते रहते काले। पश्चाताप से कौन धुलेगा । सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । घबराहट सच्चाई से , जैसे तीखी दवाई से, दूरी है अच्छाई से । हितकारी पर कौन गुनेगा। सच कह दूँ पर कौन सुनेगा । दीवारों के कान सुना है । जेलों के मेहमान Continue reading सच कह दूँ पर कौन सुनेगा

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई

मुझसे मेरी जिन्दगी खफा हो गई मौत को गले लगाकर फना हो गई।   मैं नमपलकों से उसे देखता रहा सुलगती जिन्दगी कब धुँआ हो गई।   चिड़िया जब हथेली पे आकर बैठी डूबती जिन्दगी भी खुशनूमा हो गई।   हमारी तकदीर एक जैसी ही थी हम जुदा हुए तकदीर जुदा हो गई।   उसकी दुआ का असर भी देख ले यार तुम्हारी हर बद्दुआ  दुआ हो गई।   एक आखरी साँस की तलाश जो थी जवानी भी रुख बदलकर जरा हो गई। …  भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

अरुणोदय

अरूणोदय की बेला आयी कली कली डाली मुस्काई ओस विन्दु मिट गए धरा के प्रातःकाल सुखद सुहाई काली रात दूर है दुख सी फिर सुख सी बेला आई प्राची में प्रकाश दिख रहा चिड़ियो मे कोलाहल सुनाई। भौरे मुदित मना है देखो पल्लव मे स्मित है आई। धरा शस्यश्यामला पूरित फूल फूले नही समाई। उदय सूर्य का होता है तब बीती रात प्रात जब आई। विन्ध्यप्रकाश मिश्र विप्र

विषैली हवा

*विषैली हवा* हर कोई शहर में आकर बस रहा। नित नई समस्याओं से घिर रहा।। बीमार रहते है शहर वाले अक्सर। विषैली हवा का असर दिख रहा।। काट दिये शहरों में सब पेड़ो को। इमारतों में घुट घुट कर पिस रहा।। धूल , धुँआ इस कदर फैला देखो। जिंदगी के दिन आदमी गिन रहा।। गरीबी देखी नही जाती इंसान की। तन ढँकने को वह पैबन्द सिल रहा।। शूल सारे राह के अब कौन उठाता। पुरोहित सब मतलबपरस्त मिल रहा।। कवि राजेश पुरोहित 98,पुरोहित कुटी श्रीराम कॉलोनी भवानीमंडी जिला झालावाड़ राजस्थान पिन 326502

मेरे गीतों को वर दे

मेरे  गीतों  को  वर दे हर अक्षर में सुर भर दे।   चलता था जिस पथरेखा पर वो भी लुप्त हो चली नयन  से अब  राही क्या बन पाऊँगा मिट जाऊँगा कंकण कण में   निज अस्तित्व बना रखने ही पड़ा  रहूँ   मैं  तेरे  दर पे मेरे  गीतों   को   वर   दे हर  अक्षर  में  सुर भर दे।   फटा-पुराना   तन  है  मेरा ये वस्त्र  कभी  के तार  हुए जीवन है इक जीर्ण कफन-सा जिसे  ओढ़ हम  बेकार  हुए   अब  जो  चेतनता  है  मुझमें उसमें ही अब कुछ लय भर दे मेरे   गीतों   को    वर  दे हर  अक्षर  में  सुर  Continue reading मेरे गीतों को वर दे

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो मंदिरो-मस्जिद में भी तुम कहाँ रहते हो। साया ना कहीं दिखा धूप में चलते रहे आग लगा रखी थी तुमने जहाँ रहते हो। मैं ख्वाब के पर्दे रात भर हटाता रहा देखा पसेपर्दा भी तुम कहाँ रहते हो। हल्का नशा था, मगर लहू खौल उठता था जब कभी साकी पूछता ‘तुम कहाँ रहते हो’। क्या मालूम कि मेरा दिल अब कहाँ रहता है अब तो वहीं रहता है तुम जहाँ रहते हो। हमसे यूँ जुदा होकर तुम कहाँ रहते हो वो महफिल बता दो तुम जहाँ रहते हो। तुम्हारी ही यादों में Continue reading वो जगह बताओ मुझे तुम जहाँ रहते हो

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।   मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।   कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।   घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।   माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी। ….. भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

वर्ण पिरामिड

वर्ण पिरामिड रे चन्दा निर्मोही, करता क्यों आंख मिचौली। छिप जा अब तो, किन्ही खूब ठिठौली।।1।। जो बात कह न सकते हैं, हम तुमसे। सोच उसे फिर ये नैना क्यों बरसे।।2।। गा मन मल्हार, मिलन की रुत है आई। मोहे ऋतुराज, मन्द है पुरवाई।।3।। रो मत नादान, छोड़ दे तू सारा अज्ञान। जगत का रहे, धरा यहीं सामान।।4।। तू कर स्वीकार, उसे जो है जग-आधार। व्यर्थ और सारे, तत्व एक वो सार।।5।।