रिश्ता कच्चे धागों का

रिश्ता कच्चे धागों का बाँध दिया रक्षा सूत्र भैया सुनी नहीं है कलाई आज बहना को जो दिया वचन भैया रखना उसकी लाज मेरे भैया पर मुझे है नाज़ दो ताली बजाओ साज झूमो, नाचो, गाओ आज फिर करेंगे मिलकर काज भैया करता रहे मेरा राज देती हूँ दुआ दिल से आज निर्भय हो करता रहे काज जय हो भैया कहे समाज कवि राजेश पुरोहित

फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

२ दिनों का देश प्रेम फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. २६ जनवरी की शाम को बंद कर के जहा रखा था झंडा, उन डब्बो से धूल हटाया जाएगा .. साल में २ दिन ही सही पर वो तिरंगा फिर से बाहर निकाला जाएगा.. जब हर चौक चौराहे पर तिरंगा फेहराया जाएगा फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा.. चलो कुछ दिन बाद फिर से स्वतंत्रता दिवस आएगा.. बड़-चढ़ कर फेसबुक-व्हाट्सप्प पर पोस्ट लगाया जाएगा.. फिर से एक दिन देश के नाम राष्ट्रगान गया Continue reading फिर से कुछ लोगो को अपना देश प्रेम याद आएगा

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है।   गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है।   याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है।   मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है।   पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है।   पंख फैलाये थे जिस ममता के आँगन में आज वहीं पर Continue reading आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है।

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को कर गया वो पराया अपने घरों को।   कहाँ तक उड़े चले जाते हैं देखें आस्मां मिला है टूटे हुए परों को।   बहा है लहू किसके सरों का, देखो उठाकर फेंके हुए इन पत्थरों को।   क्या पता कि वोह सोया भी था कि नहीं छोड़ गया है वो गूँगे बिस्तरों को।   बहुत लहूलुहान हो गया है बिचारा समझाये कोई तो अब ठोकरों को।   ये कलियाँ शबनम भरी सिसकती रहीं कहीं काँटे ना चुभ जायें भ्रमरों को।   वोह मुस्कान तेरे लबों को छूकर चूम चूम जाती है मेरे अधरों को।                    …. Continue reading बदलके सारे दीवार-ओ-दरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को बिखर भी जाने दो महकते गजरों को।   नशा पीने में नहीं, पिलाने में भी है गौर से तो देख, साकी की नजरों में।   हादसा था वोह नाजुक से प्यार का पर दहला गया है सारे शहरों को।   कातिल न था वो बस रखने आया था मेरे सीने में अपने खंजरों को।   लजा जाता है अक्स भी आईने का झुका लेता है वो अपनी नजरों को।   लौट आने की चाहत में अपने घर खड़खड़ाता रहा वो तमाम घरों को।   उठी थी इक चिन्गारी दमन की मगर जलाती गई Continue reading महक जाने दो ख्वाब के मंजरों को

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं

लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं हम इसे साये-मौत की दिल्लगी कहते हैं।   ये छलकते जाम भी इक साज से होते हैं हम प्यासे इसे महकती बंदगी कहते हैं।   इस घर के सामने बेघरों की जो भीड़ है वे ही इसके मलबे को गंदगी कहते हैं।   ये चिथड़ा कमीज, ये फटी नीकर कुछ तो है इस गरीबी को लोग तो सादगी कहते हैं।   बासी रोटी से उठती भूख की खश्बू को गरीब बच्चे बेचारे ताजगी कहते हैं।   गरीब की झोपड़ी जलाकर खाक कर देना हरेक मजहब इसी को दरिंदगी कहते हैं। ……    भूपेन्द्र Continue reading लोग तो हैं ऐसे इसे जिन्दगी कहते हैं