लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग) चांदनी रात में मुस्कुराते हुए चाँद को देख पत्नी के दिल में प्रेम के बादल बहकने लगे जैसे किसी रूठे हुए बांसुरी के अनजान सुर बसंत के आँगन में खुशबु बन महकने लगे फिर बोली साजन से बोलो मुझे दो ऐसी बातें पहली बात से हो जाऊँ मैं ख़ुशी से रसगुल्ला और फिर कहो बात दूसरी कोई मेरे सनम सुन कर जिसे हो जाऊँ में तुरंत आग बबूला सुनो जानम कहता हूँ दिल की पहली बात देखा है जब से चाँद तुम ही मेरी ज़िन्दगी हो नहाये जब ये चाँद झील-सी नीली आँखों में Continue reading लानत है ऐसी ज़िन्दगी पर (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग) मन्नत मांगने सुबह-सुबह पति-पत्नी गए शिव मंदिर मन्नत का धागा बाँधने पत्नी ने जैसे ही हाथ उठाया अचानक मन में उसके आया कोई ख्याल पुराना मन्नत का धागा बांधे बिना उसने नीचे हाथ झुकाया हक्का-बक्का बेचारा पति बोला अपनी सुहागन से हे भागवान, क्यों नहीं बाँधा तुमने धागा मन्नत का किस ख्याल में डूबी हो, न करो कोई सोच-विचार बाँध दो धागा अगर भोगना है सुख तुमने जन्नत का पत्नी मुस्कुराकर बोली मन्नत मांगने ही वाली थी मैं कि ईश्वर दूर कर दे मेरे सुहाग की मुश्किलें तमाम फिर मन में विचार आया Continue reading कहीं मैं ही न निपट जाऊँ (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)

डस ले, डस ले निभाकर धर्म कड़वा चौथ का पति-वता पत्नी सो रही थी चैन से सितारों की झिलमिल बारात को निहार रहा था चाँद अपने नैन से अधीर पति ने देखा पत्नी के पास कुंडली लगाए बैठी थी एक नागिन सोलह शृंगार में दुल्हन-सी सजी जैसे हो किसी नाग की सुहागिन ख़ुशी से पागल पति धीरे से बोला डस ले, डस ले, अच्छा अवसर है कोटि-कोटि नमन करता हूँ तुझे हे नागिन तुझे भला किसका डर है चुप कमीने, फुँकार कर बोली नागिन दीदी को चरण वंदना करने आयी हूँ कभी लगे न इसको तेरी बुरी नज़र नाग देवता Continue reading डस ले, डस ले (हास्य-व्यंग)