सूखती नदी

चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! संग ले चली थी, ये असंख्य बूँदें, जलधार राह के, कई खुद में समेटे, विकराल लहरें, बाह में लपेटे, उत्श्रृंखलता जिसकी, कभी तोड़ती थी मौन, वो खुद, अब मौन सी हुई है… चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! कभी लरजती थी, जिसकी धारें, पुनीत धरा के चरण, जिसने पखारे, खेलती थी, जिनपर ये किरणें, गवाही जिंदगी की, देती थी प्रवाह जिसकी, वो खुद, अब लुप्त सी हुई है….. चंचल सी इक बहती नदी, थम सी गई है! अस्थियाँ, विसर्जित हुई है जिनमें, इस सभ्यता की नींव, रखी है Continue reading सूखती नदी

दरिया का किनारा

हूँ मैं इक दरिया का खामोश सा किनारा…. कितनी ही लहरें, यूँ छूकर गई मुझे, हर लहर, कुछ न कुछ कहकर गई है मुझे, दग्ध कर गई, कुछ लहरें तट को मेरे, खामोश रहा मै, लेकिन था मैं मन को हारा, गाती हैं लहरें, खामोश है किनारा…. बरबस हुई प्रीत, उन लहरों से मुझे, हँसकर बहती रही, ये लहरें देखकर मुझे, रुक जाती काश! दो पल को ये लहर, समेट लेता इन्हें, अपनी आगोश में भरकर, बहती है लहरें, खामोश है किनारा…. भिगोया है, लहरो ने यूँ हर पल मुझे, हूँ बस इक किनारा, एहसास दे गई मुझे, टूटा इक Continue reading दरिया का किनारा