रिश्ता

रिश्ता तोड़ना मत रिश्ता कभी कच्चा मकान देखकर किसी गरीब का क्योंकि पकड़ बहुत मजबूत होती है मिटटी की धरती से याराना ये मिटटी और धरती का पुराना है युगों-युगों से संगमरमर पर तो अक्सर पैर फिसलते ही रहते हैं क्योंकि क्षणिकहै ये याराना (किशन नेगी ‘एकांत’ )

पसंद

पसंद बना दिया अगर किसी को अपनी पसंद तो कोई बड़ी बात नहीं इस सफर में क्योंकि तुम अकेले मुसाफिर हो लेकिन बन गए जो किसी की पसंद तुम तो ये बात बहुत बड़ी होगी क्योंकि इस सफर में तुम अकेले नहीं कोई और मुसाफिर भी चलता है संग तुम्हारे इस सफर में (किशन नेगी ‘एकांत’ )

वक्त का मिजाज

वक्त का मिजाज बहुत वक्त गुजारा जिंदगी का हमसाया बनकर सागर की लहरों की तरह पल आते गए, पल गुजरते गए पर कुछ न बदला लगता था लगेगा वक्त जिंदगी को बदलने में मगर जब देखा वक्त के बदलते मिज़ाज़ को तो गले उसे लगा लिया हाथ थामे इक-दूजे का चल पड़े बनकर हमसफ़र पर नहीं पता था कि इक दिन बदला हुआ वक्त ही जिंदगी बदल देगा (किशन नेगी ‘एकांत’ )

दो दिन

दो दिन हे मनु की संतानतेरी ये ज़िन्दगी हैबस दो दिन कीएक दिन तेरे हक में औरदूसरा दिन तेरे खिलाफजब तेरे हक़ का दिन होगातू गुमान न करनाभाग्य और किस्मतहोंगी तेरी परछाईयाँ जिंदगी होगी मेहरबानमगर पाँव तू जमीन पर ही रखनाजिस दिन ज़िन्दगी होगी तेरे खिलाफतू धीरज मत खोना, शांत रहनामंडराएंगे निराशा के काले बादलभाग्य और किस्मत भी रूठे होंगेमगर आशा की ज्योति जलाये रखनाकर्मगति को विराम न देनारहना होगा अग्रसर कर्मपथ पर (किशन नेगी ‘एकांत’ )

इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)

इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति) “शिवेंद्रवज्रा स्तुति” परहित कर विषपान, महादेव जग के बने। सुर नर मुनि गा गान, चरण वंदना नित करें।। माथ नवा जयकार, मधुर स्तोत्र गा जो करें। भरें सदा भंडार, औघड़ दानी कर कृपा।। कैलाश वासी त्रिपुरादि नाशी। संसार शासी तव धाम काशी। नन्दी सवारी विष कंठ धारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।१।। ज्यों पूर्णमासी तव सौम्य हाँसी। जो हैं विलासी उन से उदासी। भार्या तुम्हारी गिरिजा दुलारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।२।। जो भक्त सेवे फल पुष्प देवे। वाँ की तु देवे भव-नाव खेवे। दिव्यावतारी भव बाध टारी। कल्याणकारी शिव दुःख हारी।।३।। धूनी जगावे जल को चढ़ावे। जो भक्त Continue reading इन्द्रवज्रा (शिवेंद्रवज्रा स्तुति)

यार बचपन तू कहाँ खो गया

घनन-घनन गरजते मेघ काली घटाओं की मस्ती वो रिमझिम वर्षा का पानी वो कागज की टूटी कश्ती बचपन यार तू कहाँ खो गया मुझे जगाकर तू क्यों सो गया  वह कटी पतंग को झपटना वो छीना-झपटी में उलझना यारों की पतंग को काटना फिर झगड़ों का सुलझना बचपन यार तू कहाँ खो गया न जाने कहाँ तू गुम हो गया लुका-छिपी की वह दोपहर वो होली का महकता रंग वो शिकायतों का अनंत दौर अपने रूठे हुए यारों के संग बचपन यार तू कहाँ खो गया आज तू याद आया तो रो गया ताल कटोरा गार्डन जाकर वो कच्ची अमिया Continue reading यार बचपन तू कहाँ खो गया

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। पोंछ पोंछकर सब अश्रूकणों को नव सपनों का निर्माण करें पलकों के आँगन में फिर से हम मुस्कानों का सुन्दर रास रचें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। गीतों में अमृत का संचार कर स्वप्न गीत का यूँ श्रंगार करें। युग युग से पीड़ित अपने मन की पीड़ा कंठों की सब दूर करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। तेरी गोदी में सोकर हम सब फिर से सुखद सपन उपजायें जब जागें तो हम सब मिलकर दिव्य स्वप्न सब साकार करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। सपनों में दर्शन तेरा पाकर जग क्रंदन Continue reading आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको  मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ इतना भी निर्धन मत करना मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ। इतनी पीड़ा मत पनपाना मैं काँटों का पलना बन जाऊँ फूलों का गर स्पर्श मिले तो आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ। भूखी इतनी रात न देना मैं करवट करवट चीख न पाऊँ और सुबह की प्रथम किरण में अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ। इतना नाजुक भी मत करना मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ Continue reading ऐसा दर्द न देना मुझको

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी खुशी की बहार लाती है हवायें भी। यह पहले भी सुना था देर नहीं है जमीं पर बिखरेंगी रब की दुआयें भी। मेरी आँखें ढूँढ रही उसी चाँद को जिसे छिपाये है सावन की घटायें भी। ‘भूख लगी है’ बच्चे आते ही कहेंगे थाल परोसे रखती हैं मातायें भी। कैद हो या जमाने की कालकोठरी सभी को सहन करनी होगी सतायें भी। बच्चों की हर खुशी में महक होती है महक नहीं रखती है बूढ़ी अदायें भी।                       … भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

शरद ऋतु मेरे बगियन की

शरद ऋतु मेरे बगियन की स्वेत चांदनी बिखरी पड़ी है ठंडी आहें भरे बावरी बयार मेरी कांच की बगियन में झूमे अमलतास झूमे मैगनोलिया कांच की चादर ओढ़े झूमती धरा मेरी स्वेत बगियन में कांच की बालियाँ पहने थिरकती गुलाब की कोमल पाँखुरी मेरी चांदनी बगियन में कांच के कंगन पहनकर खनखनाता पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा मेरी उज्ज्वल बगिया में शीतल पौन चूमती पत्तियों के ठन्डे कपोलों को मेरी दमकती बगियन में उत्तरी ध्रुव से झूमती आयी शरद की मादक पावन बेला मेरी हर्षाती बगियन में (किशन नेगी ‘ऐकांत’ )

अविरल यात्रा

अविरल यात्रा चलते चलतेउबड़-खाबड़ राहों मेंमुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकरदेखता मुड़कर पीछेअपने ही पांवो के निशाँदबे थे जिनके नीचे कुछ दर्दकुछ वेदनाओं के असहनीय घावअतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँकुछ भूली-बिसरी यादेंजिन्हें वह भूल जाना चाहता हैमगर कुछ जख्म जो अभी हरे थेरुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूलअतीत के बंद काले पन्नेकभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसकोसिंदूरी आँचल तले ढलती सांझसूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज मेंभोर के चले पंछी थकान समेटेलौट चले रात्रि विश्राम कोअचानक दे कर तिलांजलिअसमंजस के क्षणों कोबढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर केशायद अहसास हो चला था उसे किकर्मयोगी ही रहता है सदाअग्रसर अपने कर्मपथ पर(किशन नेगी ‘एकांत’ )

पड़ोसी लौट आ

पड़ोसी लौट आ एक वक्त वह भी देखा था मैंने बचपन मेंजब पड़ोसी भी हुआ करता था मेरे परिवार का एक अहम् सदस्य घर के अनेक निर्णयों में होती उसकी अनूठी भागीदारी सुख-दुःख का परम मित्र फुर्सत के क्षणों का अद्भुत साथी तन्हाई भरे लम्हों में झरते आंसुओं की भाषा समझता और आज उम्र के इस पड़ाव में देखता हूँ कि मेरे ही परिवार के सदस्य बन गए हैं एक दूजे के पडोसी और धूल की परतों में लिपटा हुआ मैं उनका पडोसी (किशन नेगी ‘एकांत’ )  

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है। गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है। याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है। मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है। पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है। पंख फैलाये Continue reading मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ