आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। पोंछ पोंछकर सब अश्रूकणों को नव सपनों का निर्माण करें पलकों के आँगन में फिर से हम मुस्कानों का सुन्दर रास रचें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। गीतों में अमृत का संचार कर स्वप्न गीत का यूँ श्रंगार करें। युग युग से पीड़ित अपने मन की पीड़ा कंठों की सब दूर करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। तेरी गोदी में सोकर हम सब फिर से सुखद सपन उपजायें जब जागें तो हम सब मिलकर दिव्य स्वप्न सब साकार करें। आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें। सपनों में दर्शन तेरा पाकर जग क्रंदन Continue reading आवो, स्वप्न सकल सुन्दर कर लें

ऐसा दर्द न देना मुझको

ऐसा दर्द न देना मुझको  मैं आँसू बनकर घुल मिट जाऊँ इतना भी निर्धन मत करना मैं धूल कणों में जा छिप जाऊँ। इतनी पीड़ा मत पनपाना मैं काँटों का पलना बन जाऊँ फूलों का गर स्पर्श मिले तो आहत हो मैं पतझर बन जाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं शाप दर्द का बन पछताऊँ। भूखी इतनी रात न देना मैं करवट करवट चीख न पाऊँ और सुबह की प्रथम किरण में अपनी आँखों कुछ देख न पाऊँ। ऐसा दर्द न देना मुझको मैं बिन मुस्काये ही मर जाऊँ। इतना नाजुक भी मत करना मैं दरक-दीप सा फेंका जाऊँ Continue reading ऐसा दर्द न देना मुझको

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी

खुश्बू की तरह आती है दुआयें भी खुशी की बहार लाती है हवायें भी। यह पहले भी सुना था देर नहीं है जमीं पर बिखरेंगी रब की दुआयें भी। मेरी आँखें ढूँढ रही उसी चाँद को जिसे छिपाये है सावन की घटायें भी। ‘भूख लगी है’ बच्चे आते ही कहेंगे थाल परोसे रखती हैं मातायें भी। कैद हो या जमाने की कालकोठरी सभी को सहन करनी होगी सतायें भी। बच्चों की हर खुशी में महक होती है महक नहीं रखती है बूढ़ी अदायें भी।                       … भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

शरद ऋतु मेरे बगियन की

शरद ऋतु मेरे बगियन की स्वेत चांदनी बिखरी पड़ी है ठंडी आहें भरे बावरी बयार मेरी कांच की बगियन में झूमे अमलतास झूमे मैगनोलिया कांच की चादर ओढ़े झूमती धरा मेरी स्वेत बगियन में कांच की बालियाँ पहने थिरकती गुलाब की कोमल पाँखुरी मेरी चांदनी बगियन में कांच के कंगन पहनकर खनखनाता पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा मेरी उज्ज्वल बगिया में शीतल पौन चूमती पत्तियों के ठन्डे कपोलों को मेरी दमकती बगियन में उत्तरी ध्रुव से झूमती आयी शरद की मादक पावन बेला मेरी हर्षाती बगियन में (किशन नेगी ‘ऐकांत’ )

अविरल यात्रा

अविरल यात्रा चलते चलतेउबड़-खाबड़ राहों मेंमुसाफ़िर ठहर गया कुछ सोचकरदेखता मुड़कर पीछेअपने ही पांवो के निशाँदबे थे जिनके नीचे कुछ दर्दकुछ वेदनाओं के असहनीय घावअतीत की ख़ौफ़नाक परछाईयाँकुछ भूली-बिसरी यादेंजिन्हें वह भूल जाना चाहता हैमगर कुछ जख्म जो अभी हरे थेरुक-रुक कर चुभते थे बन कर सूलअतीत के बंद काले पन्नेकभी चिढ़ाते, कभी घूरते उसकोसिंदूरी आँचल तले ढलती सांझसूरज भी हुआ मध्यम क्षितिज मेंभोर के चले पंछी थकान समेटेलौट चले रात्रि विश्राम कोअचानक दे कर तिलांजलिअसमंजस के क्षणों कोबढ़ चले ठिठकें कदम मुसाफिर केशायद अहसास हो चला था उसे किकर्मयोगी ही रहता है सदाअग्रसर अपने कर्मपथ पर(किशन नेगी ‘एकांत’ )

पड़ोसी लौट आ

पड़ोसी लौट आ एक वक्त वह भी देखा था मैंने बचपन मेंजब पड़ोसी भी हुआ करता था मेरे परिवार का एक अहम् सदस्य घर के अनेक निर्णयों में होती उसकी अनूठी भागीदारी सुख-दुःख का परम मित्र फुर्सत के क्षणों का अद्भुत साथी तन्हाई भरे लम्हों में झरते आंसुओं की भाषा समझता और आज उम्र के इस पड़ाव में देखता हूँ कि मेरे ही परिवार के सदस्य बन गए हैं एक दूजे के पडोसी और धूल की परतों में लिपटा हुआ मैं उनका पडोसी (किशन नेगी ‘एकांत’ )  

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आज फिर गीत गुनगुनाने का मन करता है। आँसुओं को भी गुदगुदाने का मन करता है। गोद में माँ अब सो जाने का मन करता है। आँचल में छिप खिलखिलाने का मन करता है। याद में तेरी खो जाने का मन करता है। जीवन में फिर मुस्कराने का मन करता है। मचल रही हैं यादों की लहरें अनवरत अब इसी सागर में रम जाने का मन करता है। पंखुरियाँ यादों की अभी तक झरी नहीं हैं जीवन को और महकाने का मन करता है। पंख फैलाये Continue reading मुझको भुलाना तुम्हें भी खलता रहेगा

इन आँखों की मस्ती

इन आखों की खुमारी, इन आँखों की मस्ती, नीली झील में तैरती, प्यार की कोई कश्ती। शबनम की नन्हीं बूंदें, इन्हीं नैनों में बसती है, इन्हीं की अंजुमन में, चांदनी रात सजती है। इन मदहोश आँखों से, भर गए हैं सारे पैमाने, चली है जब से ये खबर, बंद पड़े हैं मयखाने। चारु चंद की चंचल किरणें, दमकती पल-पल, जिनकी आहट से, सारे जहाँ में मची हल-चल। रातें भी कटती नहीं, तेरी यादों की तन्हाईयौं में, दिल ढूंढता है तुझे, धड़कनों की शहनाइयों में। झील-सी नीली आँखों में, कभी मेरा सारा जहाँ, दिल-ए-नादाँ तड़पता यहाँ, तड़पती है तू कहाँ ] इन Continue reading इन आँखों की मस्ती

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ

बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ सुरक्षित नहीं अब तू इस धरा पर पहले से राक्षस घात लगाए बैठे हैं हूँ अबला इसलिए सक्षम नहीं कि रक्षा कर सकूँ तेरी क्योंकिं यहाँ खतरे में मेरी भी आबरू अगर तू आ भी गयी मेरी दहलीज पर तो ये नरभक्षी नोच डालेंगे तुझे तब देख न पाएंगी मेरी सहमी आंखें चीरहरण तेरा इन दरिंदों के हाथों अस्मिता तेरी सुरक्षित है तभी तक जब तक धरे न पाँव तू इस जमीं पर मेरी अजन्मी बेटी कहते सब हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ पर जब आती है बेटी घर में खुशियों की सौगात लेकर न जाने Continue reading बेटी तुझे क्यों जन्म दूँ