सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का, हमने भी कभी न देखे पैरों में पड़े हुए थे जो फूटे छाले | मुख़्तलिफ सी हो जाती है उनकी ज़िन्दगी दूसरों से, जब ज़ेहन में कोई खुद के ही ज़ुनून की लौ जला ले | यूँ अफ़सुर्दा चेहरा लेकर उससे मुख़ातिब नहीं होते हैं, जब कोई तुम्हारी सूरत को ही अपना आईना बना ले| सुना है आज़माईशों से तो मुक़द्दर भी बदल जाता है, ज़ाहिल हैं वो जिनके ख़्वाबों को आब-ए-चश्म बहा ले | इब्तिला है मेरा कि अक्सर खुद से ज़फा किया है हमने, मुक़द्दर ने तो दस्तक Continue reading सोंच कर कि सफ़र मुश्किल होता है अक़्सर इरादों का

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर, यूँ ही ना पीठ पीछे हमें अक्सर बदनाम किया करो | आसान नहीं किसी की फितरत जाहिरा समझ पाना, शक्ल देखकर किसी को अज़ीम ना बना दिया करो | बहुत बुलंद तामीरों की सिर्फ खूबसूरती पर मत जाओ, कसीदे पढ़ने से पहले नीव की गहराई जान लिया करो | कोई कितना ही अज़ीज़ क्यों ना हो किसी का यहाँ, ग़म-ए ज़िन्दगी का जिक्र यूँ हर किसी से ना किया करो | बड़े नाज़ुक हो चुके हैं त-अल्लुक़ भी अब समाज में, रिश्ते संजोने को सिलसिले माफ़ी के बना लिया करो | मुफ़लिसी Continue reading हमारी गुस्ताखियों को हमें भी तो बताओ आखिर

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए

जब रहबर-ए-कामिल खुद ही राह भटकाए, तब मंज़िल का पता उसे भला कौन बताए ? समंदर के गिर्दाब में फंसी हो जब कभी कश्ती, इस तूफां में माँझी तब कैसे उसे पार लगाए? जरूरी नहीं कि हर मुसाफ़िर को सही रास्ता मिले, तमाम हैं जो भटके तो फिर कभी लौट के ना आए | गुमान भी शागिर्द बन बैठा है कामयाबी का , बहुत कम लोग हैं यहाँ जो इससे हैं बच पाए | गर मज़बूत हो इरादा और यकीं खुद पर तो, किसकी है जुर्रत यहाँ जो उसे राह से डिगाए ? मेरी शायरी से –

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग) शादी के सुनहरें पिंजरे में क़ैद तड़पता पति बन गया था अपनी मनमोहिनी का देवदास कैसे कराऊँ खुद को आज़ाद इस पिंजरे से देदा-दौड़ा गया पत्नी पीड़ित तांत्रिक के पास चेहरा देख उसका तांत्रिक मुस्कुराकर बोला बेटा, सब जानता हूँ क्यों मेरे पास तू है आया कभी मेरी ज़िन्दगी भी थी बहुत ही खुशहाल जिसके पास तू आया वह भी पत्नी का सताया गंभीर मुद्रा में खोकर तांत्रिक धीरे से बोला धोखा है ये माया-मोह, नश्वर है निर्बल काया मगर बात मेरी सुनकर बेहोश मत हो जाना बेटा तुझ पर है एक निष्ठुर चुड़ैल Continue reading एक निष्ठुर चुड़ैल का साया (हास्य-व्यंग)

ये बालक कैसा? (हाइकु विधा)

ये बालक कैसा? (हाइकु विधा) अस्थिपिंजर कफ़न में लिपटा एक ठूँठ सा। पूर्ण उपेक्ष्य मानवी जीवन का कटु घूँट सा। स्लेटी बदन उसपे भाग्य लिखे मैलों की धार। कटोरा लिए एक मूर्त ढो रही तन का भार। लाल लोचन अपलक ताकते राहगीर को। सूखे से होंठ पपड़ी में छिपाए हर पीर को। उलझी लटें बरगद जटा सी चेहरा ढके। उपेक्षितसा भरी राह में खड़ा कोई ना तके। शून्य चेहरा रिक्त फैले नभ सा है भाव हीन। जड़े तमाचा मानवी सभ्यता पे बालक दीन। बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ तिनसुकिया

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़, गुरबत के दिनों की कुछ पुरानी यादें फिर ताज़ा हो जाती हैं I इंसानी फितरत मापने का अच्छा पैमाना है ये मुफ़लिसी भी, अपनों के बे-रब्त हुए त-अल्लुकों का आईना दिखा जाती है I वो गुरबत का मंज़र भी देखा है तमाम घरों में अक्सर मैने, जब माँ बच्चों को खिला खुद बचा-खुचा खाकर सो जाती है I बेटी के ब्याह की फ़िक्र ने बाप को असमय बूढ़ा सा कर दिया, अज़ीब रिवाज़ है बिन दहेज़ बेटी घर से विदा नहीं हो पाती है I शहर में अमीरी की तश्वीर Continue reading कभी-कभी पहन लेता हूँ वो वर्षों पुरानी सीवन उधड़ी कमीज़

सरहदी मधुशाला

सरहदी मधुशाला मधुशाला छंद (रुबाई) रख नापाक इरादे उसने, सरहद करदी मधुशाला। रोज करे वो टुच्ची हरकत, नफरत की पी कर हाला। उठो देश के मतवालों तुम, काली बन खप्पर लेके। भर भर पीओ रौद्र रूप में, अरि के शोणित का प्याला।। झूठी ओढ़ शराफत को जब, वह बना शराफतवाला। उजले तन वालों से मिलकर, करने लगा कर्म काला। सुप्त सिंह सा जाग पड़ा तब, वीर सिपाही भारत का। देश प्रेम की छक कर मदिरा, पी कर जो था मतवाला।। जो अभिन्न है भाग देश का, दबा शत्रु ने रख डाला। नाच रही दहशतगर्दों की, अभी जहाँ साकीबाला। नहीं चैन Continue reading सरहदी मधुशाला

तुम सरहद के वीर सिपाही हो

तुम कर्मठ हो, बलशाली हो तुम सरहद के वीर सिपाही हो तुम पुण्य धर्म के अनुयायी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो तुमने वेदों से जीना सीखा है सच्चाई के बल चलना सीखा है तुमने गीता का पथ अपनाना सीखा है तुम सच्चेे प्यारे हिन्दुस्थानी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो। तुमने सूर्य उदित होते देखा है उसकी गरिमा को बढ़ते देखा है गंगा में वही अवतरित होते देखा है तुम इन प्रखर किरण के साथी हो तुम ही सच्चे भारतवासी हो। जंजीरें तुमने खुलती देखी है तुमने आजादी आती देखी है खुद कुछ कर सकने की चाहत भी देखी Continue reading तुम सरहद के वीर सिपाही हो

मेरी याद तो आती रहेगी

मेरी याद तो आती रहेगी मेरे जाने के बाद मेरी याद तो आती रहेगी आँसू की ओट से चुपके छिपाती वो आती रहेगी। मुरझाये हुए फूलों से तो पूछकर देखो बहार हर साल हर सूरत तो आती दिखेगी नदियाँ सूखकर कभी निर्जल हुआ नहीं करती कलेजा रेत का चीरो नमी उसकी दिखेगी संजोकर रखी होती है याद जो, वो आती रहेगी आँसू की ओट से चुपके छिपाती वो आती रहेगी। कलियाँ थीं तो भौरे थे गुनगुनाते हुए थे अब याद उनकी खुश्बू तरह मँड़राती दिखेगी ये सूनापन ये सन्नाटा भी चुप नहीं रहता हर आहट पे ये खामोशी भी जागी Continue reading मेरी याद तो आती रहेगी

देखूँ जिस ओर

देखूँ जिस ओर देखूँ जिस ओर तो मुझको श्रंगार अनूठा दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है। वह मँड़राते फिरते भ्रमरों का फिर कुछ इतराना कलियों का डाल डाल पर खिलते सुमनों का सजना और रिझाना गंधों का खुली पंखुरी पर शबनम कण भी मोती जैसा दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता है। चूम चूमकर लाली पूरब की वह प्यार जताना नव किरणों का फिर संध्या की गोदी में छिपकर और नशीला बनना रातों का तारों की झुरमुट में छिपता चाँद सलोना दिखता है। देखूँ जिस ओर तो मुझको संसार अनौखा दिखता Continue reading देखूँ जिस ओर

गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा

गीत बनाकर हर गम को मैं गा लूँगा तार-तार दिल में भी मैं स्वर सजा लूँगा। तू नफरत भी ना कर पावेगा मुझसे प्यार के हर बोल से तुझे रिझा लूँगा। राह पर इन बिखरे सारे पत्थरों को चूम चूमकर मैं अब खुदा बना लूँगा। आँसुओं से भिंगोकर हरेक काँटे को बाग में खिलते फूलों-सा बना लूँगा। मंदिर से बाहर तू क्यूँकर भटकेगा आ दिल में मेरे मैं अपना बना लूँगा।                भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

जिन्दगी और मौत

जिन्दगी और मौत मौत से पूछ तो लो कि कब कहाँ ले जावेगी इस अपाहिज जिन्दगी को कैसे ले जायेगी। एक बार तो वाह जरूर इस तरफ आवेगी बटोरकर पुरानी यादें नई दे जावेगी। इन पलकों ने लरजते अश्क रखें है जनम से नमालूम कब तक ये इन्हें यूँ सहलायेगी। न जाने कहाँ ये तूफॉन उड़ा ले जावेगा और कौन सी लहर उस किनारे ले जायेगी। जीवन कब बिगड़ जावेगा, कब सँवर जावेगा नमालूम ये मौत यहाँ कब क्या कर जायेगी। जिन्दगी! अब तू इस मौत के खौफ की ना सोच सहेली है यह तेरी प्यार से ले जायेगी। …. Continue reading जिन्दगी और मौत