आजादी का मान बढ़ाने

आजादी का मान बढ़ाने आवो मिलकर रहना सीखें हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सबसे मिलकर जीना सीखें। सब धर्मों का सम्मान करें मंदिर, मस्जिद में भी जावें गुरुवाणी का भी जाप करें गुरुद्वार पर शीश नवायें। मीठी वाणी कहना सीखें मुस्कान मधुर सी उपजायें हँसते हँसते सफर करें हम जब जब जीवन पथ पर आवें। और परिंदों सा उड़कर हम गीत प्रेम का गाते जावें चहूँओर गावों, नगरों में देशप्रेम की अलख जगायें। अपने घर के बच्चों को भी हम अच्छी बातें सिखलायें उत्तमतम संस्कार हमारे वे भी पाकर तर तर जावें। बाँट बाँटकर अमरुद खायें भूखों को रोटी दिलवायें प्यासों Continue reading आजादी का मान बढ़ाने

आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना

आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना लक्ष्य सामने ही होता है हमने यही है जाना। सीना ताने बढ़ते रहना नजर सभी पर पैनी रखना हिम्मत से मन काबू रखना उत्साह हमेशा कायम रखना। यही शौर्य का मूलमंत्र है वीरों ने यही है माना आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना। बाधायें आती रहती हैं पर हरपल हिम्मत देती हैं हौसला भी ताजा रखना है हर कठिनाई सिखलाती है। दुविधा में उल्लास जगाना हमने सबक है सीखा आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना। चलते चलते थक ना जाना आलस का भी नाम न लेना समय समय Continue reading आगे बढ़कर पीछे हटना हमने नहीं है जाना

नहीं कह पायी

आज फिर मैं कहना चाहती थी, मत जाओ, मेरे लिए रूक जाओ “नहीं कह पाई” आज फिर मैं थाम लेना चाहती थी जोर से तुम्हें अपनी बाहों में कि मेरी सांसों के साथ साथ तुम भी पिघल जाओ “नहीं कर पाई” आज फिर रोक देना चाहती थी, रात को जो मुझे तुम से अलग करती है ” नहीं कर पाई” आज फिर बता देना चाहती थी कि तुम्हारे बिना कितनी अधुरी हूं मैं रोम रोम मेरा तरसता है तुम्हारे स्पर्श को हर धड़कन मेरी सुनना चाहती है तुम्हारी आवाज़ आंखें तुम्हें ही ढुढती है हर पल हर घड़ी तुम्हारा ही Continue reading नहीं कह पायी

देखी थी जीवन की छवि प्यारी

देखी थी जीवन की छवि प्यारी वह मोहक प्यार भरी ममता की थी जिसमें हर प्रतिमा सुन्दर सी भरती थी किलकारी बचपन की पर अंतरपट में उभर रही थी छवि यौवन की मदमस्त भँवर सी जिसमें परछाई इठलाती थी खुद से अनजानी अभिमानी सी देखी थी तरुणाई जीवन की विविध रंग की, विचित्र रूपों की दर्पण में दर्शन नित करती सी पर छवि दरक गई हर दर्पण की। श्रंगार शून्य ले अंतिम क्षण की आँसू के कलरव में छिपती सी शर्माती, सकुचाती, अलसाई सिहर उठी मुस्काती तरुणाई देखी थी जीवन की चतुराई जो शब्दकोश से सजी हुई थी मगर बुद्धि Continue reading देखी थी जीवन की छवि प्यारी

मुस्कानें

मुस्कानें अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला सबकी आँखें नम दिखती थी मैं मुस्कान सजाने जब निकला। मूक बनी बिखरी आवाजें सबके लब पर थर्राती थी जंजीरों में बंधी उदासी सबके दिल को कलपाती थी मैंने चाहा महके जग तो मुस्कानें खिलने शर्माती थी। अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला। नाव उतारी जब जब मैंने तूफान उठा था उलझाता लहरों के आँचल में बिंधकर था आँसू मोती दमकाता मैंने चाहा उनको चुनकर हर मुस्कानों की दमक बढ़ाता अनजानों में अनजान बना पहचान बनाने जब मैं निकला। जहाँ तहाँ जीवन के पथ पर साँसें बस Continue reading मुस्कानें