याद है

याद है आपका वो मिलना तो याद है दिलका वो खिलना तो याद है। जिस तरहा बिछड़े थे मोड़ पर और तुम्हें ही गवाँना तो याद है। देखते है सब नज़ारे  राह  पर आपका ही गुज़रना तो याद है। हँसकर हम टाल देते है  सदा, दिलमें गम पालना तो याद है। आँख से बहती तन्हाई जो कभी बेवजह ही चाहना तो याद है। -मनीषा “जोबन “ Advertisements

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वक्त हीं कितना लगता है

वक्त हीं कितना लगता है ख़ुद ही जलकर नूर होने में सबके बीच मशहूर होने में . वक्त ही कितना लगता है सपने चकनाचूर होने में . शब्दभर का फासला है मिल जाने व दूर होने में . पहलू में खतरा ही खतरा एक बहादुर शूर होने में . दुनिया अब दुनिया लगती है तेरा एक सुरूर होने में . ©सत्येन्द्र गोविन्द 8051804177

चुप्पी

चुप्पी चुप वह है जो सबकुछ जानता – चुप वह भी जो कुछ नहीं जानता कुछ ऐसे भी -सबकुछ जानने का वहम पालते है- वे कभी चुप नहीं रहते कुछ वे है जो चुप्पी को लबादा की तरह ओढ़ते अजीब सी दुविधा में रहते न बोल सकते न चुप रह सकते कसमसाहट में जीते बेबसी में मर जाते किन्तु उनकी चुप्पी व्यर्थ नहीं जाती चुप रह कर भी बहुत कुछ कह जाती आँखों से हाथ के इशारों से पाँव की गतियों से सम्पूर्ण शरीर से गुजरती एक से दूजे में संवहित हो कलम/तुलिका/मुद्राओ से प्रदर्शित होती रहती सृजित कलाएँ बहुआयामी Continue reading चुप्पी

उभरते जख्म

उभरते जख्म शब्दों के सैलाब उमरते हैं अब कलम की नींव से….. जख्मों को कुरेदते है ये शब्दों के सैलाब कलम की नोक से….. अंजान राहों पे शब्दों ने बिखेरे थे ख्वाबों को, हसरतों को पिरोया था इस मन ने शब्दों की सिलवटों से, एहसास सिल चुके थे शब्दों की बुनावट से, शब्दों को तब सहलाया था हमने कलम की नोक से। ठोकर कहीं तभी लगी इक पत्थर की नोक से, करवटें बदल ली उस एहसास ने शब्दो की चिलमनों से, जज्बात बिखर चुके थे शब्दों की बुनावट से, कुचले गए तब मायने शब्दों के इस कलम की नोक से। अंजान Continue reading उभरते जख्म

फिर मिलेंगे हम

फिर मिलेंगे हम फिर मिलेंगे हम समुंद्र की लहरों पर समर्पण की नाव पर सवार अपने अपने आसुओं को विसर्जित करेंगे सदा के लिए विरहा की अग्नि से पिघला सूरज यादों के घनीभूत जलवाष्प बन कर बादल सा बरसेंगे होगी धरा सिंचित बीज होगा अंकुरित प्रेम पुष्प खिलेंगे सुगन्धित पवन उड़ा ले जायेंगे प्रेम का सन्देश फूलों और तितलियों के रंगों में घुल मिल मनोरम छटाएँ बिखेरेंगे गायेंगे झूम-झूम कर मिलन के गीत एक दूजे से जो पाया था पूनम की रातों में चांदनी बन बाटेंगे और एक दिन चमकते सितारे बन अपनी ही धुरी पर घूमते प्रेम धुन में Continue reading फिर मिलेंगे हम

मैं एक अनछुआ शब्द

मैं एक अनछुआ शब्द मैं अनछुआ शब्द हूँ एक! किताबों में बन्द पड़ा सदियों से, पलटे नही गए हैं पन्ने जिस किताब के, कितने ही बातें अंकुरित इस एक शब्द में, एहसास पढ़े नही गए अब तक शब्द के मेरे। एक शब्द की विशात ही क्या? कुचल दी गई इसे तहों मे किताबों की, शायद मर्म छुपी इसमे या दर्द की कहानी, शून्य की ओर तकता कहता नही कुछ जुबानी, भीड़ में दुनियाँ की शब्दों के खोया राह अन्जानी। एक शब्द ही तो हूँ मैं! पड़ा रहने दो किताबों में युँ ही, कमी कहाँ इस दुनियाँ में शब्दों की, कौन पूछता है Continue reading मैं एक अनछुआ शब्द

मिथ्या अहंकार

मिथ्या अहंकार बिखरे पड़े हैं कण शिलाओं के उधर एकान्त में, कभी रहते थे शीष पर जो इन शिलाओं के वक्त की छेनी चली कुछ ऐसी उन पर, टूट टूटकर बिखरे हैं ये, एकान्त में अब भूमि पर । टूट जाती हैं ये कठोर शिलाएँ भी घिस-घिसकर, हवाओं के मंद झौकों में पिस-पिसकर, पिघल जाती हैं ये चट्टान भी रच-रचकर, बहती पानी के संग, नर्म आगोश मे रिस-रिसकर। शिलाओं के ये कण, इनकी अहंकार के हैं टुकड़े, वक्त की कदमों में अब आकर ये हैं बिखरे, वक्त सदा ही किसी का, एक सा कब तक रहता, सहृदय विनम्र भाव ने Continue reading मिथ्या अहंकार

भक्ति का तमाशा

भक्ति का तमाशा दाम लगाकर इंसान को ईमान खरीदते देखा है, जगराते में अक्सर मैंने खुदा को भी बिकते देखा है।। रंजिशों में इंसान इंसानियत भूल जाते है, बेबात-बेवजह अपने अपनों को मार देते है। तुमसे ज्यादा सगा तो वो जल्लाद निकला, मारने से पहले उसे मैंने आखरी ख्वाइश पूछते देखा है।।1।। वो सुनहरा बचपन अब केवल सपना बन कर रह गया, बचपन से ही मैं हुकूमत की लालच में मर गया। सिर्फ शरारते फितरत में होती तो आज जिंदगी कुछ और होती, मैंने बच्चो को भी अब साजिशें करते देखा है।।2।। चंद ग़ज़लें लिख दी हमने तो हम शायर Continue reading भक्ति का तमाशा

धुँधला साया

धुँधला साया आँखों मे इक धुंधला सा साया, स्मृतिपटल पर अंकित यादों की रेखा, सागर में उफनती असंख्य लहरों सी, आती जाती मन में हूक उठाती। वक्त की गहरी खाई मे दबकर, साए जो पड़ चुके थे मद्धिम, यादें जो लगती थी तिलिस्म सी, इनको फिर किसने छेड़ा है? यादों के उद्वेग भाव होते प्रबल, असह्य पीड़ा देते ये हंदय को, पर यादों पर है किसके पहरे, वश किसका इस पर चलता है। स्मृतिपटल को किसने झकझोरा, बुझते अंगारों को किसने सुलगाया, थमी पानी में किसने पतवार चलाया, क्युँकर फिर इन यादों को तूने छेड़ा ?

तू रहता कहाँ?

तू रहता कहाँ? आकाश और सागर के मध्य, क्षितिज के उस पार कहीं दूर, जहाँ मिल जाती होंगी सारी राहें, खुल जाते होंगे द्वार सारे मौन के, क्या तू रहता है दूर वहीं कही? क्षितिज के पार गगन मे उद्भित, ब्रम्हांड के दूसरे क्षोर पर उद्धृत, शांत सा सन्नाटा जहां है छाता, मिट जाती जहां जीवन की तृष्णा, क्या तू रहता क्षितिज के पार वहीं? कोई कहता तू घट-घट बसता, हर जीवन हर निर्जीव मे रहता, कण कण मे रम तू ही गति देता, क्षितिज, ब्रह्मान्ड को तू ही रचता, मैं कैसे विश्वासुँ तू हैं यहीं कहीं?

मौन से अधर

मौन से अधर काश! उनसे कुछ कह भी देते ये मेरे मौन से अधर! बस अपलक देखता ही रह गया था ये नजर, मन कहीं दूर बह चला था पराया सा होकर, काँपते से ये अधर बस रह गए यूँ हीं थिरक कर, अधरों से फूट सके ना, कँपकपाते से ये स्वर! काश! मौन अधरों की मेरी ये भाषा तुम पढ लेते! काश! मेरी अभिलाषा व्यक्त करते मेरे मौन से अधर! फूट पड़े थे मन में प्रेम के मेरे बेस्वर से गीत, हृदय की धुन संग मन गा रहा था प्रेम का गीत, पर वाणी विहीन होकर रह गई मेरी Continue reading मौन से अधर

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ तृप्ति-सिन्धु  है  मंदिर  तेरा फिर क्यूँ मैं प्यासा रह जाऊँ?   मुझको  भूल गया  फिर भी तेरा  साया  मैं   पाता  हूँ हर   खामोशी  सन्नाटे  में धड़कन अपनी सुन पाता हूँ   देख   देखकर  तेरी  मूरत क्यूँ ना  दर्शन-प्यास बुझाऊँ भक्ति  मेरी है,  शक्ति तेरी फिर क्यूँ मैं तुझको बिसराऊँ?   रही  न अब पतवार हमारी आँधी  औ  तूफान क्षणों में तू ही तो इन निष्ठुर पल में स्फूर्ति  जगाता था  प्राणों में   अब  क्यूँ ना मैं तुझे पुकारूँ क्यूँ न  शरण में  तेरी जाऊँ Continue reading भक्ति मेरी है, शक्ति तेरी

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल

फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल फिर दैदीप्य हुआ पूर्वांचल, प्रखर भास्कर ने पट हैं खोले, लहराया गगण ने फिर आँचल, दृष्टि मानस पटल तू खोल, सृष्टि तू भी संग इसके होले। कणक शिखर भी निखर रहे है, हिमगिरि के स्वर प्रखर हुए हैं, कलियों ने खोले हैं घूंघट, भँवरे निकसे मादक सुरों संग, छटा धरा का हुआ मनमोहक। प्रखरता मे इसकी शीतलता, रोम-रोम मे भर देती मादकता, विहंगम दृष्टि फिर रवि ने फैलाया, प्रकृति के कण-कण ने छेड़े गीत, तज अहम् संग इनके तू भी तो रीत।

इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

इक बार इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो हर इक दिल में खुदा है इसका अहसास करो।   इनसे ही घोंसला मेरा घर भी आबाद है ये चिड़ियाँ चहकती हैं इन्हें न उदास करो।   नन्हीं सी ख्वाईश है इक तुम्हें पाने की पर तुम्हीं कह रहे ये आस बेलिबास करो।   कहते हैं तुम कैद हो हर इक बुतखाने में मैं तो तुममें हूँ,  खत्म ये कारावास करो।   तुम्हें भूलकर अब मैं और किसका नाम जपूँ तुम भी नाम बदलकर लब न बेमिठास करो।   कच्ची गागर समझ इस दिल को न खाली रखो जनम Continue reading इक बार तो मेरी बात पर भी विश्वास करो

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं। जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।   सपने  सुन्दर सहज सलोने आशा की आभा में सजकर नयनों के  पलनों में  भोले ममता की गुदड़ी में छिपकर   लेकर आते सुख  की घड़ियाँ जो  रूप नया  दे  जाती हैं सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं।   कुछ अनुभव की अनुपम आभा जीवन  के  आँगन  में  फैली खेल  खिलाती  सहस्र रश्मियाँ उतरी  हों  तन मन में  जैसी   मीठे मीठे  क्षण  जीवन  के स्वयं साथ वो ले  आती  हैं सुख की घड़ियाँ Continue reading सुख की घड़ियाँ जाने कितनी