चाहत

चाहत जग ऐसा कोई बनाई दे सबको दोस्त से मिलाई दे रिश्तों से जो परेशान ना हों वो नूर आँखं पे चढा़ई दे गंगा-जमुना तहजीब में दिखे भाईचारे का जग बनाई दे मन्दिर मस्जिद में भेद काहे शंख अजा़ं साथ सुनाई दे ईद दिवाली एक सी मनाये आदाब मिले या बधाई दे होली हुड़दगं की मस्ती हो हर कोई अपना दिखाई दे सजन (आदरणीय सुहैल अहमद हाशमी जी की रचना पर आधारित)

एहसास

एहसास एहसास सारे चुन रही होगी और ख़्यालों में बुन रही होगी तक़रार किसी बात पे ना हो होके चुपचाप सुन रही होगी ख़ामोश निगाह है तुम्हारी कई सपने भी चुन रही होगी दूरीयां खूब तड़पाए अब मेरी मजबुरी मेरी सुन रही होगी मिलन की प्यास रह गई अधुरी तेरे में वही धुन रही होगी सोचा गले मिले हो एकाकार राहे मिलन की चुन रही होगी सजन

नया प्रयोग

चार अक्षरों का प्रयोग आज रात सपने में आइ वह बैठी पास चुपचाप गुमसुम चेहरे पे उदासी के दिखे भाव पुछा मैं ने क्या है बात निरूत्तर जानेमन जागे प्रश्न बीते रात धीरे धीरे होने को है सुप्रभात स्वप्न टूटा बोध जगा था प्रभाव भूला नहीं बेवफ़ा को सुप्त मन तभी वह याद आये सपन में मौन रह चली जाय यों सताय न उपाय भूला पाय देखें स्वप्न यह मन । सजन

तलाश

उन्वान– तलाश रख हौसला मन में मंज़िल की तलाश रख प्यास अगर लगी है जल की तलाश रख थक हार के नहीं रुकना ऐ मुसाफिर हर पल कामयाबी के पल की तलाश रख परिंदो को भी मिले मंज़िल उड़ने पर बिश्वासी हो आत्मबल की तलाश रख रहे खामोश अक्सर जिन में नहीं हुनर बेहतरीन हो ऐसे कल की तलाश रख टूट जाए हर शीशा पत्थर कि चोट पर तोड़े पत्थर को उस बल की तलाश रख ज़िन्दगी हसीन है उसी से प्यार कर सुदंर हो जीवन उस पल की तलाश रख सजन

ग़जल- एक प्रयास

ग़जल- एक प्रयास बड़ी मुश्किल शरारत हो गयी है न पूछो यह बगावत हो गयी है नज़ाक़त तेरी रास आये नही ग़म से अब मोहब्बत हो गयी है अँधेरा जैसा लगता है यों ही दिल की कंही तिज़ारत हो गयी है फ़रेब व जालसाजी के हुनर से बेवफ़ाई कि आदत हो गयी है माना नाउम्मीदी की घडी़ में एक उम्मीद की चाहत हो गयी है हालात ऐसे से हो गए मेरे तु मेरे लिए इबादत हो गयी है सच तो यह है न कोई अफ़साना सजन तुझे मोहब्बत हो गयी है सजन

अरमान

अरमान आख़िर तेरे मेरेे अरमान कहाँ है दिली लेने देने के बयान कहाँ है इश्क़ ने अब तक अपनी हद नहीं देखी प्यार में जीने की पहचान कहाँ है कहा था ज़िन्दगी भर साथ निभाऊँगा तेरे उस वादे में अब जान कहाँ है मोहब्बत में पागल होना है बाक़ी तेरे दिल में प्रेम के अरमान कहाँ है प्यार में कोई भी शर्त नहीं होती जाहिर करने को वो ऐलान कहाँ है जो खूशी मिले गले मिलकर प्यार में प्यार की दीवाली रमज़ान कहाँ है उल्फ़त या मजबुरी से लड़कर जीए हम वैसे प्यार का वह अभिमान कहाँ है मन से Continue reading अरमान

अदा

अदा तेरी चाल में बिजली की अदा है तेरी लटों का लहराना जुदा है नज़र के नशीले तीर जो चलाये गुलाबी लब पर ये दिल भी फ़िदा है देखा जो तो देखते ही रह गये चेहरा गुलाब जैसा संजीदा है मुस्कुरा के तुम बर्क़ गिराते गये दिल मीठे सा दर्द से ग़मजदा है ख़ुशबू बिखेर यों आँचल फहराये चलने में किया मस्त मस्त अदा है गगन में बिजली सी चमकती जाये आशिकी में हर दिल तुम पे फिदा है हुस्न की बर्क़ ने मारा सजन तुझे ज्यों शोला भड़कता वो मसौदा है सजन

सियासत

सियासत सियासतदार झूठा रूबाब क्या देते रोटी ना दे पाये किताब क्या देते खुद नंगे जो महफ़िल में इज़्ज़त कैसे मिले बेशर्म को तब नया नकाब़ क्या देते उल्फ़त में रखे वो निज़ात कैसे पाते बदगुमानी सहे हम अस्बाब क्या देते पकड़ कर झंडे भीड़ में हम हिस्सा तो लेते पेट की आग का वो हिसाब क्या देते सभी के पेट खाली नारे बाजी ही करते टुटे हुवे दिल को अब ख्व़ाब क्या देते बच्चपन छिनके उन्हे भविष्य क्या मिले सवाल सारे सही थे जवाब क्या देते सजन

बचपन की याद

बचपन की याद बचपन की वह शरारत वह जमाना याद आता है खूब बारिस में भिगना नाहना याद आता है दौड़ा भागी खेल कुद और कितनी कितनी यादें काग़ज की कस्ती बनाकर बहाना याद आता है बचपन की वह बाहदुरी ना जाने कहाँ खो गई कभी छत की मुंडेर पर पांव चलाना याद आता है बचपन की वह दिलेरी ना जाने अब कहाँ खो गई टिफिन बक्स से दोस्त को खिलाना याद आता है बचपन की वह बात सारी न जाने कहाँ खो गई मित्र के दुख में आंसु निकल जाना याद आता है न जाने क्यों सजन को अब Continue reading बचपन की याद

मेरा देश

मेरा देश या खुदा मेरे भारत को महान बना दो अपने लोगों को अब तो इन्सान बना दो चमके हर धर आंगन मिले सभी को प्यार भूखा न सो जाये इतना धनवान बना दो बाक़ी दिल में न रहे कोई अब तकरार हर एक की हो ऐसी गीता कुरान बना दो प्यार की इबादत हो और मिले वो इज़हार बेवजह की लड़ाई न हो फ़रमान बना दो रब तिरे जलवे का है हमे खुब इंतजार खुदा हर एक आदमी को इन्सान बना दो जीए हम आपस में दुश्मनी पैदा कर भाई को भाई पे महेरबान बना दो रब न समझा Continue reading मेरा देश

ख्वाब

ख्वाब अधुरे सेे ख्वाब पर ख्व़ाबों में जीते रहे जागकर भी सारे झुठे ख्वाब देखते रहे ना कुछ करने की चाहत ना इकरार था मगर ना समझने की ज़िद हमेशा मन निभाते रहे रात को देखे ख्वाब अवचेतन मन का असर चेतन मन से दिल को उल्फ़त समझाते रहे छोड़ शर्मो-हया नाकाम ख्व़ाबों में रह कर बेहया ही से ख्व़ाब पर पलक नचाते रहे लोगों के बेबाक उलाहनो से भी बेअसर सभी बात को झुठी तकरार में दबाते रहे वक़्त की बर्फ पिघल उम्र ढलती रही इस कदर वक़्त जाने का होने लगा अब लजाते रहे “सजन” उम्र ढलने लगी Continue reading ख्वाब

बेवफ़ा

बेवफ़ा ना बारिस है न बहार है पर ख़िज़ाँ तो है रूठी मौसम सी बेवजह बेवफ़ा तो है जिस रास्ते में तेरे लिए बिछाए थे फूल उस रास्ते पर फाँक रहे धूल ख़फ़ा तो है चाहत बना ना पाए तेरे दिल में अज़ीज़ लेकिन दिल में इतंजार का हौसला तो है हर रात तिरी गली में गुजरे ग़र हाँ कहे मन्जिल इक है पर अभी भी फ़ासला तो है खुदा तुझे बख्शे तिरी बेवफ़ाई के लिए तुझे भूलाने ग़म को कंही लगाना तो है कहते हैं सब के ख़िज़ाँ में पत्ते झर जाते फिर भी बहार का आने का वादा Continue reading बेवफ़ा

बर्क़

उन्वान– बर्क़ लरज़ता दिल जब तु अदा से लचक जाती है ज़हेन में हसरत की बिजली-चमक जाती है जब कभी सामने से सजधज के तू निकले मेरे दिल-ओ-दिमाग की नशे सरक जाती है मौत भी सामने आए तो थोड़ा वक्त मांग ले ख़ौफ़ नहीं उम्मीद मन में कसक जाती है मिलन की राह में ज़माना दुश्मन हो भले शोला-ए-बर्क़ बन आग सी टसक जाती है विभोर हो देखें जो तु बलखाती सी चले की लब पर सर्द अाहें तक सिसक जाती है गिरा के बिजली खाक़े चमन किया हवाले सजन के सांसों में खूश्बु महक जाती है सजन

आँसु

आँसु उदासी में दिल को आँसु से राहत कहां मिले जुगनुओं से रोशन रात को रौशनी ना मिले आंखों से बरस पीड़ा का सैलाब उमड़ पड़े जज़्बातों को मिटा दे वो हमदर्द कहां मिले रखता दिल में महफूज़ अपने अरमान सारे कोई हमसफ़र या हमदर्द जब मुझे ना मिले हर वक़्त सभी बदगुमानी दिल पे भारी पड़े अब दर्द नहीं होता मुझे जब खूशी ना मिले आँसू को कितना समझाया बेवक्त ना झरे सजन सभी एहसासों का कभी जवाब ना मिले सजन

जुल्फ़ें

जुल्फ़ें चेहरे पे आई आवारा ज़ुल्फ़ को संवारा कीजिए ज़ुल्फ़ के पीछे छीपेे हुस्न-ए-चांद को निखारा कीजिए लहराती ये ज़ुल्फ़ नागीन सी की दिल है मचल उठे बांध के ये ज़रा कायदे से हुस्न का इशारा कीजिए रुखसार के लिये हों परेशान ऐसा ना क़हर कीजिए ज़ुल्फ़ के साये में शाम-ए-सकून गुजरे आसरा कीजिए कुडंली बना कर इन ज़ुल्फ़ों को चोटी सजाया कीजिये बेणी सजाके फूलों की इन ज़ुल्फ़ों को संवारा कीजिए ये ज़ुल्फ़ें यूँ गिराई चेहरे पर दिल दीदार को मचल उठा यों झटका के ज़ुल्फ़ मेरे दिल पे खंजर न मारा कीजिए बाँध ज़ुल्फ़ें ज़रा दीदार-ए- हुस्न का Continue reading जुल्फ़ें