सीलन भरी सुबह

सीलन भरी सुबह गंदी सी बिन नहायी, ठंड से ठिठुरती फटे चिथङों में लिपटी कोने में दुबकी बैठी थी वो लड़की…… दो तीन बार कि थी उसने कोशिश अपनी गोद में छुपाये कंकालित अर्धनग्न बिमार भाई की खातिर जाने को सड़क किनारे जलते अलाव के पास लेकिन वहां जाकर भी बारबार लौट आती थी वो उसी हिमधुसरित सीलन भरे ठंडे कौने में क्योंकि उसकी बर्दाश्त के बाहर थी वहां आग तापते लोगों कि आंखों के गर्म नाखूनों की चुभन….. ।। गोलू…… मेरा प्यारा गोलू….. इसी नाम से पुकारती थी वो अपने भाई को जो इस वक्त तप रहा था शीतकालीन Continue reading सीलन भरी सुबह

वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को

वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को बंद दरवाजों से आज फिर सिसकियाँ सुनाई पड़ रही  हैं, फिर एक बार आतंक के शोर में चूड़ियों की खनक खो गयी है, किसी के सर से फिर एक बार पिता का साया उठ गया है, किसी पिता के काँधे पर फिर एक बेटे का शव जा रहा है, आज फिर कुछ दरवाजों पर सन्नाटा बिखर गया है, कब तक यूँ सड़कों पर शोर- शराबा मचता रहेगा, क्या किसी को उनका दर्द भी नज़र आएगा, जिसने न केवल खोया है लाल अपना, पेट भरने का सहारा भी जिसका अब चला गया है, अब Continue reading वक़्त हुआ है अब कुछ कर गुजरने को

मेरे ख्वाबों ने फिर से जिन्दगी पायी है

मेरे ख्वाबों ने फिर से जिन्दगी पायी है मेरे ख्वाबों ने फिर से जिन्दगी पायी है तेरी यादों ने भी कसमसाहट पायी है। ये तेरी दिलकश अदाओं का था असर जब भी मुस्कराती बहक जाती थी नजर बनाये जाते थे हसीन यादों के महल सभी प्यार की बातें भी लगती थी गजल ख्वाब में आये तुम तो हमने यह जाना पुरानी मुलाकतों ने जिन्दगी पायी है। मेरे ख्वाबों ने फिर से जिन्दगी पायी है। मेरे गीतों में मिलती थी तेरी रागिनी जैसे जनम जनम से थी मेरी संगिनी साजे-दिल पे थरकती थी चाँदनी कभी नाचती हो किरण की जैसे हरेक Continue reading मेरे ख्वाबों ने फिर से जिन्दगी पायी है

अफसाना

अफसाना लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना…. रुक गया था कुछ देर मैं, छाॅव देखकर कहीं, छू गई मन को मेरे, कुछ हवा ऐसी चली, सिहरन जगाती रही, अमलतास की वो कली, बंद पलकें लिए, खोया र5हा मैं यूॅ ही वही, लिखने लगा ये मन, अधलिखा सा तब वो अफसाना…. कुछ अधलिखा सा वो अफसाना, दिल की गहराईयों से, उठ रहा बनकर धुआॅ सा, लकीर सी खिंच गई है, जमीं से आसमां तक, ख्वाबों संग यादों की धुंधली तस्वीर लेकर, गाने लगा ये मन, अधलिखा सा फिर वो अफसाना….. कह रहा मन मेरा बार-बार मुझसे यही, उसी Continue reading अफसाना

कछुआ

कछुआ सुनो मनुष्य मैं सरीसृप सदस्य अतिप्राचीन एक कछुआ आदिकाल से मेरी चर्चा है पुराणों में वर्णित मैं शुभता का प्रतीक सौभाग्यशाली नकारात्मकता दूर करने वाला तुमने ही तो उपाधियां प्रदान की है मुझको कहते है अमृत मंथन से निकले चौदह रत्नों में से एक रत्न हूँ मैं मंदार पर्वत को सागर में डूबने से बचाने के लिए श्री विष्णु को मेरा ही रूप भाया था कुर्मावतार ले पर्वत को बचाया था मेरी पीठ पर कड़े आवरण में छुपा है मेरी लम्बी आयु का रहस्य भाँप लेता हूँ क्षणभर में परिस्थितियों को अपने को सिकोड़ योगी की तरह समाधिस्थ हो Continue reading कछुआ

अधलिखी

अधलिखी अधलिखी ही रह गई, वो कहानी इस जनम भी …. सायों की तरह गुम हुए हैं शब्द सारे, रिक्त हुए है शब्द कोष के फरफराते पन्ने भी, भावप्रवणता खो गए हैं उन आत्मीय शब्दों के कही, कहानी रह गई एक अधलिखी अनकही सी…. संग जीने की चाह मन में ही रही दबी, चुनर प्यार का ओढ़ने को, है वो अब भी तरसती, लिए जन्म कितने, बन न सका वो घरौंदा ही, अधूरी चाह मन में लिए, वो मरेंगे इस जनम भी …. जी रहे होकर विवश, वो शापित सा जीवन, न जाने लेकर जन्म कितने, वो जिएंगे इस तरह Continue reading अधलिखी

सुई

सुई लम्बी, पतली, चमकीली किन्तु मजबूत इस्पाती चुभन लिये, देखती हूँ तुम्हारे निस्तेज थकी आँखों में घात-प्रतिघात के निशान घायल, हतोत्साहित और शंकालु तुम जैसे कोई षड्यंत्र के चक्रव्यूह में घिरे हो हर किसी पर शक की सुई घुमाते अपनों परायों के बीच पेंडुलम सा हिलता डूलता तुम्हारा आत्मविश्वास खंडित होता व्यक्तित्व डरे सहमें निढाल से तुम तनिक ठहरों तन-मन को दुरुस्त करती सुई हूँ मैं विभाजित होते अस्तित्व को सिल सकती हूँ मैं मेरे इस प्रयास में हर कदम पर मिलेगी अनोखी सी चुभन सहन कर सको तो करो धैर्य की परीक्षा है तुम्हारी काल की सहचरी मैं क्षण-क्षण Continue reading सुई

नवरात्री

नवरात्री बड़ी बड़ी बाते करने का, ये वक़्त नहीं है मेरे यारा, एक छोटा सा दिया जलाकर, दूर करो ये अँधियारा। साफ़ दिलों को करके दिल में ये अहसास जगाओ, कोई लड़की न ख़ौफ़ज़दा हो ऐसा तुम विश्वास जगाओ। इन नव रातों की पूजा से कोई ख़ास नहीं अंतर आएगा, जब तक रावण, राम हटाकर हम सब के अंदर आएगा।

कैंची

कैंची सृजन और विनाश के दोनों छोरों को मजबूती से सँभालते संतुलन के पेंच में कसे चुस्त-दुरुस्त तुम एक कैंची सर्जन के हाथ बन अवांछित, रोगग्रस्त मांस-मज्जा त्वचा की काट-छाट कर रक्त रंजित हो लम्बी थकान के बाद स्वास्थ्य प्रदान कर रख दिए जाते किसी ट्रे पर शिशु की गर्भनाल विच्छेदित कर स्वतंत्र अस्तित्व का प्रथम क्रंदन सुनते सृजन को साकार देखते गौरान्वित होते दरजी के सधे हाथों में फसे वस्त्रों पर खिंची रेखाओं से ताल मिलाते फुर्ती से काटते और बनती कई पोशाकें तन का नंगापन ढकते, सुन्दरता प्रदान कर सभ्यता की ओर आगे कदम बढ़ाते नाई/ब्यूटीशियन के हाथों Continue reading कैंची

मैं कौन हूं

मैं कौन हूं कभी सरल मुस्कानों सा, पर्वत मालाओं सा दुरूह कभी लगे पुरूस्कार संसर्ग मेरा, तो महाविदग्ध मेरा साथ कभी कभी महासिद्ध तारसप्तक सा, हूं मातृत्व सा लावण्य कभी कभी वेश्या सा वैधव्य लगूं, तो वैदेही सा हूं कारूण्य कभी मैं समय हूं…….. आविर्भूत पराक्रम हूं, कभी अभिभावक मैं लिप्साओं का चिर यौवन मेरी उत्कंठा, तो सम्बोधन कभी मैं चिताओं का अबोधगम्य बेतरतीब कहीं, असंयमी अथाह स्वच्छंद कभी कभी बेलाग बदसूरत हूं, तो सजल साश्वत अनुराग कभी मैं काल हूं…….. मोहपाश मेरा प्रतिभूत, रचता में काल अनुपम अनुप तृणवत सी इक छाया भी, तो कभी ब्रह्मांड मेरा प्रतिरूप लगे अतिलघु Continue reading मैं कौन हूं

अर्जुन विषाद

अर्जुन विषाद युद्ध में रत स्वजनों को देखते हुए अर्जुन करुणा से अतिव्याकुल हुए मुख सूखे शरीर रोमांच से कंपित हुए अंग सारे उस क्षण मानो शिथिल हुए तन जलता मन भ्रमित है  खड़ा रहने में असमर्थ है दृश्य न देखा जाता है हाथ से गांडीव फिसलता है अपनों का युद्ध में वध करूँ व्यर्थ क्यूँ सारे प्रयत्न करूँ कल्याण न कोई दिखता है अर्जुन का ह्रदय पिघलता है चाहे मिल जाए त्रिलोक्य राज्य  कुटुम्ब सभी को मार ना पाऊँगा  पृथ्वी मात्र के लिए फिर क्यों  ऐसा क्या मैं कर पाऊँगा न मैं चाहूँ सुख और राज्य न मैं चाहता Continue reading अर्जुन विषाद

चाह नहीं तेरे गीतों में

चाह नहीं तेरे गीतों में चाह नहीं तेरे गीतों में एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ चाह नहीं तेरी वीणा में उलझ तार-सा बस बन जाऊँ काव्य सुधारस पाऊँ तेरा इन प्राणों की चाह नहीं है तेरी प्रिय वाणी पर नाचूं इन गीतों की चाह नहीं है चाह नहीं तुझसे मिलने को तन तजकर मैं बाहर आऊँ चाह नहीं तेरे गीतों में एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ तू चाहे तो नवरस भर दे खाली घट में लीला भर दे चाहे तो बंशी की धुन से प्राणों में अपना स्वर भर दे चाह नहीं इन क्षणिक सुखों में प्राणों का सर्वस्व लुटा Continue reading चाह नहीं तेरे गीतों में

मै खोजती अस्तित्व

मै खोजती अस्तित्व किया आह्वान भागीरथ ने मेरा मुक्त हुई ब्रह्मा के कमन्डल से जन कल्याण के लिये, धारण किया रुद्र ने मुझे निज जटाओं पर जब मैं धरा पर आई, था मुझमे अपार स्नेह और मातृत्व, किंतु विवश मै आज खुद खोजती अपना अस्तित्व l जन मानस का उद्धार कर सदियों से निर्मल अविरल बहती आई, था औषधीय अमृत तुल्य मेरा नीर कहीं गंगा कहीं भागीरथी मैं कहलाई l था शूरवीर मेरा ही सुत अजेय भीष्म महाभारत में, नही था जिसके बाहुबल का कोई शानी उस भयंकर महासमर में l कभी था मेरे नीर का प्रवाह स्वच्छ अविरल, पापियों Continue reading मै खोजती अस्तित्व

पहर दो पहर

पहर दो पहर पहर दो पहर, हँस कर कभी, मुझसे मिल ए मेरे रहगुजर, आ मिल ले गले, तू रंजो गम भूलकर, धुंधली सी हैं ये राहें, आए न कुछ भी नजर, आ अब सुधि मेरी भी ले, इन राहों से भी तू गुजर…. पहर दो पहर, चुभते हैं शूल से मुझको, ये रास्तों के कंकड़, तीर विरह के, हँसते हैं मुझकों बींधकर, ये साँझ के साये, लौट जाते हैं मुझको डसकर, ऐ मेरे रहगुजर, विरह की इस घड़ी का तू अन्त कर…… पहर दो पहर, कहती हैं ये हवाएँ, आती हैं जो उनसे मिलकर, है बेकरार तू कितना, वो Continue reading पहर दो पहर