क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१) हे मानव व्यर्थ में क्यों करता, तू गर्व अपनी ही रचना पर तूफान में डगमगाती कश्ती तेरी, क्यों करता है अभिमान तोड़ सारे नियम स्वयं के, क्यों कर तू इतना इतराता है निशाचर विचरते निर्भीक, क्यों चिर-निद्रा में तेरा विधान किन्तु व्यग्रता तेरी तक़दीर नहीं, क्योंकि तू है मनु की संतान जकड़ लिया तेरे साम्राज्य को, तेरे ही मक्कड़ जालों ने अपने ही प्रगति-पथ पर, तेरा अहंकार बना है व्यवधान हिमीगिरि के उतुंग शिखर बैठ, गढ़ कोई इतिहास नया त्याग अहंमन्यता के भाव सारे, रच कोई नया कीर्तिमान किन्तु पथभ्रष्ट होना तेरा कर्म Continue reading क्योंकि तू है मनु की संतान (भाग-१)

चल उड़ जा रे भँवरे

चल उड़ जा रे भँवरे चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी जिसे चूम तू इतराता था ,सो गयी वो कलियों की रानी जिस ताल किनारे तू उड़ता था, सूख गया उसका पानी वीरान हुआ तेरा आशियाना, लिखनी है इक नई कहानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ तेरा दाना-पानी सूरज ढल जाए इससे पहले, तुझको अब है जाना बना ले कोई नया बसेरा, और ढूंढ ले नया ठिकाना यहां न कोई अब तेरा अपना, हर कोई हुआ बेगाना याद आएंगी वो गलियां, जहाँ बीती तेरी जवानी चल उड़ जा रे भँवरे कि, खत्म हुआ Continue reading चल उड़ जा रे भँवरे

तो ख़ुदा ख़ैर करे

तो ख़ुदा ख़ैर करे तेरे सपनों को सजाया मैंने, अपने अहसासों के रंगो से, मगर ख्वाबों में तू किसी गैर के आये, तो खुदा खैर करे कफ़न ओढ़े लेटा हूँ मज़ार में, तुझे पाने की हसरत में कब्र पर मेरी आंसू कोई गैर बहाये, तो खुदा खैर करे तराशा है जिस पत्थर को मैंने, रात-रात भर जाग कर बन जाये वह किसी गैर की मूरत, तो खुदा खैर करे जिस दामन को बचाया मैंने, हर बार जमाने की नज़रों से, वो लहराए किसी गैर की चाहत को, तो खुदा खैर करे जब-जब ठोकरें खोई तूने, मेरी बाहों ने संभाला हर Continue reading तो ख़ुदा ख़ैर करे

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना हे बटोही ! जिस राह पर तू बढ़ चला है उस राह पर आंधी और तूफ़ान विचरते हैं अक्सर निर्भीक होकर चट्टान बन ललकारेंगे तेरे साहस को डटे रहना-मत डिगाना बढ़ते क़दमों को मगर तू संभल कर चलना हे पथिक ! कांटे हैं असंख्य इस पथ पर जिस पथ पर तू चल पड़ा है हर काँटा है इंतज़ार में कि कदम तेरे रक्तरंजित हों निरंतर चलना होगा तुझे हर हाल मैं मगर तू संभल कर चलना हे राही ! जिस मार्ग पर तू निकल पड़ा है असीम बाधाएं होंगी उस मार्ग पर ठोकर Continue reading हे बटोही !मगर तू संभल कर चलना

किंकर्तव्यविमूढ

गूढ होता हर क्षण, समय का यह विस्तार! मिल पाता क्यूँ नहीं मन को, इक अपना अभिसार, झुंझलाहट होती दिशाहीन अपनी मति पर, किंकर्तव्यविमूढ सा फिर देखता, समय का विस्तार! हाथ गहे हाथों में, कभी करता फिर विचार! जटिल बड़ी है यह पहेली,नहीं किसी की ये सहेली! झुंझलाहट होती दिशाहीन मन की गति पर, ठिठककर दबे पाँवों फिर देखता, समय का विस्तार! हूँ मैं इक लघुकण, क्या पाऊँगा अभिसार? निर्झर है यह समय, कर पाऊँगा मैं केसे अधिकार? अकुलाहट होती संहारी समय की नियति पर, निःशब्द स्थिरभाव  फिर देखता, समय का विस्तार! रच लेता हूँ मन ही मन इक छोटा Continue reading किंकर्तव्यविमूढ

सैकत

असंख्य यादों के रंगीन सैकत ले आई ये तन्हाई, नैनों से छलके है नीर, उफ! हृदय ये आह से भर आई! कोमल थे कितने, जीवन्त से वो पल, ज्यूँ अभ्र पर बिखरते हुए ये रेशमी बादल, झील में खिलते हुए ये सुंदर कमल, डाली पे झूलते हुए ये नव दल, मगर, अब ये सारे न जाने क्यूँ इतने गए हैं बदल? उड़ते है हर तरफ ये बन के यादों के सैकत! ज्यूँ वो पल, यहीं कहीं रहा हो ढल! मुरझाते हों जैसे झील में कमल, सूखते हो डाल पे वो कोमल से दल, हृदय कह रहा धड़क, चल आ तू Continue reading सैकत

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे जब-जब सावन में गुजरता था तेरी आम की बगिया से होकर शरमाकर ढक लेती थी तू तब धानी चूनर से चेहरा सकुचाकर तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे पीली सरसों की पगडण्डी पर तेरा मटक-मटक कर चलना पानी का गागर उठाये इतराना फिर पीछे मुड़-मुड़ कर देखना तब गुजरे न वह पल तेरे बिन थे सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे सखियों संग बैठ सावन के झूले में टुकुर-टुकुर कर मुझे निहारना फिर झटककर घने बालों को तेरा छुप-छुप कर Continue reading सोचता हूँ कि वह भी क्या दिन थे

बजरंगबली

बजरंगबली ये एक सच्चाई है जिसे मैंने कविता का रूप दिया है : आज भी बजरंगबली ,चहुँ ओर विधमान है l श्री राम के दूत है,हम कहते इन्हे हनुमान हैll रूप विशाल है ,सिर पर मुकुट विराजमान है l हाथ में गदा लिए, चमक लाली सामान है ll देते है दर्शन उन्हें, जिनका मन पवित्र है l करते जो निऱ्स्वार्थ सेवा उनके वो मित्र हैll स्वयं को नहीं मानते, ईश्वर का वो रूप l कहते है दूत हूँ उनका नहीं हूँ उनका रूपll मै अपने भक्तों को हर संकट से बचाता हूँ l करता हूँ उनकी रक्षा,रक्षक बन जाता हूँ Continue reading बजरंगबली

एक नई दोस्त 

एक नई दोस्त एक अजनबी चेहरे से आज हुई मुलाकात एक सूंदर उपवन में शायद एक नई दोस्त चेहरा अनजान ज़रूर था मगर दिल से मुलाकात जैसे सदियों पुरानी थी मासूम चेहरा, माथे पर गंभीर रेखाएँ, झील-सी गहरी नीली आंखें उत्सुकता से भरी थी गुलाबी होंठो पर एक अजीब चुप्पी शायद दिल की पीड़ा कहना चाहती हो मासूमियत उसके चेहरे पर जैसे बचपन झांक रहा हो जो उसकी उदासी बयां करती थी मगर दिल से बहुत चंचल, चपल, मधुर न जाने क्यों मुझे प्रतीत हुआ जैसे दिल में अनगिनित जख्म छिपाये हो रेशमी काले केश जिन्हें निशा प्रहरी बनकर सहला Continue reading एक नई दोस्त 

पापों की तिलांजलि

पापों की तिलांजलि जिंदगी की भाग दौड़ में कब भोर हुई, और कब सूरज ढल गया पता ही न चला कब रात का सन्नाटा पसरा, और कब सूर्योदय की अरुणिमा ने आंखें खोली मालूम न हुआ कब चाँद-सितारे चमके आकाश में, और कब सूरज की किरणों ने जगाया अलसाई कलियों को ज्ञात न हुआ कब काले मेघों ने बरसाए मोती धरा पर, और कब बसंत ने किया शृंगार सावन के झूलों संग मालूम न पड़ा कब बचपन बीता, और कब यौवन ने ली अंगड़ाई पता ही न चला बेचारी ज़िन्दगी उलझी रही क्रोध के अंगारो में लालच के शोलों में Continue reading पापों की तिलांजलि

निशिगंधा

निशिगंधा घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? निस्तब्ध हो चली निशा, खामोश हुई दिशाएँ, अब सुनसान हो चली सब भरमाती राहें, बागों के भँवरे भी भरते नहीं अब आहें, महक उठी है,फिर क्युँ ये निशिगंधा? प्रतीक्षा किसकी सजधज कर करती वो वहाँ? मन कहता है जाकर देखूँ, महकी क्युँ ये निशिगंधा? घनघोर निशा, फिर महक रही क्युँ ये निशिगंधा? है कोई चाँद खिला, या है वो कोई रजनीचर? या चातक है वो, या और कोई है सहचर! क्युँ निस्तब्ध निशा में खुश्बू बन रही वो बिखर! शायद ये हैं उसकी निमंत्रण के आस्वर! क्या प्रतीक्षा के ये पल Continue reading निशिगंधा

अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

अभियंता-एक ब्रम्ह पुरुष हे ब्रम्हा पुरुष अभियंता तूने जगत का उद्धार किया । महाकाल बनकर हर विनाश का प्रतिकार किया ।। तेरी परीकल्पना से भुत भविष्य सब निर्भर है । हे विश्वकर्मा के मानस अक्श तेरी सिंचन से जग निर्झर है ।। पत्थर तोड़ लोहा बनाते पारस बन कुंदन । खुशबु बन जग को महकाते घिसकर तुम चन्दन ।। माटी बन कुम्हार का तूने हर मूरत को गढ़ा है । शिलालेख पर आलेख बनकर पंचतत्व को पढ़ा है।। बनकर ऊर्जा पुंज तूने किया राष्ट्र का विकास । मंगल पर पद चिन्ह बनाया । पहुचकर दूर आकाश ।। कर्तव्यनिष्ठा पर संकल्पित Continue reading अभियंता – एक ब्रम्हपुरुष

तेरा पागल दीवाना

तेरा पागल दीवाना हवा के एक नटखट झोंके ने तेरे गालों को छूकर किया अपने प्यार का इजहार हवा का नटखट झोंका सहलाता रहा बार-बार तेरे कोमल गालों को और करता रहा इन्तजार कि तू सिर्फ एक बार अपनी नशीली आँखों से उस प्यासी कशिश के अनमोल क्षणों को उतार ले अपनी गर्म साँसों की गहराई में मगर डूबी हुई थी तू अपने ही ख्यालों में इतना कि हो न सका अहसास तुझे किसी के पागलपन का था दीवाना कितना वो तेरी रेशम सी मुलायम कपोलों का छूना चाहा जब-जब उसने तेरे नरम गालों को फिसल गए अरमान उसके बार-बार Continue reading तेरा पागल दीवाना

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि ) प्यारे दोस्तों, ये कविता स्वo नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करता हूँ | प्रद्युमन रेयान पब्लिक स्कूल, गुरुग्राम (गुडगाँव) का वह छात्र है जो कुछ ही दिन पहले एक दरिंदे के हाथों हम सबको छोड़कर परियों के देश चला गया है| इश्वर उसकी अमर आत्मा को शांति दे| माँ मेरी कैसे मैं तुझे समझाऊँ क्या हुआ मुझे कैसे मैं बतलाऊँ पीड़ा अपनी मैं कैसे जतलाऊँ बिन तेरे माँ बहुत मैं घबराऊँ न करना अब इंतज़ार मेरा कभी न लौटेगा लाडला तेरा क्योंकि तू जान है Continue reading माँ न करना अब इंतज़ार मेरा (नन्हा प्रद्युमन को एक श्रद्धांजलि )

मेरे शहर में

मेरे शहर में बेगुनाहों की लाशों पर, बेखौफ चलते हैं लोग यहाँ फिर क्यों रिश्तों को, बिलखते हैं लोग मेरे शहर में खबर है कि मेघा, खूब बरसे हैं इस बार सावन में फिर क्यों बूँद-बूँद को, तरसते हैं लोग मेरे शहर में हर गली सरकारी चर्चा है, कि भरे हैं भंडार अनाजों के फिर क्यों भूख से तड़पते हैं, मासूम बच्चे मेरे शहर में काली घटा छाई, तो मेघ गरजने लगे हैं आकाश में गरजते हैं तो फिर क्योँ बरसते हैं मेघ मेरे शहर में सूरज की रोशनी में, रात का ख़ौफ़नाक सन्नाटा देखा है मैंने फिर क्यों दिन Continue reading मेरे शहर में