बर्फ के फाहे

कुछ फाहे बर्फ की, जमीं पर संसृति की गिरीं…..   व्यथित थी धरा, थी थोड़ी सी थकी, चिलचिलाती धूप में, थोड़ी सी थी तपी, देख ऐसी दुर्दशा, सर्द हवा चल पड़ी, वेदनाओं से कराहती, उर्वर सी ये जमी, सनैः सनैः बर्फ के फाहों से ढक चुकी…..   कुछ बर्फ, सुखी डालियों पर थी जमीं, कुछ फाहे, हरी पत्तियों पर भी रुकी, अवसाद कम गए, साँस थोड़े जम गए, किरण धूप की, कही दूर जा छुपी, व्यथित जमीं, परत दर परत जम चुकी….   यूँ ही व्यथा तभी, भाफ बन कर उड़ी, रूप कई बदल, यूँ बादलों में उभरी, कभी धुआँ, Continue reading बर्फ के फाहे

अनन्त प्रणयिनी

कलकल सी वो निर्झरणी, चिर प्रेयसी, चिर अनुगामिणी, दुखहरनी, सुखदायिनी, भूगामिणी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… छमछम सी वो नृत्यकला, चिर यौवन, चिर नवीन कला, मोह आवरण सा अन्तर्मन में रमी, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… धवल सी वो चित्रकला, नित नवीन, नित नवरंग ढ़ला, अनन्त काल से, मन को रंग रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… निर्बाध सी वो जलधारा, चिर पावन, नित चित हारा, प्रणय की तृष्णा, तृप्त कर रही, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… प्रणय काल सीमा से परे, हो प्रेयसी जन्म जन्मान्तर से, निर्बोध कल्पना में निर्बाध बहती, मेरी अनन्त प्रणयिनी…… अतृप्त तृष्णा अजन्मी सी, तुम में ही समाहित है ये कही, तृप्ति की Continue reading अनन्त प्रणयिनी

मौत एक सच्चाई

बेशक विज्ञानं ने हर जगह सफलता हासिल की है l मौत और जिंदगी तो ऊपर वाले ने ही लिखी है ll वही होता है और होगा जो ऊपर वाला चाहता हैl बिना उसकी मर्ज़ी के पत्ता भी नहीं हिल पाता है ll किन्तु किस्मत के भरोसे कभी नहीं बैठना चाहिएl हमें जीतने के लिए कोशिशे करते रहना चाहिए ll इंसान अपने कर्मो से ही अपनी किस्मत बनाता हैl मेहनत से तो किस्मत का लिखा भी बदल जाता हैll जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले की ही गुलाम है l फिर हम अपने पर क्यों करते इतना गुमान है ll गुमान Continue reading मौत एक सच्चाई

प्रेम सेतु

मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। मगर मैंने तो थामा है हाथ तुम्हारा, जिसे मैं कभी छोड़ नहीं सकता। प्रेम बनेगा सेतु हम दो तटों के बीच, जिसे सैलाब भी तोड़ नहीं सकता। तटों के बीच बहती प्रेम धारा को, प्रचंड तूफ़ान भी मोड़ नहीं सकता। मैं और तुम हैं नदी के दो किनारे, जिन्हें खुदा भी जोड़ नहीं सकता। (किशन नेगी)

आँखें

तुम हो मेरे बता गयी आँखें। चुप रहके भी जता गयी आँखें।। छू गयी किस मासूम अदा से, मोम बना पिघला गयी आँखें। रात के ख़्वाब से हासिल लाली, लब पे बिखर लजा गयी आँखें। बोल चुभे जब काँटे बन के, गम़ में डूबी नहा गयी आँखें। पढ़ एहसास की सारी चिट्ठियाँ, मन ही मन बौरा गयी आँखें। कुछ न भाये तुम बिन साजन, कैसा रोग लगा गयी आँखें।      #श्वेता🍁

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो चेहरे को आँचल से ढक कर, यूँ टुकुर-टुकुर ना मुझे देखा करो। मेरी आँखों का नूर हो तुम सनम, यूँ गैर बनकर ना मुझे देखा करो। मेरे दिल की धड़कन हो तुम, अजनबी बनकर न धड़का करो। दिल की बात ग़ज़ल में कहती हो, यूँ हर बात पर ना भड़का करो। बनकर हसीं सावन की घटा, यूँ बादलों को ना सताया करो। प्यासे दिलों की धड़कन हो तुम, यूँ गीत विरह का ना गाया करो। दिल की खिड़कियाँ तोड़ कर, यूँ मेरे ख़्वाबों में ना आया करो। दिल की बात दिल को बताकर, यूँ तड़पाकर Continue reading यूँ टुकुर-टुकुर ना देखा करो

पलाश

काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… चाहे पुकारता किसी नाम से, रखता नैनों मे इसे हरपल, परसा, टेसू, किंशुक, केसू, पलाश, या प्यार से कहता दरख्तेपल…. दिन बेरंग ये रंगते टेसूओं से, फागुन सी होती ये पवन, होली के रंगों से रंगते उनके गेेसू, अबीर से रंगे होते उनके नयन….. रमते इन त्रिपर्नकों में त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, नित दिन कर पाता मैं ब्रम्हपूजन, हो जाती नित ये पूजा विशेष….. दर्शन नित्य ही होते त्रित्व के, होता व्याधियों का अंत, जलते ये अवगुण अग्निज्वाला में, नित दिन होता मौसम बसंत…. काश! खिले होते हर मौसम ही ये पलाश… —————————- Continue reading पलाश

गज़ल

भरोसा किया था जिन पर, वही आज पराये हो गए, अपने ही क़दमों के निशान, न जाने कहाँ खो गए | मिटाने चले थे हस्ती हमारी, मगर खुद ही मिट गए, अपनी ही सजाई महफिल में, ज़नाब खुद ही पिट गए| कदम जो पड़े उनके मयखाने में, शराब बरसने लगी, आँखों से उनकी पीने को, आज ग़ज़ल भी तरसने लगी। चल कर तेरी महफ़िल में, आज खुद शबाब आया है, एक हाथ में ग़ज़ल और एक हाथ में शराब लाया है। वो आयी जब मेरी मज़ार पर, मुर्दे भी मचलने लगे, बिजली लगी चमकने, दीवाने बादल भी गरजने लगे। दीवानों Continue reading गज़ल

कूक जरा, पी कहाँ

ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! छिपती छुपाती क्युँ फिरती तू, कदाचित रहती नजरों से ओझल तू, तू रिझा बसंत को जरा, ऊँची अमुआ की डाली पर बैठी है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! रसमय बोली लेकर इतराती तू, स्वरों का समावेश कर उड़ जाती तू, जा प्रियतम को तू रिझा, मन को बेकल कर छिप जाती है तू कहाँ? ऐ री प्यारी पपीहा, तू कूक जरा, पी कहाँ.., पी कहाँ.., पी कहाँ..! बूँदें बस अंबर का ही पीती तू, मुँह खोल एकटक Continue reading कूक जरा, पी कहाँ

🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे पता नहीं वाग्जाल आ-आकर रुक जाते क्यों लबों पर मेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। इस गुफ़्तगू की निशा में जाने क्यों गुमसुम रहा हूँ ? इस दरमियान में कितना क़हर भरा दरवेश रहा हूँ ऊँघते नैनों में कबतक विकल हुए कल्प धनेरे क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो भरम के बाड़े। मिले तार ह्रदय- बीन के तो सुर संसार में द्यतिमय हो जाँय हर्ष- विषाद का मानस लिखकर उसमें हम लीन हो जाँय सुरभित हों जीवन तुम्हारे, पराये बनें संगी तेरे। क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे तुम हो Continue reading 🎭क्या चर्चा करूँ प्रेमी तुमसे🎭

मन की नमी

मन की नमी दूब के कोरों पर, जमी बूँदें शबनमी। सुनहरी धूप ने, चख ली सारी नमी। कतरा-कतरा पीकर मद भरी बूँदें, संग किरणों के, मचाये पुरवा सनसनी। सर्द हवाओं की छुअन से पत्ते मुस्काये, चिड़ियों की हँसी से, कलियाँ हैं खिलीं, गुलों के रुख़सारों पर इंद्रधनुष उतरा, महक से बौरायी, हुईं तितलियाँ मनचली। अंजुरीभर धूप तोड़कर बोतलों में बंद कर लूँ, सुखानी है सीले-सीले, मन की सारी नमी। #श्वेता🍁

सुरमई अंजन लगा

सुरमई अंजन लगा सुरमई अंजन लगा निकली निशा। चाँदी की पाजेब से छनकी दिशा।। सेज तारों की सजाकर चाँद बैठा पाश में, सोमघट ताके नयन भी निसृत सुधा की आस में, अधरपट कलियों ने खोले, मौन किरणें चू गयी मिट गयी तृषा। छूके टोहती चाँदनी तन निष्प्राण से निःश्वास है, सुधियों के अवगुंठन में बस मौन का अधिवास है, प्रीत की बंसी को तरसे, अनुगूंजित हिय की घाटी खोयी दिशा। रहा भींगता अंतर्मन चाँदनी गीली लगी, टिमटिमाती दीप की लौ रोई सी पीली लगी, रात चुप, चुप है हवा स्वप्न ने ओढ़ी चुनर जग गयी निशा। #श्वेता🍁

मुख्तसर सी कोई बात

मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. सांझ की किरण, रोज ही छू लेती है मुझे, देखती है झांक कर, उन परदों की सिलवटों से, इशारों से यूँ ही, खींच लाती है बाहर मुझे, सुरमई सी सांझ, ढ़ल जाती है फिर आँखों में मेरी! सिंदूरी ख्वाब लिए, फिर सो जाती है रात… मुख़्तसर सी, कोई न कोई तो होगी उसमें बात…. झांकती है सुबह, उन खिड़कियों से मुझे, रंग वही सिंदूरी, जैसे सांझ मिली हो भोर से, मींचती आँखों में, सिन्दूरी सा रंग घोल के, रंगमई सी सुबह, बस जाती है फिर आँखों में मेरी! दिन ढ़ले फिर, Continue reading मुख्तसर सी कोई बात

आत्मकथा

खुद को समझ महान, लिख दी मैने आत्मकथा! इस तथ्य से था मैं बिल्कुल अंजान, कि है सबकी अपनी व्यथा, हैं सबके अनुभव, अपनी ही इक राम कथा, कौन पढे अब मेरी आत्मकथा? अंजाना था मैं लेकिन, लिख दी मैने आत्मकथा! हश्र हुआ वही, जो उसका होना था, भीड़ में उसको खोना था, खोखला मेरा अनुभव, अधूरी थी मेरी कथा, पढता कौन मेरी ऐसी आत्मकथा? अधूरा अनुभव लेकर, लिखी थी मैने आत्मकथा! अनुभव के है कितने विविध आयाम, लघु कितना था मेरा ज्ञान, लघुता से अंजान, कर बैठा था मैं अभिमान, बनती महान कैसे ये आत्मकथा? अभिमानी मन लेकर, लिखी Continue reading आत्मकथा

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… यादों के कितने ही लम्हे देकर, अनुभव के कितने ही किस्से कहकर, पल कितने ही अवसर के देकर, थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर, कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल… प्रगति के पथ प्रशस्त देकर, रोड़े-बाधाओं को कुछ समतल कर, काम अधूरे से बहुतेरे रखकर, निरंतर बढ़ने को कहकर, युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल… अपनों से अपनों को छीनकर, साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर, पीढी की नई श्रृंखला रचकर, जन्म नए से युग को देकर, सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल…. नव ऊर्जा बाहुओं Continue reading बदल रहा ये साल