नवरात्री

नवरात्री बड़ी बड़ी बाते करने का, ये वक़्त नहीं है मेरे यारा, एक छोटा सा दिया जलाकर, दूर करो ये अँधियारा। साफ़ दिलों को करके दिल में ये अहसास जगाओ, कोई लड़की न ख़ौफ़ज़दा हो ऐसा तुम विश्वास जगाओ। इन नव रातों की पूजा से कोई ख़ास नहीं अंतर आएगा, जब तक रावण, राम हटाकर हम सब के अंदर आएगा।

कैंची

कैंची सृजन और विनाश के दोनों छोरों को मजबूती से सँभालते संतुलन के पेंच में कसे चुस्त-दुरुस्त तुम एक कैंची सर्जन के हाथ बन अवांछित, रोगग्रस्त मांस-मज्जा त्वचा की काट-छाट कर रक्त रंजित हो लम्बी थकान के बाद स्वास्थ्य प्रदान कर रख दिए जाते किसी ट्रे पर शिशु की गर्भनाल विच्छेदित कर स्वतंत्र अस्तित्व का प्रथम क्रंदन सुनते सृजन को साकार देखते गौरान्वित होते दरजी के सधे हाथों में फसे वस्त्रों पर खिंची रेखाओं से ताल मिलाते फुर्ती से काटते और बनती कई पोशाकें तन का नंगापन ढकते, सुन्दरता प्रदान कर सभ्यता की ओर आगे कदम बढ़ाते नाई/ब्यूटीशियन के हाथों Continue reading कैंची

मैं कौन हूं

मैं कौन हूं कभी सरल मुस्कानों सा, पर्वत मालाओं सा दुरूह कभी लगे पुरूस्कार संसर्ग मेरा, तो महाविदग्ध मेरा साथ कभी कभी महासिद्ध तारसप्तक सा, हूं मातृत्व सा लावण्य कभी कभी वेश्या सा वैधव्य लगूं, तो वैदेही सा हूं कारूण्य कभी मैं समय हूं…….. आविर्भूत पराक्रम हूं, कभी अभिभावक मैं लिप्साओं का चिर यौवन मेरी उत्कंठा, तो सम्बोधन कभी मैं चिताओं का अबोधगम्य बेतरतीब कहीं, असंयमी अथाह स्वच्छंद कभी कभी बेलाग बदसूरत हूं, तो सजल साश्वत अनुराग कभी मैं काल हूं…….. मोहपाश मेरा प्रतिभूत, रचता में काल अनुपम अनुप तृणवत सी इक छाया भी, तो कभी ब्रह्मांड मेरा प्रतिरूप लगे अतिलघु Continue reading मैं कौन हूं

अर्जुन विषाद

अर्जुन विषाद युद्ध में रत स्वजनों को देखते हुए अर्जुन करुणा से अतिव्याकुल हुए मुख सूखे शरीर रोमांच से कंपित हुए अंग सारे उस क्षण मानो शिथिल हुए तन जलता मन भ्रमित है  खड़ा रहने में असमर्थ है दृश्य न देखा जाता है हाथ से गांडीव फिसलता है अपनों का युद्ध में वध करूँ व्यर्थ क्यूँ सारे प्रयत्न करूँ कल्याण न कोई दिखता है अर्जुन का ह्रदय पिघलता है चाहे मिल जाए त्रिलोक्य राज्य  कुटुम्ब सभी को मार ना पाऊँगा  पृथ्वी मात्र के लिए फिर क्यों  ऐसा क्या मैं कर पाऊँगा न मैं चाहूँ सुख और राज्य न मैं चाहता Continue reading अर्जुन विषाद

चाह नहीं तेरे गीतों में

चाह नहीं तेरे गीतों में चाह नहीं तेरे गीतों में एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ चाह नहीं तेरी वीणा में उलझ तार-सा बस बन जाऊँ काव्य सुधारस पाऊँ तेरा इन प्राणों की चाह नहीं है तेरी प्रिय वाणी पर नाचूं इन गीतों की चाह नहीं है चाह नहीं तुझसे मिलने को तन तजकर मैं बाहर आऊँ चाह नहीं तेरे गीतों में एक पंक्ति-सा मैं बन जाऊँ तू चाहे तो नवरस भर दे खाली घट में लीला भर दे चाहे तो बंशी की धुन से प्राणों में अपना स्वर भर दे चाह नहीं इन क्षणिक सुखों में प्राणों का सर्वस्व लुटा Continue reading चाह नहीं तेरे गीतों में

मै खोजती अस्तित्व

मै खोजती अस्तित्व किया आह्वान भागीरथ ने मेरा मुक्त हुई ब्रह्मा के कमन्डल से जन कल्याण के लिये, धारण किया रुद्र ने मुझे निज जटाओं पर जब मैं धरा पर आई, था मुझमे अपार स्नेह और मातृत्व, किंतु विवश मै आज खुद खोजती अपना अस्तित्व l जन मानस का उद्धार कर सदियों से निर्मल अविरल बहती आई, था औषधीय अमृत तुल्य मेरा नीर कहीं गंगा कहीं भागीरथी मैं कहलाई l था शूरवीर मेरा ही सुत अजेय भीष्म महाभारत में, नही था जिसके बाहुबल का कोई शानी उस भयंकर महासमर में l कभी था मेरे नीर का प्रवाह स्वच्छ अविरल, पापियों Continue reading मै खोजती अस्तित्व

पहर दो पहर

पहर दो पहर पहर दो पहर, हँस कर कभी, मुझसे मिल ए मेरे रहगुजर, आ मिल ले गले, तू रंजो गम भूलकर, धुंधली सी हैं ये राहें, आए न कुछ भी नजर, आ अब सुधि मेरी भी ले, इन राहों से भी तू गुजर…. पहर दो पहर, चुभते हैं शूल से मुझको, ये रास्तों के कंकड़, तीर विरह के, हँसते हैं मुझकों बींधकर, ये साँझ के साये, लौट जाते हैं मुझको डसकर, ऐ मेरे रहगुजर, विरह की इस घड़ी का तू अन्त कर…… पहर दो पहर, कहती हैं ये हवाएँ, आती हैं जो उनसे मिलकर, है बेकरार तू कितना, वो Continue reading पहर दो पहर

जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा

जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा होगी कब इक मुलाकात मैं सोचता रहा। सुना था तू मेरे दर आके लौट गया था क्या थी कमी मुझमें मैं बस यही सोचता रहा। तुम इक आवाज बन फलक में गूँजते रहे मैं बहरों की भीड़ में बहरा बन छिपता रहा। तू मिला भी तो इक गरीब अजनबी की तरह मैं अमीरों की तरह तिजोरी खंगालता रहा। रात इधर ढलती रही दिन उधर निकलता रहा मैं कंपित लौ का दिया धुँआ धुँआ जलता रहा। चिरागे-हयात तूने ही जलाके बुझा दिया मैं नाहक ही Continue reading जिन्दगी भर मैं तुम्हें यूँ ही खोजता रहा

निर्भया

निर्भया अहसास से ही काँप जाता मन , कहीं सुनसान इलाके किसी बियाबान अँधेरे में लुटता किसी अबला का तन , करती कभी मिन्नतें, कभी हाथ जोड़ वह गिड़गिड़ाती पर नहीं पसीजते वहशी दरिंदो के मन l सुकोमल सी वह कांचन काया, विधाता की अनुपम कृति, जो हैं एक बहन, बेटी, बहू की स्मृति l उसका यौवन सौन्दर्य ही बन गया उसके लिए अभिशाप, किसे थी खबर कौन वहशी दरिंदा करेगा यह पाप l क्या – क्या सपने बुने होंगे उसने जीवन के, टुकड़े-टुकड़े कर दिए पापियों ने तन-मन के l थर्रा उठता हैं रोम-रोम उस घृणित कुकर्म के बारे Continue reading निर्भया

धुन एक ही

धुन एक ही यह शरीर नश्वर तर जाए भव सागर जीवन की! धुन एक ही लगी बस सागर पार जाने की, तड़ जाऊँ सब बाधा विघ्न दुनियाँ की, जोगी सा रमता मन धुन बस रम जाने की। मन मस्त कलंदर बावरा दिल रमता जोगी, लगन लगी अथाह सागर तर जाने की, कागद के टुकड़ों सा तन बस गल जाने की। धुन में रमता मन परवाह नही कुछ तन की, पल आश-निराश के समय अवसान की, पल पल गलता जीवन हिमखंड शिलाओं सी। शरण आया तेरे ईश्वर आस लिए मोक्ष की, कुछ बूँद छलका दे अपनी अनुकंपा की, ये शरीर नश्वर Continue reading धुन एक ही

रंग

रंग रंगों की दुनिया से एक खबर लाई है, ये नमकीन हवाएँ उसे छूकर आई है। गुलाल उसके हाथों में और गुलाबी दिखता है, मुझे तो हवाओं का मिजाज भी शराबी दिखता है। रंगों के बहाने काश एक बात हो जाए, उनसे मुद्दतों बाद एक मुलाक़ात हो जाए। उसके रंग से रंगों को रंगीन कर देते हैं, जो अपनी आहट से ही मौसम को हसीं कर देते है। कोई तो लाओ वो रंग मेरी जिंदगी में जो उसकी नाजुक मुस्कान से बहा करते थे उसके रंगीन चिरागों का कुछ ऐसा जलवा था हम दीवाली को भी होली समझा करते थे।

शह और मात

शह और मात तुम्हें लगा था प्यार की बाजीगरी में उस्ताद हो तुम बाजी लगी अनाड़ी मैं खेल के नियम तुमने बताया एक से एक शातिर चाल हर चाल में मात चाहत और आहत के बीच खतरनाक खेल चलता रहा धीरे-धीरे मैं तुमसे बहुत आगे निकल गई तुम्हारी हर चाल से वाकिफ तुम्हारी जीत हार में तब्दील हुई तुमने हार कर मुझे खो दिया हमने जीत कर तुम्हें खो दिया अब दोनों अपने बिछाए मोहरों के चक्रव्यूह में घिर चुकें हैं हमारे अपने हमसे दूर हो चुकें हैं इस द्वीप में हम साथ तो हैं किन्तु उमस भरा मौन है Continue reading शह और मात

मुक्तक

पूर्वानुमान सब धुंवा हो गये, हो गयी गणितें सारी बेकार, देखो भईया प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, बड़ा अनोखा हाल चहुं ओर पानी ही पानी, कृपा बरस रही इंद्र की या फ़िर है ये मनमानी l

आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना

आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना आता नहीं मुझे यूँ बेमौत मर जाना सीखा नहीं हौसलों ने भी बिखर जाना। काँटों को भाता है चुभकर टूट जाना फूलों की शान है महककर बिखर जाना। हमें अब भी आता है बच्चों की तरह उछलते कूदते मुस्कराते घर जाना। पंख फैलाये उड़ान लेने के पहले चिड़िया जान लेती है कि है किधर जाना। मैं भी इक आदमी हूँ ठीक खुदा की तरह हर पल कुछ करते हुए और निखर जाना। सीने से निकल लब तक आती ये पुकार ये भी मेरी इबादत का है सँवर जाना। ——- भूपेन्द्र कुमार दवे 00000

प्रदूषण

प्रदूषण धूल, धुंआ और गन्दा पानी l शोर मचाकर करे शैतानी ll रूप बदलकर जो आता है l वो प्रदूषण ही कहलाता है ll चिमनी का गंदा धुंआ छाये l साँस लेने में परेशानी आये ll धूल व धुंआ उड़ाती गाड़ियां l लाती फेफड़ो की बीमारियां ll इस रूप में जो आता है l वायु प्रदूषण कहलाता है ll पानी में जब कूड़ा बहाये l इससे पानी गन्दा हो जाये ll फिर पीने के काम ना आये l ये ही जल प्रदूषण कहलाये ll लाउडस्पीकर पर शोर मचाना l बिन वजह फिर हॉर्न बजाना ll कानों को जब शोर ना Continue reading प्रदूषण