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Author Topic: दुविधा?  (Read 515 times)

Offline anshu.gupta.1614460

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दुविधा?
« on: August 24, 2012, 10:56:36 AM »
दुविधा जीवन के हर पल की
दुविधा आने वाले कल की
काली अंधियारी रैना को सूरज की चाहत होती है
तपते सूरज को ठंडी शमों से राहत होती है
होती सुबह कभी मन चाही
लेकिन मन चाही शाम नहीं ढलती...।
दुविधा..................................।
भीड़ मे मन एकांत चाहता
कुछ पल होना शांत चाहता
फिर जब मिल जाती तनहाई
तो तनहाई भी दिल को खलती...।
दुविधा...............................।
छोटी छोटी खुशिया दबी हुई खाबों के तले
दौड़े बहुत खाबों के लिए
पर खुशियो के लिए एक पग न चले
जब टूटे ख़ाब kabhi फिर खुशिया भी नहीं मिलती...।
दुविधा....................................................
जीवन भर लड़ते है हम कितना सब कुछ पाने को
लेकिन कफन मे जेब नहीं,
संग कुछ भी ले जाने को
सब मिट्टी बन जाता जब काया धरती मे मिलती...।
दुविधा.....................................................।





Offline Vishvnand

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Re: दुविधा?
« Reply #1 on: August 24, 2012, 01:01:55 PM »
दुविधा पर रचना ये  सुन्दर अर्थपूर्ण और मनभावन है
हार्दिक अभिनन्दन रचना पर अतिम छंद तो बहु  सुन्दर है

सबकुछ तो नाही है दुविधा फिर भी हम उसके गुलाम हैं
लगता जैसे जीवन अपना  दुविधा में सुविधा आराम है  :)

Offline Sajan Murarka

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Re: दुविधा?
« Reply #2 on: August 25, 2012, 11:10:49 AM »
अंतिम चरण कविता की जान है,
सुन्दर लेखन में आपकी अब पहचान है
में , मेरी तन्हाई, कुछ बीते लम्हे , कागज के कुछ टुकड़े को समेटे दो पंक्तिया . .

Offline kedar.mehendale

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Re: दुविधा?
« Reply #3 on: August 25, 2012, 12:36:03 PM »
सब मिट्टी बन जाता
जब काया धरती मे मिलती...।
इस आंतिम सत्य के पल
कोही दुविधा नहीं रहती .......। 

रचना ये सुंदर इसमे
नहीं है दुविधा कोही
मगर लगती और सही
गर गंभीर कविता मे पोस्ट होती...।
« Last Edit: August 25, 2012, 12:39:37 PM by kedar.mehendale »

Offline anshu.gupta.1614460

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Re: दुविधा?
« Reply #4 on: August 26, 2012, 07:34:18 PM »
धन्यवाद!