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Author Topic: क्रांति - मशाल  (Read 907 times)

Offline Rakeshmcdba

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क्रांति - मशाल
« on: February 03, 2014, 08:15:36 PM »
क्रांति - मशाल
घन-घोर अन्धेरा छाया है, अब दिव्य-प्रकाश निकलने दो ।
मन के शोलों को भड़काओ, क्रांति-मशाल को जलने दो ॥
निकलो ऐसी आंधी बन कर, उड़ा दो भ्रष्ट कुशासन को ।
चीर हरण अब हो न कहीं, तो नष्ट करो दुष्सासन को ॥
दब न जाये अब चीख कोई, बदलो चीखों को दहाड़ों में ।
राजाओं ने बहुत सताया है, गिरने दो गाज रजवाड़ों में ॥
इन भ्रष्ट सिपहसालारों ने, सोने की चिड़िया को मारा है ।
लूट कर हमारी कमाई से, अपने युवराजों को श्रृंगारा है ॥
दुर्दशा देश की बहुत हो चुकी,  अब थोड़ा तो सम्हलने दो ।
भेड़ियों का शासन खत्म करो, और इंसानों की चलने दो ॥
मरुभूमि-बनी-जन्मभूमि मेरी, कुछ लहू की बुँदें गिराने दो ।
अन्धेरे की छाती पर चढ़ कर, विजय-पताका फहराने दो ॥
खुशहाल बने फिर देश मेरा, फिर राम-राज आ जाने दो ।
सम्मृधियाँ फिर बरसने दो, अब महा-शक्ति कहलाने दो ॥


- राकेश
« Last Edit: February 03, 2014, 08:18:40 PM by Rakeshmcdba »

Harshit Awasthi

  • Guest
Re: क्रांति - मशाल
« Reply #1 on: November 03, 2018, 09:19:08 PM »
Janu
Hello