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Author Topic: होली पर हमने फेंका …………कल द्विअर्थ का जाल  (Read 212 times)

Offline praveen.gola.56

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 होली पर हमने फेंका  …………कल द्विअर्थ का जाल ,
अपने सजना को "सजन" लिख  ……… कर दिया बड़ा बवाल ।

जाल में फँसी मछली जब  .......... खुद लगी शब्दों को समझाने ,
तब बिन पानी और रंगों के  ……… हम लगे होली मनाने ।

ये कैसी है शब्दों की नगरी  .......... जो ला दे पल में एक भूचाल ,
क्या मेरा "सजन" हो नहीं सकता  .......... एक लेखक विशाल ?

सोच रहे थे कल हम लिखते-लिखते  ………… कि क्या प्रतिक्रिया यहाँ पर होगी ?
जब शब्दों से हम होली खेलेंगे ………… और होलिका दिल में किसी के जलेगी ।

देने को इतना आतुर क्यूँ थे ………… हमारी कविता का शीघ्र जवाब ?
कुछ दिन तो रंग को चढ़ने देते …………क्या पता तब देते हम ही कोई नया खिताब ?

"सर्वश्रेष्ठ होली सम्मान" …………चलो तुमको दिया आज से ज्ञानी महान ,
"बुरा ना मानो होली है " ..........मन में धरो ये संकल्प श्रीमान !!
« Last Edit: March 14, 2014, 01:18:44 AM by praveen.gola.56 »