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Author Topic: तुम मेरे पास रहो ऐसी जहाँ तक दुनिया होए ख़तम ….. ”  (Read 525 times)

Offline Vishvnand

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तुम मेरे पास रहो ऐसी जहाँ तक दुनिया होए ख़तम …..! ( गीत)

http://dl.dropbox.com/u/99009439/Tum%20Mere%20Paas%20Raho%20aisee%20091212.mp3

इस “ख़तम” गीत का जनम …!

हम दोनों जिगरी दोस्त
इंजीनियरिंग कॉलेज के होस्टल में एक साथ थे
हमारी वार्षिक परीक्षा का समय था
रात ग्यारह बजे थे, दोस्त मग्न हो
ध्यान से परीक्षा के लिए पढ़ रहा था,
पर मुझे अचानक इक कविता सूझी थी,
और मैं बिना उसे बताये चुप से लिख रहा था.

जब कविता पूरी हो गयी
तो दोस्त को तुरंत सुनाना चाहा,
जैसा काफी बार उसे सताता था
वो बोला “अरे अब ये कैसी मुसीबत है यार,
ऐसे समय में तुझे कविता कैसे सूझती है
अच्छा छोटी सी हो तो ही सुना”,
मैंने यूं ही कहा “हाँ” और पढ़कर सुनाना शुरू किया …

“कविता का शीर्षक ‘ख़तम’

“तेरी इन भोली आँखों में मै अपने को खोऊं कितना,
तेरे इन मीठे होटों से पीऊँ भी और अब कितना,
कि अब तक भरा नहीं मन ये, न होती प्यास भी कुछ कम,
तुम मेरे पास रहो ऐसी जहाँ तक दुनिया होए ख़तम ….. ”


इतना पढ़ा ही था की वो बोल पडा
” वाह क्या बात है, बहुत अच्छी है ”
और अपनी पुस्तक से जुट गया,
मैंने कहा “अरे भई अभी कविता और है”
वो बोला ” तूने ही तो कहा ना ख़तम”

मैंने कहा “कविता में ख़तम है,
पर कविता अभी ख़तम नहीं हुई है”
वो बोला “अच्छा तो चल आगे सुना
पर जल्दी से ख़तम कर ना यार, पढ़ना जो है…

मैंने आगे पढ़कर सुनाया

“तेरा ये हाय! मुसकाना, यूं हँसना और शरमाना
न तेरे हुस्न से बढकर नशे का कोई मयखाना,
उड़ गए होश अब मेरे, हुआ है नशा अभी ना कम,
तुम मेरे पास रहो ऐसी, जहाँ तक दुनिया होए ख़तम …. ”


दोस्त इक बड़ी जंभाई लेते हुए बोला
“ अब तो ख़तम हो गयी ना यार,
चलो अच्छा हुआ, बहुत अच्छी है, भई वाह”
और वह फिर पुस्तक खोलने वाला ही था
कि मैंने कहा ” नही अभी ख़तम नहीं हुई
सिर्फ एक छंद और है, सुन लो न यार ”
और बिना दोस्त के अनुमति के
मैंने आगे पढ़ना शुरू किया

“तेरी इन बाँहों को पाकर, लगे सब स्वर्ग सा मुझको,
सिमट आयीं मेरी बाँहों में तुम, वरदान हो मुझको,
तेरी जुल्फों को, गालों को, इन होटों को सराहें हम,
तुम मेरे पास रहो ऐसी, जहाँ तक दुनिया होए ख़तम…… “

फिर मुखड़ा पढ़ा
“तेरी इन भोली आँखों में मै अपने को खोऊं कितना,
तेरे इन मीठे होटों से पीऊँ भी और अब कितना,
कि अब तक भरा नहीं मन ये, न होती प्यास भी कुछ कम,
तुम मेरे पास रहो ऐसी जहाँ तक दुनिया होए ख़तम ….. ”


मेरा कविता पढ़ना ख़तम हुआ
और मैंने उत्सुकता से दोस्त की ओर देखा
तो मेरा दोस्त अपने मुंह पर
Heat Engines की text book रखे
कविता ख़तम होने के पहले ही
निद्रा के आधीन हो गया था …..

मेरी इस “ख़तम ” कविता के जनम की
और मेरे इस प्यारे जिगरी दोस्त की
मेरे दिल में बसी हुई यह अनोखी
अविस्मर्णीय कहानी है……मेरा वह बड़ा प्यारा जिगरी दोस्त
"डॉ अरविन्द दिघे" जिसे हम प्यार से "गोट्या" कहते थे
जिसने जर्मनी से Engineering में सन्माननीय Doctorate हासिल की थी
इस दुनिया में अब नही है,
पर उसकी और भी कितनी सुनहरी यादें
मेरे दिल के हर कोने में बसी हैं
न भुलाने न ख़त्म होने वालीं
कविताओं की तरह ..

” विश्व नंद”
« Last Edit: December 10, 2012, 10:44:33 AM by Vishvnand »