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Author Topic: ममतामयी माँ  (Read 602 times)

Offline pcmurarka

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  • प्रेमचंद मुरारका
ममतामयी माँ
« on: February 08, 2013, 09:50:16 PM »

माँ की गोदमे ऐसा क्या हैं

जिसमे कब नींद आजाती

दूध पीते पीते मालूम नहीं पड़ता

फिर भूख लगती रोने लग जाते

माँ को आगे से मालूम होता था

कब हमारी नींद टूटेगी

माँ थपथपी देकर सुला देती

थोड़े से बड़े हुए तब

माँ रात में कहानी सुनाकर

सुलाती थी

कैसी थी वह प्यारी सी राते

जो आज भी याद आती हैं

अब भी मन करता

माँ के गोद में सर रखकर

ठेर सारी बाते करू

और खो जाऊ मीठे सपनो में

पर न वह जमाना हैं न समय

समझ में नही आता किसको

दू समय, पत्नी को या बच्चो को

माँ टकटकी लगाए दरवाजे की

और देखती है कब आयेगा

उसका लाडला गोद में

सर रखकर बाते करेंगा

पर बेटा आता नहीं वह तो

अपने कमरे में चला जाता हैं

माँ की आँखे भर आती हैं

पर वह माँ हैं, वह जानती हैं

बेटा का मन आने को उतावला हैं

पर वह भी तो बंधन में जकड़ा हैं

माँ संतोष कर लेती हैं

जैसे उसकी चाह हैं

उतनी ही बहु की मांग हैं

सब सोने के बाद बेटा आता हैं

माँ के गोद में सो जाता हैं

माँ सारी रात उसे देखते हुए

बिता देती हैं उसे नींद नही आती

ऎसी होती हैं माँ

जिसका कोई बिकल्प नही हैं ।

----प्रेमचंद मुरारका