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Author Topic: दान भोग और नाश  (Read 468 times)

Offline Abhay Kumar Gupta

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दान भोग और नाश
« on: April 02, 2013, 02:28:15 PM »
 ‘’ दान भोग और नाश ‘’
धन की तीन गतियां बचपन से गुरु, माता-पिता, और जीवन में मिले पथ प्रदर्शकों से सुनी है|
धन जिस पल उत्पाकद्ता के सिद्धांत की परिधि से बाहर हो जाया करता है उस पल ही वह मृत हो जाता है|
कालेधन की मजबूरी है की वह उत्पाकद्ता के सिद्धांत की परिधि में सीधे रास्ते से आ नहीं पाता और यदि पीछे के रास्ते से इस परिधि में लाया जाय तो इसके हिस्सेदार इतने अधिक और शक्तिशाली ताकतें होती हैं की ये स्वयं इस परिधि में आ नहीं पाता, परिणामस्वरूप अर्थ के एक बड़े हिस्से की मौत |
अत्यधिक धन ना कमाने ना वालों को या संतुष्ट जीवन व्यतीत करने वालों को सामन्यतः अव्यवहारिक कहा जाता है,  अत्यधिक धन कमाने ना वालों की ये कोन  सी व्यावहारिकता है जो धन को निम्न कई तरह से म्रत्यु दंड दे दिया करती है,
@ मटके में भर के जमीन में गाड़ा के
@ सोने की ईंट के रूप में दीवाल में चिनवा के
@ बेनामी मालिक की बेनामी सम्पति के रूप में गुप्त लोकर में
@ सोने के पतरों के रूप में मकान की छत में, इनके अलावा भी कई तरीके हैं जिनके अनुसार धन को ये सजा सुनाई जाती है जो की सजा देनेवाले के मूड पर निर्भर हुआ करती है |    
अंतिम परिणिति इस काले धन की मृत्यु ही है जो की देश के उन निरपराधों को भी प्राप्त होती है जिनके हिस्से के ’’ सफ़ेद धन ‘’ का बलात अपहरण कर उसे काला बनाया गया |
धन का उपयोग दान व भोग में हो तो उत्तम अन्यथा ये निरपराधों को जीवित-म्रत्यु-दंड दे कर स्वयं भी अकाल म्रत्यु को प्राप्त हो जाया करती है |
‘’ दान भोग और नाश ‘’ को समझना शायद ओछापन है धनार्जन की राह पर चल कर ‘’ घनानंद ‘’ बनने की राजसी / तामसी  इच्छा पाले हुए मन का |

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Offline kedar.mehendale

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  • यूही .... चलते चलते
Re: दान भोग और नाश
« Reply #1 on: April 02, 2013, 03:53:11 PM »
Pl post it in hindi Articles section