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Author Topic: खिचड़ी - मिड डे मील  (Read 1534 times)

Offline kazimjarwali

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    • Kazim Jarwali
खिचड़ी - मिड डे मील
« on: July 19, 2013, 05:25:23 PM »
अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना।

स्कूल मे खिचड़ी ही तो खायी थी सभी ने,
हंस खेल के मिलजुल के पकाई थी सभी ने,
किस चाव से थाली मे सजाई थी सभी ने,
इफ़्लास को सरकार के खाने से बचाना;

अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना।

आफत थी मुसीबत थी हलाकत थी वो खिचड़ी,
बच्चों के लिए जाम-ए-शहादत थी वो खिचड़ी,
कुछ मांए ये कहती हैं क़यामत थी वो खिचड़ी,
सच ये है हुकूमत की ज़रुरत थी वो खिचड़ी,
हर दिल को रुलाता है यह खिचड़ी का फ़साना;

अच्छा है यही तुम मुझे भूखा ही सुलाना,
अच्छी मेरी अम्मा कभी खिचड़ी न पकाना।। काज़िम जरवली
Kazim Jarwali Foundation

Offline chandwani52

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Re: खिचड़ी - मिड डे मील
« Reply #1 on: July 23, 2013, 07:51:09 PM »
सामयिक और गंभीर विषय पर कविता पसंद आई ,
प्रस्तुत है :
उस कातिल खिचड़ी पर पक रही हैं राजनैतिक खिचड़ियाँ 
परंतु आज की ज़रूरत है कि दोबारा न हो ऐसी गड़बड़ियाँ 


(चंदवानी)




 
« Last Edit: July 24, 2013, 11:02:22 AM by chandwani52 »