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Author Topic: आ छुपा लें अपनी दोस्ती को .......  (Read 1220 times)

Offline praveen.gola.56

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आ छुपा लें अपनी दोस्ती को ,
सबकी नज़रों से मेरे यार ,
नगर लग गयी गर इसे तो ,
कम हो जाएगा हम दोनों का प्यार ।

आ बना लें अपनी दोस्ती को ,
सबसे अलग और बेमिसाल ,
जिसमे चाह हो कुछ सीखने की ,
देकर अपना “दिल” विशाल ।

आ कहें अपनी दोस्ती को ,
सागर और नदिया के ताल ,
भंवर में कहीं डूब ना जाएँ ,
इसलिए हाथ थाम कर चलते हैं चाल ।

आ कहें अपनी दोस्ती को ,
सपनों का एक रंगीन जाल ,
ख़्वाबों में भी रहता हैं अक्सर ,
एक-दूजे के वजूद का ख्याल ।

आ कहें अपनी दोस्ती को ,
दो अनजान मुसाफिरों का संसार ,
जिसमे एक मुसाफिर गर थक जाता है ,
तो दूजा उठाता है उसे होकर सिंह पर सवार ।

आ कहें अपनी दोस्ती को ,
रंगों से सजा एक इन्द्रधनुष का तार ,
जिसके हर तार में एक नया गीत है ,
और हर रंग में एक सतरंगी बहार ।

आ कहें अपनी दोस्ती को ,
छलकते जाम जैसा एक “नशे” का खुमार ,
जब भी चढ़ जाती है इसके “नशे” की खुमारी ,
तब गिरकर ही मिटता है दोनों का सुकून ~ए~ प्यार ॥

Offline admin

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बहुत अच्छी कविता, पर हम इसे प्रतियोगिता मे शामिल नहीं कर सकते। प्रतियोगिता मे सहभाग लेने के लिए आखरी तारीख 4 अगस्त 2013 थी
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Offline praveen.gola.56

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जो पहले ही अपनी "दोस्ती" को छुपाने की बात करे ,
उसे भला प्रतियोगिता का क्या मोह होगा जनाब ?
धन्यवाद आपका जो सराहा आपने हमें .......
कम से कम अपनी "दोस्ती" के नाम का कुछ तो मिला खिताब ॥